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चेतना का प्रतिवादी स्वर सर्वाधिक मुखर है आर. चेतन क्रांति की कविताओं में

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, नवंबर 19, 2011 | शनिवार, नवंबर 19, 2011


धूमिल के बाद चेतन ऐसे पहले कवि हैं, जिनके यहाँ चेतना का प्रतिवादी स्वर सर्वाधिक मुखर है। चेतन इस मामले में विशिष्ट भी हैं कि उन्हें धूमिल की तरह अपनी बातों को बल प्रदान करने के लिए किसी की पूंछ उठाने की जरूरत नहीं पड़ी है। ऐसे समय में जब हिंदी के तमाम चर्चित कवि कविता को माथापच्चीवाले खेल में तब्दील करते जा रहे हैं, चेतन अपने समय की विसंगतियों को न केवल उसकी जटिलता में चिद्दित करते हैं, बलिक सफलतापूर्वक उससे मोरचा लेते दिखते हैं। गुजरात नरसंहार के बाद लिखी अपनी एक कविता में चेतन लिखते हैं :

धर्माचार्यो
तुम्हारे दिन तो जा ही चुके थे बरसों पहले
लो, अब तुम्हारा धर्म भी गया
हत्या पर हत्या करके भी
अब तुम उसे लौटा नहीं सकते...

ऐसा नहीं है कि चेतन का यह रवैया मात्रा धर्म के प्रति ऐसा दो-टूक हो, छद़म क्रांतिकारिता को भी वे असिथरता और स्थगन के रूप में देखते हैं। 'हम क्रांतिकारी नहीं थे कविता की पंकितयाँ देखें :

वे एक-दूसरे को लड़ने की सुविधा देते हुए लड़ रहे थे
उनके बीच एक समझौता था
जो अनंत काल से चला आ रहा था
हमने उसे तोड़ा
इस तरह युद्ध क्षेत्रा के बीच हम बचे...

हिंदी कविता में विष्णु खरे अकेले कवि हैं, जो विवरणात्मकता को अपनी ताकत बना पाते हैं। ऐसा वे अपने दृश्यांकन (आब्ज़र्वेशन) की क्षमता से कर पाते हैं। चेतन खरे की शैली को और विकसित करते हैं। और उनकी कविता ज्यादा मारक बनती जाती है। इसका कारण यही हो सकता है कि खरे के यहाँ यह शैली उनके जीवन की प्रौढ़वय में विकसित हुर्इ है, इस उम्र में स्वभावत: उनका जीवन-संघर्ष उस तरह बहुआयामी नहीं है, जैसा युवा होने के चलते चेतन के यहाँ है।यह कितना मजेदार है कि जिस समय हिंदी के वरिष्ठ कवि अरुण कमल परचून की दुकानों की रंगीनी की ओर लुढ़कते चले जा रहे हैं, चेतन 'हार्डवेयर की दुकान को अपनी कविता में लाते हैं

यह हमारी हार्डवेयर की दुकान है
यहाँ हम चकरियाँ घिर्रियाँ तसले फावड़े उथले
गहरे चौड़े, लोहे
प्लासिटक रबर और अल्यूमिनियम बेचते हैं
सुंदर चिकना और जिसे आप कहते हैं
अनन्त के मन में बस जानेवाली कौंध
ऐसा कुछ तो हमारे पास नहीं है
कि काउंटर पर हसीन लड़की भी नहीं।

ऐसे में जब कविगण अपने प्रेम की चुल्लू भर स्मृति या यथार्थ में ही उब-चुभ करते फिर रहे हैं, चेतन रिक्शावाले के प्रेम पर भी विचार करते हैं :

यह प्रेम के तरीकों पर शोक का दौर था
देह का देवत्व पर रात-दिन काम चल रहा था
वात्सयायन की एक टीका रोज बाजार में आती थी...
पर रिक्शेवाले इसमें शामिल न थे
वे रिक्शे को खड़ंजे पर वहशियाना दौड़ाते
कि जैसे लैला लकड़ी की हो
या कि उसे लकड़ी कर देना हो...

अगर लेखन को किसी हद तक हथियार बनाया जा सकता है, तो चेतन की कविताएँ इस मायने में उन हदों को पार करती हैं कि उनका हमला सुचिंतित, कूट-रणनीतिक कार्रवार्इ की तरह होता है। 'हिंदू देश में यौन-क्रांति कविता को इस संदर्भ में देखा जा सकता है :

कि यौवन ने मारी लात देश की
कुबड़ पर और कहा
रुकें, अब आगे का सफर हमें दे दें
पहले स्त्री उठी
जो सुंदर चीजों के अजायबघर में सबसे बड़ी
सुंदरता थी और कहा, कि पेड़ू में बंधा हुआ
यह नाड़ा कहता है
कि कीमतों का टैग आप कहीं और
टाँग लें महोदय
इस अकड़ी काली गोल गाँठ को अब मैं खोल रही हूँ...
चकित थे हिंदू
बलात्कार की विधियाँ सोचते, घूरते, घात लगाए, चुपचाप देखते, सन्नद्ध
कि भीम के, द्रोण के देश में जनखापन छाया जाता है...

इस कविता के द्वारा चेतन हिंदी धर्मध्‍वजियों को उनकी औकात बताते हैं कि पहले वे तय करें कि इस मुल्क में हिंदू क्रांति हो रही है या 'मुक्तस्तनी क्रांति। पर धर्मध्‍वजियों की धजिजयाँ उड़ा कर ही नहीं रह जाते चेतन, उत्तर आधुनिक प्रपंचों की पोल भी वे उसी मुस्तैदी से खोलते हैं :

वह जात से ब्राह्राण था
शिक्षा में अंग्रेज
प्रवृति से अराजक तानाशाह
आदत में नशेड़ी भावना से कलाकार
और विचार से कम्युनिस्ट... (कविता : आखिरी कामरेड)

चेतन की कुछ कविताओं पर विष्णु खरे का असर दिखता है, कहीं-कहीं रघुवीर सहाय भी याद आते हैं, प्रतिवादी स्वर धूमिल से तीखा होने पर भी चेतन की शैली उनके जैसी नहीं है। दरअसल, चेतन की शैली चेतन जैसी है। चेतन को अगली लड़ाई अपनी इस शैली से ही लड़नी पड़ेगी। धूमिल जैसे लड़ाकू भी अपनी शैली से नहीं लड़ सके थे, यह याद रखते हुए। अगर चेतन आगे अपना संघर्ष जारी रखते हैं तो शायद हिंदी कविता को आगे और भी मंजि़ले मिलें।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

(कुमार मुकुल स्वत्रन्त्र लेखन के ज़रिए आज के दौर का एक जाना-पहचाना नाम बन चुका है.बिहार के मूल वासी होकर फिलहाल दिल्ली में रहते हैं.और हिन्दी के अलावा भी भोजपुरी,मघही और मैथिली में दखल रखते हैं.उनके ब्लॉग पर भी उन्हें और जाना जा सकता है.हिन्‍दी में मनोरोगों और मनोविज्ञान की पहली पत्रिका 'मनोवेद' के  कार्यकारी संपादक  है. M-9968374246, kumarmukul07@gmail.com)
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