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आचार्य नन्दलाल बसु: कलायात्रा और विरासत

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, दिसंबर 03, 2011 | शनिवार, दिसंबर 03, 2011


(आज नन्द बाबू का जन्म दिवस है और हम ये आलेख छापते हुए उन्हें याद कर रहे हैं.-सम्पादक )

उन्नीसवीं सदी के आरम्भ से ही यूरोपीयकला शैलियों और कला प्रयोगों के प्रतिरोध में भारतीय कला के पुनर्जागरण में जिन महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों ने समपूर्ण और सादगी से अपने-अपने कार्यक्षेत्र में प्रतिमान स्थापित किए, उनमें नन्दलाल बसु की अग्रणी भूमिका रही है। कलागुरू अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, अनान्य प्रेरक गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ओर प्रख्यात चित्रकार गगनेन्द्रनाथ ठाकुर के सानिध्य में अपनी कलाचार्या में निरंतर गतिशील एवं सक्रिय नंदलाल ने अपनी परम्परा और धरोहर की श्रेष्ठता को अनिवार्य रूप से ध्यान में रखा और उपादनों तथा उपस्करों का आवश्यकतानुसार उपयोग भी किया, जिनमें भारतीय समाज को नित्यनूतन एवं प्रासंगिक बनाए रखने की क्षमता थी। उनकी कला ने लोकजीवन, श्रृंगारशास्त्र और संगीत से प्रेरणा ली है। जीवंतता और उत्कृष्टकला की यही एक मात्र कसौटी मानी जाती है।     

नंदलाल बसु के चित्रों में अंकित कोमल, भव्य और मायावी मानव आकृतियों में एक अपूर्व रैखिकीय विशिष्टता वैसी ही प्रत्यक्ष है, जैसी अजन्ता के चित्रों में देखी जा सकती है। रंगों के पुट के निपुण वर्गीकरण सुचित्य विभाजन, काल्पनिक असंख्य रूपों की संरचना के कारण समस्त प्रकृति उस जीवन से गूंजने लगती है, जो जीवन अंतनिर्हित है और उसकी लय है। नन्दलाल बसु की कलासाधना एवं सर्जना भारतीय कला साधना एवं सर्जना भारतीय कला आंदोलन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पर्व है। इसे केवल बंगाल या भारत के मंच पर ही नहीं, विष्वकला मंच पर बड़े सम्मान के साथ रखा गया हे। 3 दिसम्बर 1883 को बिहार के मुंगेर जिले के हवेली खड़गपुर में जन्मे, पले-बढ़े शिल्पाचार्य नंदलाल बसु कला अध्ययन के लिए कोलकाता गए और सारे कला जगत के होकर रह गए। चित्रकारी की प्रेरणा नंदलाल को अपने माता-पिता और आस-पास के परिवेश से मिली। माँ क्षेत्रमणि देवी शिल्पकला में निपुण तथा पिता स्थापत्यकार थे और आसपास मंे कुम्हार, लोहार, बढ़ई आदि थे। 

स्कूली शिक्षा  हवेली खड़गपुर में पूरी करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए कोलकाता गए। कॉलेज की पढ़ाई में उनका मन नहीं लगा। लिहाजा, कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर वह गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट में दाखिल हो गए और उसके बाद, एक के बाद एक चित्रों के निर्माण का जो क्रम चला, वह उनके कला संसार को निरंतर समृद्ध करता चला गया। इनका परिचय एक से एक दिग्गज कलाकारों, कलाप्रेमियों, कलाजगत के मर्मज्ञों अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, आनन्दकेंटिश कुमार स्वामी, ई0 बी0 हॉवेल, सिस्टर निवेदिता से आरम्भ होकर 1910 में रविन्द्रनाथ से हुआ तो उन्हें प्रतीत हुआ कि अब उनका छोटा सा रंगपटल आकाश तक अपनी रंगिमा बिखेर सकेगा। 

