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डॉ. टी.महादेव राव का एक प्रकृति की तरफ झुकता हुआ गीत

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, नवंबर 14, 2011 | सोमवार, नवंबर 14, 2011


गुगुनी धूप का आनंद
शीत की कंपाती सुबह में बैठ लें
 आँगन में बिछी खाट पर लेट लें  
    लें गुलाबी ठंड में गुनगुनी धूप का आनंद  
          आओ आसमान को बाहों में समेट लें

पत्तों की चरमराहट कि कोई आया है                                                 
          मन किसी आवाज़ से भरमाया है                                
                   दूर दूर तक नहीं कोई परिंदा भी                              
                     शीत ने संसार को सूना सूना बनाया है
एकाकी भरम में निस्तब्धता को लपेटलें आओ आसमान को बाहों में समेट लें

कहीं दूर से उठता धुआँ कहे कि कोई है                                             
   दूर दूर तक प्रकृति सुंदरता सी सोयी है                                         
  मन विचर रहा है संसार भर के एकांत में                                           
    ओस की बूंदें ज्यों सारी रात रोयी है
पोंछे आंसूधरती के सूरज गगन में बैठ के आओ आसमान को बाहों में समेट लें

सारी सड़क सुनसान सी सूनी पड़ी है
 राह में गहरे धुंधकी बड़ी चादर खड़ी है                                        
  कुछ कहने लगा  है बहती हवा का शोर
 धरती सूरज के बीचचल रही आंखलड़ी है
जीवन के सब रंग प्रकृति संग समेट लें                                          
आओ आसमान को बाहों में समेट लें

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


डॉ. टी.महादेव राव
(सृजन नामक संस्थान के ज़रिए विशाखापटनम में साहित्य-संस्कृति की अलख जगाए हुए एक संस्कृतिकर्मी के रूप में पहचान है. कभी कभार गीत,कविता भी करते हैं.)
09394290204                              mahadevraot@hpcl.co.in
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1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुंदर प्रकृति का वर्णन करती हुई रचना आभार , शायद इनकी स्वतंत्र वार्ता में अक्सर पढता रहता हूँ |

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आओ पुस्तकों के मेले चलें.....

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