''कला में अश्लीलता, फूहड़पन और सांस्कृतिक स्तरहीनता के आगे कब तक मौन रहोगे''-डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

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''कला में अश्लीलता, फूहड़पन और सांस्कृतिक स्तरहीनता के आगे कब तक मौन रहोगे''-डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय


 मीडिया पर बढ़ती हुई अश्लीलता व घटियापन के प्रति आजकल सामान्यतः एक पराजय जनित स्वीकार का भाव देखने में आता है। हम इस बात को जैसे एक व्यापक स्वीकृति मिलती हुई पाते हैं कि कला में अश्लीलता, फूहड़पन और सांस्कृतिक स्तरहीनता का जो एक नया सैलाब आया है उसे रोक पाना अब किसी तरह संभव नहीं है। जनमानस में शायद यह धारणा भी घर करने लगी है कि देशी-विदेशी प्रचार माध्यमों का जो व्यापक आक्रमण अब आकाश-मार्ग से हर घर-परिवार पर हुआ है उसके आगे परिष्कृत रुचियों या हमारे परम्परागत शास्त्रीय कलारूपों की बात करना बेमानी हो गया है। तेज़ धुनों, अश्लील हरकतों और तथाकथित खुलेपन की अधिकता के आगे कला में सुरुचि व गहरी समझ की बात करने वालों के लिए शायद अब मौन साध लेना ही उचित होगा। 

उधर दूसरी ओर व्यावसायिक मनोवृत्ति के लोग जो कि अधिक पैसे के लोभ में साहित्य, संगीत व कला को विकृति की किसी भी सीमा तक ले जाने में नहीं हिचकिचाते, अपनी बात मनवाने के लिए सामान्य से अधिक चतुराई का प्रदर्शन करने लगे हैं। पैसे के लिए मानवीय कमजोरियों का हर तरह फायदा उठाने को कटिबद्ध ये लोग अश्लीलता और भोंडेपन को दमित इच्छाओं से मुक्ति और कुंठाओं, वर्जनाओं के निराकरण का नाम देने लेगे हैं। एक फिल्म निर्माता ने कुछ समय पूर्व एक अश्लील व द्विअर्थक गाने के प्रतिवाद में यह तर्क दिया कि अश्लीलता व विकृति उस गीत में न होकर उसे सुनने वालों के मन में छिपी है। लोकगीतों, लोकधुनों व लोकनृत्यों में मादक व उत्तेजक तत्वों की उपस्थिति का हवाला देकर कुछ निर्माताओं ने ऐसा प्रदर्शित करने की कोशिश की है जैसे उनका मुख्य उद्देश्य लोगों की यौन भावनाओं को उभाड़कर उनसे आर्थिक लाभ उठाना न होकर लोककलाओं को प्रोत्साहन देना व समाज में उन्हें प्रतिष्ठित स्थान दिलवाना ही हो। 

