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''साहित्य का वास्तविक स़्त्रोत जनता है''-डॉ. खगेन्द्र ठाकुर

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, नवंबर 15, 2011 | मंगलवार, नवंबर 15, 2011

भागलपुर.

हिन्दी साहित्य जगत को अपनी रचनाओं से समृद्ध करनेवाले और देश व समाज को अपनी लेखनी से नई दिशा देकर हिन्दी काव्यधारा को सर्वाधिक प्रभावित करनेवाले बावा नागार्जुन की जन्मशताव्दी गत 13 नवम्बर को दिशा, जसम, माघ्यम, पीपुंल वॉयस के संयुक्त तत्वावधान में भागलपुर के मारबाड़ी पाठशाला के गोपाल सिंह नेपाली सभागार में मनायी गयी। यह आयोजन कई मायनों में महत्वपूर्ण इसलिये था कि राज्य सरकार तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों ने बिहार के माटी के लाल की जहां उपेक्षा की, वहीं सांस्कृतिक साहित्यिक संस्थाओं ने बाबा के जीवन मूल्यों से आम आदमी के अंदर की आग को जलाये रखने का एक सार्थक प्रयास किया, जिसके लिये जनकवि बाबा नागार्जुन की प्रतिवद्धता थी।
         कार्यक्रम का शुभारंभ बाबा नागार्जुन की कविताओं के सस्वर पाठ से हुआ। कविताओं का पाठ चैतन्य, प्रेमचंद पांडेय, व नीलेश ने किया। कार्यक्रम के दौरान हर बक्ताओं ने बाबा की विभिन्न रंगों की कविताओं का पाठ किया। कार्यक्रम के संचालक तथा टी.एन.बी विधि महाविद्यालय के प्राध्यापक चंद्रेश ने बाबा नागार्जुन के जनसरोकार को प्रस्तुत किया। साथ ही यह घोषणा की कि बिहार की माटी से जुड़े गीतकार गोपाल सिंह नेपाली का भी यह जन्मशताव्दी बर्ष है। आयोजन की अगली कड़ी उन पर केन्द्रित कार्यक्रम होंगे। कार्यक्रम के विमर्श का विषय था - ‘ नागार्जुन की कविता और जनसरोकार’।

   समारोह का उद्घाटन हिन्दी के ख्यातिप्राप्त आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने किया। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि साहित्य का वास्तविक स़्त्रोत जनता है। बाबा नागार्जुन की कविताओं तथा उनके साहित्य के केन्द्र में जन है, उनके इसी जन ने उन्हें जनकवि बनाया। नागार्जुन के व्यक्तित्व का उनकी कविताओं के कथ्य से गहरा आंतरिक संबध है। कवि का व्यक्तित्व कविता में व्यक्त होता है। उनके व्यक्तित्व निर्माण में जनसंघर्ष था। मशहूर  अमवारी सत्याग्रह में राहुल सांकृत्यायन पर हमला हुआ और वे गिरफ्तार किये गये। उनकी गिरफ्तारी के बाद अगले जत्थे के रूप में बाबा शरीक हुए और वे भी गिरफ्तार किए गए। उन्होंने भारतीय परंपरा में व्याप्त रूढिवाद से अपने को मुक्त किया, समाज के वर्ग विभाजन को समझा, सामाजिक विषमता को पहचाना और उसके खिलाफ आबाज उठायी। मेहनतकशों के जीवन के साथ अपनी सृजन-चेतना को जोड़कर नागार्जुन कविता में नये सौन्दर्य, श्रम सौन्दर्य विम्व विधान करते हैं। नागार्जुन विचारों के कवि नहीं हैं, वे जनकार्रवाईयों और जनसंघर्षों के कवि हैं। उनकी कविताओं में एक अलग किस्म की ताकत है।

