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'मुअनजोदड़ो' में बतौर लेखक ओम थानवी ने तथ्यों के माध्यम से नया विश्लेषण दिया है

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, नवंबर 20, 2011 | रविवार, नवंबर 20, 2011


साहित्य के पाठक को मुअनजोदड़ो अपने नाम से किसी उपन्यास या कहानी का संकेत करता है। यह मुर्दों का टीला रांगेय राघव के उपन्यास से इस मायने में अलग है कि यह जनसत्ता के संपादक ओम थानवी का यात्रावृतांत है। लेखक अपनी यात्रा की शुरुआत कराची से करते हुए दुनियां की सबसे प्राचीन सभ्यता के खण्डहरों के बारे में कईं विचार करता है! आखिर वह वहां जा ही क्यों रहा है? अतीत की उस साम्यवादी सभ्यता, जहां सब बराबर थे, वह हथियारों की नहीं औजारों की सभ्यता थी। हर इंसान अपने हुनर को तराशने में विश्वास रखता था न कि साम्राज्यवाद की तरह दूसरों पर शासन करने में। सिंध का वह इलाका जहां रात में जाना किसी खतरे से खाली नहीं था वहां लेखक रात में बस से अपने साथियों के साथ प्रस्थान करता है। जहां के बारे में यह बात आम हो, 

‘नब्बे के दशक से सिंध में कुछ सुरक्षा की समस्या है। डाकुओं के गिरोह, जो कई दफा जमीदारों के साए में काम करते हैं, लूट के लिए बसों-रेलगाडि़यों को रोक लेते हैं या कारों को अगवा कर लेते हैं।‘पृसं-16


 इतनी बीहड़ जगह की यात्रा करते हुए लेखक महज यायावरी ही नहीं करता वरन वह वहां के बारे में तथ्यों के माध्यम से विश्लेषण करता चलता है। वह किसी इतिहासकार की तरह वहां की हर एक घटना से बहुत गहरे से परिचित है और वह वहां वह उन तथ्यों की तलाश कर रहा है जिससे अपनी बात को प्रमाणित कर सके। लेखक इस तथ्य की और संकेत पहले करता है कि इतिहास तथ्यों के सहारे चलता है न कि गल्प के सहारे, इसलिए इतिहास की किसी बात को गल्प के माध्यम से सिद्ध करना इतिहास के साथ अन्याय है। हां साहित्य इतिहास से लेकर अपने को समृद्ध करता रहा है पर इतिहास में वह संभव नहीं है। मुअनजोदड़ो पर आज तक जो शोध हुआ है लेखक उन तथ्यों का क्रमबद्ध विश्लेषण करता चलता  है। यह मुअनजोदड़ो ही था जिसने सबसे पहले भारत के इतिहास को पुरातत्त्व का वैज्ञानिक आधार दिया। मुअनजोदड़ो रवाना हाने से पहले कराची से लेखक ने पर्यटक गाइड खरीदी थी, जिसमें दर्ज था ‘जब यूरोप के लोग जानवरों की खाल ओढ़ा करते थे और अमेरिका महज आदिम जातियों का इलाका था, यहाॅ सिंधु घाटी के लोग धरती पर एक अत्यंत परिष्कृत समाज का हिस्सा थे... और नगर निर्माण में सबसे आगे।‘पृसं-38

जो हो, सिंध के मुअनजोदड़ो, पाक-पंजाब के हड़प्प, राजस्थान के कालीबंगा और गुजरात के लोथल व धौलावीरा आदि खुदाई में हासिल पुरावशेषों ने यह अच्छी तरह साबित कर दिया है कि सिंधु घाटी नागर संस्कृति थी। समृद्ध और व्यवस्थित। उन्नत खेती और दूर-दूर तक व्यवसाय करने वाले निवासी।..... इससे बड़ा उद्घाटन यह था कि वह साक्षर सभ्यता थी। पृसं-39

