पुरुष लेखन जैसा कोई वर्गीकरण नहीं है तो स्त्री लेखन क्यों - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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पुरुष लेखन जैसा कोई वर्गीकरण नहीं है तो स्त्री लेखन क्यों



समन्वयआईएचसी भारतीय भाषा सम्मेलन में दूसरे दिन मुख्यतः साहित्य हाशिये के मुद्दों पर केंद्रित रहा। शनिवार सुबह 10.45 से शुरू हुए इन सत्रों में असमिया भाषा के सत्र में स्त्री लेखन की चुनौतियों, पंजाबी में दलित कविता में प्रेम, मलयालम में हाशिए की आत्मकथाएं और उर्दू सत्र में मुशायरे की परम्परा के सामने मौजूद चुनौतियों पर चर्चा हुई।

स्त्री लेखनः नई चुनौतियां, नई संभावनाएंविषय पर चर्चा करते हुए सभी वक्ताओं ने साहित्य मेंस्त्री लेखनजैसे वर्गीकरण को मानने से इनकार करते हुए कहा कि जब साहित्य में पुरुष लेखन जैसा कोई वर्गीकरण नहीं है तो स्त्री लेखन को अलग श्रेणी बना कर क्यों देखा जाना चाहिए। उन्होंने स्त्री लेखन को प्रोत्साहन के नाम पर सम्मनित करने जैसी प्रवृत्तियों को अस्वीकार करते हुए इस बात पर जोर दिया कि लेखन सिर्फ लेखन होता है उसे स्त्री और पुरुष के खानों में बांट कर नहीं देखा जा सकता।असमिया की प्रसिद्ध लेखिका अरूपा पतंगिया कालिता ने कहा कि असमिया के मौखिक साहित्य में स्त्री लेखन की परम्परा रही है, लेकिन आधुनिक साहित्य में महिलाओं का आगमन देर से हुआ है। इसकी एक वजह महिलाओं को शिक्षा और अवसरों के रूप में देखी जा सकती है। निश्चय ही स्त्री लेखन में स्त्री के पक्ष से चीजों को देखना और उनकी अभिव्यक्ति मुखर रहती है। सभी वक्ताओं ने इस बात को भी रेखांकित किया कि पूर्वोत्तर के लेखकों के सामने उनकी क्षेत्रीय पहचान भी एक चुनौती प्रस्तुत करती है।

प्रसिद्ध असमिया लेखिका मौशुमी कंदली ने कहा कि एक लेखक के रूप में आपके सामने यह भी चुनौती होती है कि आप यथार्थ को किस रूप में प्रस्तुत करते हैं क्योंकि इसी यथार्थ को पहले भी कई बार कहा जा चुका है। लोक साहित्य, संस्कृतिक और मौखिक परम्परा लेखन के लिए समृद्ध पृष्ठभूमि उपलब्ध कराते हैं। सत्र के संचालन करते हुए असमिया लेखिका नीतू दास ने स्त्री लेखन के सामने मौजूद चुनौतियों पर प्रश्न उठाए। चर्चा में बोंती संेशोवा, मानिका देवी ने भी भाग लिया।

पंजाबी भाषा के सत्र में दलित कविता में प्रेम विषय पर चर्चा करते हुए इस बात को रेखांकित किया गया कि दलित कविता नफरत की नहीं बल्कि प्रेम की कविता है। इस सत्र के दौरान पंजाबी लेखक मदन वीरा ने कहा कि दलित कवियों को सिर्फ सामाजिक स्तर पर ही हाशियाकरण का शिकार हुए बल्कि कविता में भी उन्हें हाशिए पर रखा गया है। लाल चंद दिल और संतरात उदासी जैसे कवियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हम आज इन कवियों को याद कर रहे हैं यह अच्छी बात है लेकिन जिस समय यह कवि लिख रहे थे उस समय उन्हें सामाजिक स्तर पर ही नहीं साहित्य जगत में भी स्वीकृति नहीं मिली। समन्वय ने पंजाबी दलित कविता को मंच उपलब्ध करा कर एक सराहनीय प्रयास किया है। इस अवसर पर बलवीर माधोपुरी ने कहा कि पंजाबी दलित कविता अपने हक की बात करती है और अपने हक की बात करना किसी दूसरे का हम छीनना नहीं है। सत्र में निरुपमा दत्त और स्वराजबीर ने भी भागीदारी की। सत्र का संचालन देशराज काली ने किया।

मलयालम में हाशिए की आत्मकथाएं इस सत्र के संचालन करते हुए प्रसिद्ध कवि के. सच्चिदानंदन ने कहा कि आत्मकथाएं सिर्फ व्यक्ति की अंतर्यात्रा ही नहीं होती बल्कि वे वृहत्तर जीवन को भी कहती हैं। प्रसिद्ध साहित्कार सी.के जानू ने आदिवासी साहित्य को सामने लाने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि आदिवासी स्त्रियां स्थितियों की दोहरी शिकार होती हैं। सिस्टर जेस्मी ने चर्च के अंदर हाशियाकरण के अनुभवों को इस मंच पर साझा किया। नलिनी जमील ने इस चर्चा को आगे बढ़ाया। प्रमुख पर्यावरणविद पोकुड्डन ने केरल की राजनीति की चर्चा करते हुए दलित पहचान से जुड़े मसलों का भी जिक्र किया।

उर्दू सत्र में मशहूर शायर शीन काफ निजाम, प्रोफेसर सादिक, आलोक श्रीवास्तव के साथ गिरिराज किराडू ने उर्दू मुशायराः माजी और मकाम पर जोरदार बहस की। सभी शायरों ने इस बात को मानने से इनकार किया कि मुशायरा की परम्परा खत्म हो रही है बल्कि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि मुशायरा बदल रहा है। श्रोताओं के सवाल जवाब के बाद सभी शायरों ने अपनी कुछ गजलें भी श्रोताओं के सामने प्रस्तुत कीं।दिन के समापन पर निजामी बंधुओं की गाई कव्वालियों से हुआ, जिनका श्रोताओं ने देर रात तक आनंद उठाया।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-प्रेस विज्ञप्ति
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