बचपन से ही माँ से रामायण, महाभारत, चंडीमंगल, मनसामंगल तथा व्रत अनुष्ठान से जुड़ी अनेक धर्मगाथाओं तथ पावन पर्व की कहानियां सुन रखी थी। कस्बे के कुम्हारों को मूर्तियां गढ़ते और घर में व्रत तथा त्योहारों के समय अल्पना के अभिप्रायों तथा प्रचलित लोक आख्यानों एवं प्रतीकों को ध्यान से देखना उनका स्वभाव तथा व्यसन हो गया था, जिसका प्रभाव उनके चित्रों पर पड़ा। उनके चित्र पौराणिक तथा आख्यानधर्मा थे। आरम्भिक चित्रों में सती ओर सती का देहत्याग पहले ही चर्चित हो चुके हैं, जिन्हें इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आर्ट द्वारा पांच सौ रूपये के पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका था। अन्य चर्चित चित्रों में दयमन्ती स्वंयवर, गरूड़स्तम्भ के सामने चैतन्य, अहिल्या उद्वार तथा सिद्धार्थ एवं घायल हंस उल्लेखनीय है। यह वह दौर था, जब 1919 का जालियांवाला बाग नृशंस हत्याकांड और राजशाही के दमनचक्र के खिलाफ आंदोलनकारियों ने खुली बगावत शुरू कर दी। ब्रिटिष हुकूमत के खिलाफ रविन्द्रनाथ ने सरकारी ‘सर’ की उपाधि लौटा दी और इस बर्बरता के खिलाफ अपना वक्तव्य जारी किया। महात्मा गांधी और उनके तमाम सहयोगी देश की आजादी के लिए असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने लगे। लार्ड रोनाल्ड्स शांतिनिकेतन परिदर्शन के लिए पधारे और उन्होंने कला संबंधी गतिविधियों को बढ़ाने के लिए सरकारी अनुदान की पेशकश की तो रविन्द्रनाथ उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं कर पाए। इस पृष्ठभूमि में नंदलाल बसु ने यह तय कर लिया था कि उन्हें क्या करना है और उनकी कला सर्जना की दिशा कया होगी ? स्वदेशी आंदोलन के प्रति अटूट आस्था के कारण वे चित्र बनाने के लिए मिट्टी के रंगों ओर हाथ से बने नेपाली कागज का प्रयोग करते थे। यह देखकर चकित हुए बिना नहीं रहा जाता कि हजारों चित्रों के अलावा उन्होंनेे शांतिनिकेतन मंे जो भित्तिचित्र बनाए वे सभी इन इने-गिने मिट्टी रंगों से ही बने हैं, पर अनगिनत भाव व्यक्त करते हैं आज भी। 

कलाभावन के छात्रावास में मिट्टी से बनी कच्ची झोपड़ियाँ भी थीं वे वरिष्ठ छात्रों को मिलती थी। इनको उस रूप में बनाने के पीछे नंदलाल की भावना थी कि इन्हें हर साल लीपना-पोतना पड़ता है, पैर से छप्पर छाना पड़ता है, इससे गरीब संथाली को रोजगार मिलता है। गांधी जी के दृष्टिकोण से वे काफी प्रभावित थे। 12 मार्च 1930 को गांधी जी के दांडी-यात्रा शुरू की। उस दिन की याद में लाठी लेकर सुदृढ़ कदमों से आगे बढ़ते गांधीजी का उनका बनाया लीनोकट आज सारे विश्व में प्रसिद्ध हो चुका है। निरंतर आगे बढ़ते गांधी जी उसमें कितने विराट लग रहे हैं इसमें गांधी के देह से कही अधिक उनकी तेजोदीप्त आत्मा का चित्रण हुआ है। 