ओम जी थानवी 
om.thanvi@expressindia.com
http://www.facebook.com/om.thanvi
जिस सिंध के को हिंद और फिर हिंदू बनाकर उसे हिंदूत्व के लोगों ने इसके अर्थ को बदलने की कोशिश की पर वह ऐसा नहीं कर पाए। फिर आर्य के बाहर से आने का तथ्य अभी वहीं कायम है। हमारे लिए यह तथ्य बहुत उपयोगी है कि इस सभ्यता के लोग साक्षर थे और उनके पास औजार थे हथियार नहीं। आज की उन्नत सभ्यता के लिए यह तथ्य प्रेरणादायी है कि वह मनुष्य के कल्याणकारी औजारों को महत्व दे न कि हथियारों को। मुअनजोदड़ो प्राकृतिक कारणों से नष्ट हुई लेकिन आज की सभ्यता स्वयं अपने ही कारणों से नष्ट होने की स्थिति में है।

सिंधु सभ्यता की लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। उसके कारण भी कई गुत्थिया अनसुलझी है। विभाजन के बाद राजननतिक कारणों से भी इन सभ्यताओं के आगे के खोज कार्य में निरंतर बाधा आती रही है। मुअनजोदड़ो की खुदाई बंद कर दी गई है। ऐसे में दोनों देशों की सरकारों से यही उम्मीद की जा सकती है वे अपने राजनीतिक भेदभाव को परे रखकर इतिहास के तथ्यों की पड़ताल करने में मददगार बने न की बाधक। जब तथ्य अपने आप में पवित्र होते हैं तो यह जरुरी हो जाता है कि तथ्यों की पड़ताल पूरी निष्ठा के साथ की जाए। अतीत की स्मृतियों को लेखक कैसे महसूस करता है। ‘मुअनजोदड़ो की खूबी यह है कि इस आदिम शहर की सड़को और गलियों में आप आज भी घूम-फिर सकते हैं। यहां की सभ्यता और संस्कृति का सामान चाहे अजायबघरों की शोभा बढ़ा रहा हो, शहर जहां था अब भी वहीं है। आप इसकी किसी भी दीवार पर पीठ टिका कर सुस्ता सकते हैं। वह कोई खॅड़हर क्यों न हो,किसी घर की देहरी पर पाॅव रख कर सहसा सहम जा सकते हैं, जैसे भीतर अब भी काई रहता हो। रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं।‘पृसं-49,50

अपनी जमीनी यात्रा में लेखक ने उस सभ्य अतीत को महसूस किया। उसकी गंध को वह आज भी उसको वहां महसूस करता है। इस किताब को पढ़ते हुए बार-बार अतीत की इस सबसे प्राचीन सभ्यता सभ्य होना अपने हुनर से समृद्ध होना, न कि अपनी हिंसा से! वहीं आज की सभ्यता का हथियारों से लेस होना उसके आगे कितने बोने होने का प्रमाण देता है। मनुष्य अपने नैतिक मानदण्डों से महान् बनता है और सभ्यता भी,लेकिन इस सभ्यता का आवरण इतना मोटा होता गया कि उसमें बाहर से मनुष्य भरता गया और अंदर से उतना ही रितता गया। माक्र्स की यह आदिम साम्यवाद की कल्पना मुअनजोदड़ो की सभ्यता में महसूस की जा सकती है।


मुअनजोदड़ो - ओम थानवी  (यात्रावृतांत)
वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
प्रसं-2011
मूल्य-100


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
कालुलाल कुलमी
(केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं पर वर्धा विश्वविद्यालय में शोधरत है )

गांव-राजपुरा,(महादेवजी के मंदिर के पास) पोस्ट-कानोड़,मो.--08947858202
जिला-उदयपुर. राजस्थान 313604
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1 टिप्पणी:

  1. Om ji ki is kriti ko apni maati ke madhyam se pathkon tak pahunchane ke liye sadhuwad. sindhu sabhyata ka vritant aise shabdon me Om ji ne guntha hai jo apni mahak se barbas apni or aakarshit karte hain... apni maati ki mahak ki tarah...!

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