    नागार्जुन के काव्य पथ की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि वे स्वातत्रंयोत्तर नई कविता के सबसे बड़े कवि थे। उनकी मान्यता थी कि जब तक कवि के हृदय में वेदना नहीं होगी, तबतक अपनी रचना में कैसे वेदना व्यक्त करनेवाले शव्दों को योजना कर सकता है? भूख, अकाल, और भूखमरी के जो चित्र नागार्जुन के काव्य में मिलते हैं, वह अन्यत्र नहीं है। कानी कुतिया, छिपकलियों, चूहों और कौवों के माघ्यम से मनुष्य का जिक्र किये विना उसकी पीड़ा की जो तस्वीर पेश की है, वह अद्भुत अभिव्यंजनाओं से लैश है। स्वयं अपने को मेहनतकशों से जोड़ते हैं। इसे उनकी कविता ‘खुरदुरे पैर’ तथा मैथिली रचना ‘पसोनाक गुणाध’ में देखा जा सकता है। बाबा नागार्जुन का काव्य सौन्दर्य है वहां जहां वे जनता के जीवन के दुखदर्द को इस तरह मूर्तरूप देते हैं कि जैसे वह दर्द उनका अपना हो। उनकी कविताओं में सामंती शोषण और विरोध, महंगाई-बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, हिंसा व राजनीतिक पाखंड के साथ-साथ प्रकृति भी है।

  वहस को आगे बढ़ाते हुए हिंदी के प्रखर आलोचक तथा ‘नया पथ’ के संपादक डॉ. मुरली मनोहर प्रसाद सिंह ने कहा कि जनकवि के रूप में नागार्जुन ने अकाल, नेता के भ्रष्टाचार, आपतकाल के दमनकारी शासन पर करारा प्रहार किया तथा जीवन के सच को व्यक्त किया। उनकी रचनाओं का दूसरा पक्ष यह है कि रूढ़िवादिता के वंधन को तोड़ा है। अपने समय की सामाजिक परिस्थितियों तथा आमजन की पीड़ा को करीव से देखा। छायावादियों की परंपरा के बाद उन्होंने नई परंपरा का सूत्रपात किया। राजसत्ता की जनविरोधी नीतियों पर अपनी कविताओं के माध्यम से करारा प्रहार किया। जनकवि के रूप में वे जन को अपनी रचनाएं गा-गाकर  न सिर्फ सुनाते थे, बल्कि उन रचनाओं को पुस्तक तथा पुस्तिका के रूप में स्वयं बेचते भी थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के बाद उन्होंने पंाच कविताएं लिखी, जिसे जनशक्ति प्रेस ने प्रकाशित किया था, सरकार ने उसे प्रतिवंधित कर दिया। उसके बाद बाबा इन रचनाओं को लोगों को गा -गाकर सुनाते थे तथा इन कविताओं की पुस्तिका छपवाकर  बेचने का काम भी करते थे। लिहाजा वे जेल में डाल दिए गए। ऐसा दौर उनके जीवन में कई बार आया है। उन्हांेने संस्कृतिकर्मियों का आह्वान किया कि बाबा की रचनाओं को  संगीतवद्ध कर  जगह- जगह गाए जांय।

    वहस में भाग लेते हुए टी.एन.बी कॉलेज भागलपुर के हिन्दी के प्राध्यापक डॉ योगेन्द्र ने कहा कि बाबा नागार्जुन जनता के पक्षधर हैं और स्वाधीन चेतना के कवि हैं। वादों में बांटकर उनकी कविताओं तथा व्यक्तित्व  का मूल्यांकन मुमकिन नहीं है। वहीं तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्राघ्यापक डॉ प्रेम प्रभाकर ने कहा कि नागार्जुन की कविताएं भारतीय जनता के स्वपन और संघर्ष की महागाथा है, उनका आख्यान है। उनकी तमाम रचनाएं संघर्षों को ताकत देती है।

         रांची विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के पूर्व विभागाघ्यक्ष और हिन्दी साहित्य के आलोचक डॉ. रविभूषण ने कहा कि नागार्जुन 90 करोड़ जनता के कवि हैं, क्योंकि उनकी कविताएं स्वयं में जनक्रांति है। उन्हें उनकी समग्र रचनाओं के माध्यम से समझना होगा जो उन्होंने 1929 से लेकर अपने मृत्युपर्यन्त के कालखंड के दौरान लिखे।वे सबसे बड़े राजनीतिक कवि थे। आज जब भारतीय समाज अंतविरोधों से ग्रस्त है, भारतीय जनतंत्र कॉरपोरोट तंत्र बन गया है, वैसे समय में उनकी रचनाओं की प्रासंगिकता और ज्यादा हो गयी है। वे भारत को स्वाधीन करनेवाले कवि हैं तथा देश की समग्र जनता के प्रति उनकी दृष्टि है, तभी तो वे त्वरित प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। माओ से लेकर इंदिरा गांधी, मायावती, जयप्रकाश, लालू प्रसाद किसी को नहीं छोड़ा। उनकी कविताओं में शोषित पीड़ित जनता का जीवंत चित्र है। उन्होंने जिस जमीन पर खड़े होकर व्यापक जन को संबोधित किया, वह जनता की जमीन है। उन्होंने स्वयं अपने को ‘उी क्लास’ कर करोड़ों करोड़ जनता की उदासी और दर्द को समझा।शासन के दमन और आतंक को देखा नहीं भोगा भी। सवालिया लहजे में उन्होंने कहा कि आज किस राजनीतिक दल में जन है। दुनियां में दो ही विचारधारा है पूंजीवादी और सर्वहारा वर्ग की। नागार्जुन सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते थे।

