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संस्मरण:-व्यवस्था विरोधी अदम गोंडवी अपनी आंदोलनपरक कविताओं के साथ जिए

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, दिसंबर 19, 2011 | सोमवार, दिसंबर 19, 2011


 हम जनकवि रामनाथ सिंह उर्फ अदम गोण्डवी को नहीं बचा सके। उनका निधन अठ्ठारह दिसंबर को सुबह तड़के लखनऊ के एसजीपीजीआई में हो गया। वे लीवर सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित थे। पिछले सोमवार को जब उनकी हालत काफी बिगड़ गयी तब उन्हें लखनऊ लाया गया। उनको बचाने की कोशिशें जारी थी। उनकी बीमारी को लेकर जिस तरह की चिन्ताएँ दिख रही थीं, उससे अदम की लोकप्रियता और उनके चाहने वालों के बारे में पता चलता है। धन इनकी बीमारी में कोई समस्या न बने, इसके लिए सभी जुटे थे। ‘जनसंदेश टाइम्स’ जैसे अखबार लगातार सक्रिय थे। उनकी तिमारदारी में कोई कमी न रह जाय, इसमें उनका बेटा आलोक व भतीजा दिलीप लगे थे। पर हमारे लिए इससे बड़ा आघात और क्या हो सकता है कि हम उन्हें नहीं बचा सके। अपनी नम आंखों से हमने उनके मृत शरीर को गोण्डा के लिए विदा किया। वे अपने पीछे एक पुत्र आलोक कुमार को छोड़ गये हैं। उनका अन्तिम संस्कार गोंडा में उनके गांव आटा परसपुर में आज दोपहर बारह बजे होगा।  

22 अक्तूबर 1947 को गोंडा के परसपुर आटा गांव में जन्मे अदम विद्रोह की परम्परा के कवि रहे हैं। उनकी गजलों और कविताओं का संग्रह ‘धरती की सतह पर’ और ‘समय से मुठभेड़’ काफी चर्चित और लोकप्रिय रहा है। अदम 1980 के दशक में अपनी व्यवस्था विरोधी तथा आंदोलन परक कविताओं से चर्चा में आये। जनता की भाषा में जनता की बात करने वाले कवि की उनकी पहचान बनी। ‘चमारों की गली से’ उन दिनों अमृत प्रभात में छपी और काफी चर्चित हुई। अदम का जन्म उस साल हुआ, जब देश आजाद हुआ था। आजादी के जवान होने के साथ वे जवान हुए। उन्होंने इस आजाद हिन्दुस्तान में गरीब को गरीब और अमीर को और अमीर होते देखा और बढ़ती विषमता को अपनी कविता में इस तरह व्यक्त किया: ‘सौ में सŸार आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं, दिल पर रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है’ और ‘ कोठियों से मुल्क के मेयार को मत आंकिए, असली हिन्दुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है’।

वे गोण्डा के ‘पहचान सांस्कृतिक संगठन’ के संस्थापकों में रहे। उनका राजनीतिक जुड़ाव इण्डियन पीपुलस फ्रंट जैसे क्रान्तिकारी संगठनों से था जिसका असर उनकी कविताओं में दिखता है। गांधीवाद पर जहाँ वे प्रहार करते है, वहीं नक्सलवाद के फलसफे पर यकीन करते हैं। बाद में वे जनवादी लेखक संघ से भी जुड़े। उनका किसी संकीर्णता में विश्वास नहीं था और व्यापक वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन के पक्षधर थे। धोती और कमीज पहने, गंवार सा दिखने वाला यह कवि जब कविता पढ़ता तो आपको अन्दर तक हिला देता। जनता की चेतना को बदल देने वाला हैं ये कविताएँ।  अदम सभी मंचों पर जाते थे। पर  बात अपनी करते थे, किसी को अच्छा लगे या बुरा इससे बेपरवाह।  एक घटना याद आ गई। केरल की वामपंथी सरकार ने 1980 के दशक में त्रावनकोर कोचीन जनसुरक्षा कानून 1950 को रिवाइव किया था और मलयालम भाषा के कवि सचिदानन्द को इस कानून के तहत गिरफ्तार किया था। अदम ने जनवादी लेखक संघ के मंच से केरल की वामपंथी सरकार के इस कदम की आलोचना की थी।

आजादी के बाद की ऐसी कौन सी समस्या है जिस पर अदम ने कविताएँ नहीं की है। 1990 के दशक में जब साम्प्रदायिकता जैसी समस्या से देश जूझ रहा था। उन्होंने साम्प्रदायिकता के खिलाफ कविताएँ की। साझी संस्कृति की रक्षा के लिए चले आंदोलन में वे न सिर्फ शामिल थे बल्कि वे जानते थे कि यह सब भूख व गरीबी की लड़ाई को भटकाने की साजिश है। इसलिए वे कविता में आहवान करते हैं: ‘छेड़िए इक जंग, मिलजुल कर गरीबी के खिलाफ/ दोस्त, मेरे मजहबी नग्मात को मत छेड़िए’।

यह ऐसा दौर है जब कविता अपठनीय हुई है। कविता में कलावादी आग्रह बढ़ता जा रहा है। जन आंदोलन भी शिथिल है। जन प्रतिरोध की बात बेमानी है। अदम ऐसे कवि हैं जो हमारे अन्दर जन प्रतिरोध की मशाल जलाते हैं। हमें जिन्दगी के ताप को गहरे महसूस कराते हैं। इनकी कविता में जिन्दगी व समाज को बदलने की ललकार है, व्यवस्था के विरुद्ध बगावत है। वे चाहते हैं कि कविता, अदब मुफलिसों की अंजुमन तक पहुँचे, उनकी आवाज बने:

‘भूख के एहसास को शेरो-सुखन तक ले चलो
या अदब को मुफलिसों की अंजुमन तक ले चलो।’


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
जन संस्कृति मंच,लखनऊ के संयोजक हैं.लखनऊ-कवि,लेखक  के होने साथ ही जाने माने संस्कर्तिकर्मी हैं.

एफ - 3144, राजाजीपुरमलखनऊ - 226017
मो - 08400208031, 09807519227
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