      यौन वर्जनाओं व कुण्ठाओं की बात भी ये मीडिया व्यवसायी इस तरह करते हैं जैसे उनसे पहले कभी किसी ने इस बात की चर्चा ही न की हो। इस सदी के तमाम स्वदेशी व विदेशी विचारकों व साहित्यकारों द्वारा मध्युगीन एवं विक्टोरियन वर्जनाओं और तज्जनित कुण्ठाओं के  विरुद्ध किए गए लम्बे व वास्तविक संघर्ष के परिणामस्वरूप पोषित प्रौढ़ मानसिकता को एक तरफ रख कर यौन-स्वच्छंदता और सामाजिक अनैतिकता को ये स्वार्थी व्यवसायी इन वर्जनाओं व कुण्ठाओं की चिकित्सा के रूप में पेश करना चाहते हैं। ऐसा नहीं कि ये लोग कला की वास्तविकताओं, उसकी सीमाओं व उसके सामाजिक सरोकारों से अनभिज्ञ हों, किन्तु अधिक पैसे का लालच इन पर इस तरह हावी है कि उसकी खातिर ये कला संबंधी हर सिद्धान्त व सत्य की अनदेखी कर देना चाहते हैं। वे इस बात को बख़ूबी जानते हैं कि मंच पर यातना व हत्या जैसी घटनाओं का प्रदर्शन शास्त्रों में प्राचीन काल से वर्जित रहा है किन्तु अपने दर्शकों की संवेदनाओं को अधिकाधिक भोथरी बनाकर उन्हें अधिकाधिक हिंसक व उत्तेजक दृश्यों के लिए तैयार करने पर आमादा इन लोगों ने लोकरंजन के साथ निबाहे जाने वाले अपने तमाम धर्म व सामाजिक दायित्व को ताक पर रख दिया है। ये  लोग इतने नादान नहीं कि ये अश्लीलता व हिंसा के दर्शक मन पर होने वाले प्रभाव से अनभिज्ञ हों। ये जानते हैं कि उनका वैसा करना लोगों की अमानवीयता और स्वेच्छाचारिता में ही वृद्धि करेगा। पिछले जातीय दंगों में सूरत जैसे शहरों में स्त्रियों के साथ की गई ज़्यादतियों तथा जलगांव जैसे कस्बों में भीतर ही भीतर पनपती गई अनैतिकता को उन्हीं तत्त्वों से पोषण मिला है जो अपनी वासनापूर्ति के लिए अधिकाधिक अभद्रता की मांग करते आए हैं और जो साथ ही मानवीय हिंसा व क्रूरता के प्रति अधिकाधिक असंवेदनशील होते गए हैं। 

 इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि मानव भी मूलतः एक पशु ही है और आज भी उसके सारे कार्यकलाप मोटे तौर पर उसकी मूल प्रवृत्तियों से ही परिचालित होते हैं। आहार, निद्रा और मैथुन की उसकी दैहिक आवश्यकताएं आज भी उससे उनकी पूर्ति की मांग करती हैं। नीड़ निर्माण जैसे पक्षियों की सहजात वृत्ति है वैसे ही यौन-आकर्षण व अधिक सुख-सुविधाओं की कामना मानव का भी जन्मजात गुण है। हर्ष-विषाद्, जय-पराजय, लाभ-हानि आदि से प्रभावित होना ही उसके चेतन होने का प्रमाण है। किन्तु मानव सभ्यता के विकास का मूलाधार ही उसके सहज मनोवेगों का नियंत्रण रहा है। एक विकसित सभ्यता सदैव मानव से उसके सहज मनोभावों पर नियंत्रण की अपेक्षा रखती है और उसकी इस नियंत्रण क्षमता के आधार पर ही उसकी श्रेष्ठता का आकलन करती है। आचरण में आत्मपरकता अथवा केवल ऐन्द्रिक सुख की आकांक्षा सांस्कृतिक दृष्टि से व्यक्ति के निम्नस्तरीय होने का प्रमाण माने जाते हैं, जबकि परोपकार के दायरे का विस्तार एवं भावावेग की स्थिति में भी आत्मानुशासन को सदैव व्यक्ति को परिपक्वता एवं परिष्कार के रूप में देखा गया है। 