        दिल्ली विश्वविद्यालय की हिंदी की प्राघ्यापिका डॉ. रेखा अवस्थी ने कहा कि बाबा नागार्जुन सहज-जीवन, श्रमशीलता और प्रेम के कवि हैं। पितृसत्तात्म समाज तथा स्त्री के प्रति समाज के दुराग्रह और पुर्वाग्रह को तोड़ते हैं। उन्होंने हर प्रवाद को तोडने का काम किया।ब्राह्मणवादी समाज की रूढ़िवादिता, सामंती समाज के लिंगभेद को तोड़ा तथा स्त्री को समाज में प्रतिष्ठा दी। प्रेमचंद के बाद नागार्जुन हिन्दी के सबसे बड़े उपन्यासकार हैं जो सामाजिक परिवर्तन और वर्गविहिन समाज की स्थापना के पक्ष में मजबूती के साथ खड़े हैं। सामंती जीवन पद्धति एवं मूल्य दृष्टि का तिरस्कार ‘वलचनमा’ और ‘ बाबा बटेश्वरनाथ’ में है। इस संदर्भ में उन्होंने ‘पाषाणी’, ‘रतिनाथ की चाची’, ‘उग्रतारा’ सहित अनेक रचनाओं की व्याख्या करते हुए कहा कि उनकी दृष्टि भविष्योन्मुखी है। वहीं तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी स्नातकोत्तर विभाग के प्राध्यापक डॉ. अरविंद ने कहा कि वे सहजता और सरलता के पर्याय थे। जन कैसे बार-बार ठगा जाता है, इसका वेबाक चित्रण उन्होंने किया। सत्ताधारी वर्ग के वास्तविक चरित्र को उन्होंने वेनकाव किया। इस परिपेक्ष्य में उन्होंने ‘लूशुन’ की व्याख्या की।

 कथाकार डॉ. देवेन्द्र सिंह ने कहा कि नागार्जुन पीड़ितों की आबाज थे। उनकी कविताओं में वैसे लोगों की चिंता प्रमुखता से व्यक्त हुई है जो समाज के हाशिये पर जी रहे हैं। आयोजन का मुख्य आकर्षण ‘ आलय’ द्वारा प्रस्तुत नागार्जुन की पांच कविताओं पर आधारित नाटक ‘ अमर सृष्टि’ का  मंचन था, जिसका निर्देशन भारतेन्दु नाट्य विद्यालय के छात्र चैतन्य प्रकाश ने किया। संगीत दिवाकर व विक्रम के थे । वे प्रभावोत्पादक थे। कविता ‘मंत्र’, ‘वे हमें चेतावनी दे गए’ ‘तेरी खोपड़ी के अंदर’, ‘मास्टर’, ‘प्रेत के वयान’ को अलग-अलग रूपों में दृश्यों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया था। नाटक में हिमांशु शेखर, सूरज, सज्जन, रितेश, पंकज आनंद  अभिनय की कसौटी पर खड़े उतरने का प्रयास करते हैं। आयोजन का समापन डॉ मुकेश कुमार के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ। इस आयोजन के माध्यम से बाबा जनसरोकार की सार्थक वहस हुई तथा उस जन को तलाशने का प्रयास किया गया जो बाबा की रचना के केंद्र में है।    
योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
कुमार कृष्णन
स्वतंत्र पत्रकार
 द्वारा श्री आनंद, सहायक निदेशक,
 सूचना एवं जनसंपर्क विभाग झारखंड
 सूचना भवन , मेयर्स रोड, रांची
kkrishnanang@gmail.com
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