बापू और नंदलाल बसु एक दूसरे से परिचित हो चुके थे, लेकिन 1936 में लखनऊ कांगेस के समय एक-दूसरे के निकट आए। बापू ने कांग्रेस की साज-सज्जा और चित्र-प्रदर्शनी के आयोजन की जिम्मेदारी नंदलाल बसु को सौंपी। उन्होंने यह काम इतने सुन्दरढंग से किया कि अपने भाषण में बापू ने कहा - ‘‘नंदलाल बसु ने मेरी कल्पना को साकार कर दिया है वे सृजनात्मक कलाकार है, मैं नहीं हूँं। भगवान ने मुझे कला का विवेक तो दिया है, लेकिन इसे मूर्त रूप देने का कौशल नहीं दिया हे। मैं उन्हें धन्यवाद देता हूँ।’’

बापू के आग्रह पर फैजपुर (महाराष्ट्र) कांग्रेस अधिवेशन की सज्जा का भार नंदलाल बसु ने उठाया और ताड़, खजूर, बांस और मिट्टी के घड़ों जैसी मामूली चीजों से सौंदर्य की सृष्टि कीं इसके बाद उन्हें 1938 के हरिपुरा (गुजरात) कांग्रेस अधिवेशन के लिए उन्हें बुलाया गया। हरिपुरा कांग्रेस का कार्य शुरू करने से पहले नंदलाल बसु आस-पास के गांवों में जाकर वहाँ लोकजीवन का अध्ययन कर आए। इसके उपरांत उन्होंने जन-जीवन के जो चित्र बनाए, उनमें उस प्रदेश की विशिष्टता तो थी ही, भारतीय संस्कृति की एकता तथा अखंडता भी झलकती थी। लोक-कला की सरल, सहज, किन्तु बलिष्ठ शैली में बने ये चित्र कला जगत मे ‘हरिपुरा पोस्टर्स’ के नाम से विख्यात हुए। ‘दांडी-यात्रा के दौरान नमक उठाते गांधी जी ‘नोआखाली में गांधीजी’ नंदलाल बसु के बनाएं चित्र भारत के संविधान की मूल प्रति में बना है। शांतिनिकेतन में प्रार्थनारत गांधी और देहावसान खबर सुनकर बनाया गया रेखांकन प्रमुख है। 1951 में नंदलाल बसु कला भवन से सेवानिवृत हुए, इसके उपरांत 1956 में ‘शिल्प चर्चा’ की रचना कीं 16 अप्रैल 1966 को इस महानशिल्पी ने दुनिया को अलविदा कह दिया। नंदलाल बसु को कृतज्ञ राष्ट्र ने ढेर सारे सम्मान दिए। 1950 में बनारस हिन्दू विष्वविद्यालय द्वारा डी0 लिट् की उपाधि से नवाजे गए।1952 में विश्वभारती विश्वविद्यालय द्वारा ‘देशिकोत्तम’ सम्मान से 1953 में दादा भाई नेरौजी सम्मान से, 1954 में भारत सरकार द्वारा पद्मविभूषण सम्मान से, 1957 में कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा डी0 लिट् की उपाधि से, 1958 में ललितकला अकादमी द्वारा रजत जयंती पदक, 1963 में रवीन्द्र भारती विष्वविद्यालय द्वारा डी लिट् की उपाधि से और 1965 में टैगोर जन्म शताब्दी पदक से सम्मानित किया गया। नंदलाल बसु की जन्म भूमि मुंगेर के हवेली खड्गपुर साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच ‘संभवा’ द्वारा उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित की गयी है। उनके कालजयी व्यक्तित्व की महक उनकी कलाकृतियों में आज भी विद्यमान है।  

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

कुमार कृष्णन
स्वतंत्र पत्रकार
 द्वारा श्री आनंद, सहायक निदेशक,
 सूचना एवं जनसंपर्क विभाग झारखंड
 सूचना भवन , मेयर्स रोड, रांची
kkrishnanang@gmail.com
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