इसमें कोई संदेह नहीं कि सामंतवाद के अभ्युदयकाल में मानव ने मानव के विरुद्ध जो अत्याचार किए उनमें धर्म, जाति और लिंग भेद के नाम पर लोगों का मनमाना शोषण व दमन हुआ। उस काल में जहां एक वर्ग गहरी विलासिता में डूबा रहा वहीं परलोक का भय दिखा कर अधिकारवंचितों को मानव जीवन के सहज व प्राकृतिक सुखों से भी विमुख करने की कई चालाक कोशिशें की गईं। दैहिक आकर्षण व सहज यौन संबंधों को इतना अपवित्र व त्याज्य बताया जाने लगा कि भौतिक आवश्यकताओं व यौन सुख के प्रति एक स्वस्थ भाव का स्थान धीरे-धीरे एक कुंठापूर्ण व परलोकवादी संस्कृति लेने लगी। यौन प्रक्रिया में अपवित्रता व अपराध भाव के आरोपण से पति-पत्नी संबंधों में भी एक प्रकार की जड़ता, रूखेपन व नपुंसकता का प्रवेश होने लगा। किन्तु मानव देह के सहज धर्म को इस प्रकार की चालाकियों से बदल पाना किसी के लिए संभव नहीं था और इसीलिए इन अप्राकृतिक नियमों व मान्यताओं के प्रति विद्रोह स्वाभाविक था। फ्रांस या रूस की राज्य क्रांतियों या उपनिवेशों में साम्राज्यवादी शासकों के विरुद्ध किया जाने वाला संघर्ष भी दमन के प्रति उसी वैचारिक प्रतिक्रिया का एक हिस्सा थे जिसने पश्चिम में फ्रायड जैसे क्रांतिकारी यौन विचारकों को जन्म दिया। 
किन्तु उस मध्ययुगीन दमन व उत्पीड़न से स्वतंत्र हुई मानवता अब उपभोक्तावाद के जिस नए सुनहरे जाल के प्रति आकर्षित होने लगी है वह उनकी स्वतंत्रता को स्वच्छन्दता व मर्यादाहीनता की दूसरी पराकाष्ठा की ओर धकेल रहा है।  न  केवल  सामाजिक  जीवन में, व्यापार में व राजनीति में घूस, भ्रष्टाचार व बेईमानी बढ़ रही है, मानवीय संबंधों में भी प्रेम, सहयोग व भाईचारे का स्थान गलाकाट स्पर्द्धा, हिंसा और स्वार्थपरता लेती जा रही है। स्वतंत्रता का अर्थ अब स्वच्छंदता, तोड़फोड़ और क्रूरता होता जा रहा है जबकि समानता और भ्रातृत्व के भाव बराबर निर्वासित होते जा रहे हैं। लोग बराबर के बजाए ‘‘बराबर से अधिक‘‘ होने की मांग करने लगे हैं और यौन-स्वातंÛय पश्चिमी देशों में समलैंगिकता जैसे असामान्य संबंधों को भी सामान्य पारिवारिक संबंधों के रूप में स्वीकार किए जाने पर बल देने लगा है। 

    यौन-स्वातंत्र्य की सामाजिक स्वीकृति अब अधिकाधिक नग्नता व अश्लीलता की ओर अग्रसर होती जा रही है। बाज़ारवादी और व्यापारिक मानसिकता वाले तत्त्वों ने मानव की सहजात यौनवृत्ति का तरह-तरह से शोषण आरंभ कर दिया है। बाज़ार में किसी भी वस्तु के विक्रय को बढ़ाने के लिए अब ग्राहक की यौन भावना को उभाड़ा जाने लगा है। जिन लोगों के संस्कारों में यौन वर्जनाओं का सर्वथा अभाव है वे मानव देह को केवल उपभोग की वस्तु के रूप में ही देख पाते हैं जबकि प्रकृति ने यौन-प्रक्रिया को मानवीय प्रजनन से अविभाज्य रूप से संयुक्त किया है। मानव शरीर के प्रति उपभोगवादी दृष्टि का एक अवश्यंभावी परिणाम गर्भवती स्त्रियों व अजन्मे शिशुओं के प्रति क्रूरता व अत्याचार ही हो सकता है। यौन स्वच्छंदता पर विचार करते समय हमें उसके इस अमानवीयतापूर्ण पक्ष की ओर से भी आंखें नहीं मूंद लेनी चाहिए। प्रकृति ने घनिष्ठता, निकटता, पर्वाह व कोमलता की जिन सहज मानवीय भावनाओं से यौन-प्रक्रिया को जोड़ा है, उन भावनाओं से उसका किन्हीं भी कारणों से विच्छिन्न हो जाना मानव को केवल विक्षिप्तता की ओर ही धकेल सकता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तमाम रूमानी काव्य और प्रतीक्षित शिशु के संबंध में रचे गए अनेक लोकगीतों के मूल में यौन-भावना का ही एक परिष्कृत व उदात्त रूप रहा है। 

    मानव सभ्यता की अनेक श्रेष्ठ उपलब्धियों का आनन्द उठाने की क्षमता व्यक्ति अपनी सहजात पशुता को नियंत्रित करके  ही अर्जित करता है। इस बात से आज भी कौन इन्कार कर सकता है कि किसी व्यक्ति के लिए काव्य, दर्शन, कला और अनेक सूक्ष्म मानवीय मनोवेगों के संसार में संचरण उसकी सहजात सामान्य वृत्तियों के उदात्तीकरण के बाद ही सम्भव है। केवल एंद्रियक सुख और उपभोक्ता स्तर पर जीने वाले लोगों के लिए एक ऊर्ध्वगामी चेतना विकसित करना और उच्चतर व श्रेष्ठतर अनुभवों की दुनिया में प्रवेश करना इसलिए कदापि संभव नहीं है कि उस दुनिया का मार्ग केवल पैसे से नहीं खोजा जा सकता।  

यदि कोई शासन सामाजिक व्यवस्था के स्वरूप को इतना विकृत हो जाने देता है कि उसमें मानव सभ्यता के श्रेष्ठतर अनुभवों का संसार केवल मुट्ठी भर लोगों के लिए ही रह जाए तो इसे निश्चित रूप से समतावादी और जनतांत्रिक सिद्धान्तों के विपरीत कहा जाएगा। ऐसी व्यवस्था हमारी श्रेष्ठतम किन्तु बहुत कुछ अमूर्त उपलब्धियों को कुछ चुनिन्दा लोगों तक सीमित रख कर जनसामान्य को केवल सस्ते, घटिया और भोंडे खिलौने से बहलाने की मंशा रखती है। कला के श्रेष्टतम रूप और उपलब्धियाँ एक जनतन्त्र में जनसामान्य को उपलब्ध होनी चहिए क्योंकि पूरी तरह न समझी जाने पर भी वे अवश्य उन्हें प्रभावित करेंगी। केवल सस्ती लोकप्रियता की इच्छा से उनका स्तर गिराना या उनके स्वरूप को सस्ता व अपसंस्कृत बनाना आम लोगों की रुचियों के परिष्कार के प्रयासों के प्रति लापरवाही बरतना है। वह स्वच्छन्द समाज जो लोगों को केवल उनकी सहजात पशु प्रवृत्तियों की तुष्टि द्वारा खुश करने की कोशिश करता है मूलतः एक पतनशील समाज है और उसके निर्माताओं की रुचि मानव कल्याण में न होकर केवल अपने स्वार्थों की पूर्ति अथवा अपने लिए अधिकाधिक धनार्जन में ही हो सकती है।

स्वार्थी और पैसे के लोभ में अंधे लोगों से चूंकि कभी यह अपेक्षा नहीं रखी जा सकती कि वे मानवीयता के संरक्षण के बारे में कोई विचार करेंगे, यह मुख्यतः शासकों का कर्तव्य है कि शिष्टता व परिष्कार के मापदंडों का पालन वे कला व मनोरंजन के क्षेत्र में भी सख़्ती के करवाएं। ऐसा न करके वे केवल उन तत्वों को खुलकर खेलने की छूट दे रहे होंगे जो अपने वर्तमान लाभ के लिए मानवता के तमाम भविष्य को गिरवी रखने को तैयार हैं।    

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,
मो.09352723690,ई-मेल-sadashivshrotriya1941@gmail.com
स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से  रचनाकाल: नवम्बर,1994 में प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. 
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