''समाजिक बदलाव के लिए शायरी का ज़िंदा रहना ज़रूरी है ''-डॉ॰ अजीज इंदौरी - अपनी माटी

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शुक्रवार, दिसंबर 16, 2011

''समाजिक बदलाव के लिए शायरी का ज़िंदा रहना ज़रूरी है ''-डॉ॰ अजीज इंदौरी

इंदौर 

तरक्कीपसंद तहरीक ने हमेशा ही कवियों और शायरों को एक रास्ता दिखाया है। समाजिक बदलाव के लिए समाजी जंग छेड़ने के काम में आज भी यही पहलू हमारी शायरी का एक अहम हिस्सा बना हुआ है। हम इससे मुंह नहीं मोड़ सकते। यह कहना है प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष मंडल के सदस्य डॉ॰ अजीज इंदौरी का। वे इंदौर इकाई द्वारा आयोजित शहर के चार कवियों के रचनापाठ कार्यक्रम में शायरी की रवायत के सिलसिले पर रौशनी डाल रहे थे। इस मौक पर डॉ॰ अजीज अंसारी, इहसाक असर, ब्रजेश क़ानूनगो व युवा कवि नवीन रांगियाल ने कविता पाठ किया। 

अजीज इंदौरी ने कहा कि अमीर हनफी शहर में तरक्की पसंद तहरीक के बड़े शायर हुए। उन्होंने कहा कि समाजी सरोकार से विहीन कविता से कुछ हासिल नहीं होता। उद्देश्यहीन व दिशाहीन साहित्य किस तरह हल्का हो जाता है इसकी उदाहरण हम आजकल होने वाले मुशायरों व कवि सम्मेलनों में देख सकते हैं। ये मुशायरे तीन पायों पर टिके रहते हैं। पहला फायनेंसर, दूसरा वे लोग जो इनमें शायरों और कवियों को बुलाते हैं और तीसरे मुशायरों को सुनने वाले। जो लोग फायनेंसर हैं उनका शायरी से कोई सरोकार नहीं हैं। जिन्हें शायरों को बुलाने का काम सौंपा गया है वे अपनी समझ और नेटवर्क के लोगों को इसमें शामिल करते हैं। इन दोनों के सहयोग से हुए मुशायरे को जो लोग सुनने जाते हैं। उन्हें इन दोनों को झेलना होता है। इस मौके पर अजीज साहब ने अपनी शायरी जंग तथा जाने क्या क्या बोल रही हूं सुनाई। 

कार्यक्रम का संचालन प्रो. हदीस अंसारी ने किया। कार्यक्रम में याकूब साकी, तारीक शाहीन, फरयाद बहादुर, अजीज इरफान, संजय पटेल, सुबोध होलकर, राजकुमार कुंभज, केसरी सिंह चिढार, प्रो. जाकिर हुसैन, भारत सक्सेना, राजेश पाटील, अमित श्रीवास्तव, चुन्नीलाल वाधवानी आदि शामिल थी 

प्रो. अजीज इंदौरी की कविता जंग

जंग फिर जंग है जंग से मिलता क्या है
राख के ढेर में शोलों के अलावा क्या है
राख को कोई कुरेदे तो भड़कते शोले, 
िफक्रो अहसास को जला देते हैं
सारे मंसूबों को मिट्टी में मिला देते हैं। 
जंग की आग बड़ी तेज हुआ करती है
जंग के शोलों में तारीख जला करती है
जंग भूख और गरीबी बढ़ा देती है। 
जंग इंसान को मुश्किल में फंसा देती है
जंग से सिर्फ अँधेरे  ही मिला करते हैं 
जंग के मारे हुए ख्वाब जिया करते हैं।  
मैं जाने क्या क्या बोल रहा हूं 
मैं जाने क्या क्या बोल रहा हूं 
अक्सर मालूम हुआ है जैसे 
अपने अंदर के राजों को खोल रहा हूं
िफक्रो नज़र की निजामों पर 
जात को अपनी तोल रहा हूं। 
मैं जाने क्या क्या बोल रहा हूं। 

कार्यक्रम के दूसरे शायर इहसाक असर ने तरक्कीपसंद तहरीक के बारे में अपने ख़्यालात इस शेर से जाहिर किए। 

हम उसकी राह से पत्थर हटाने आए हैं 
ये दुनिया सोच रही है दीवाने आए हैं 
हमारी िफक्र के अहसासमंद आइने 
हमें अपना ही चेहरा दिखाने आए हैं 
रजाई अब्र की मत ओढ़ 
चांद बाहर आ 
सितारे तुम से निगाहें मिलाने आएं हैं। 
उनका अगला शेर था 
हम सोचते रहते तो हल भी निकलता 
हम र्दीपक भी जलाते तो काजल निकलता 

इस मौके पर कवि ब्रजेश क़ानूनगो ने ग्लोबल प्रोडक्ट, भूकंप के बाद, इस गणराज्य में आजादी, पत्थर कीघट्टी आदि कविताएं सुनाई जिसमें समय को बदलते हुए देखने की विवशता व असहायता के बीच झूलते एक आदमी की व्यथा दिखाई देती है। 

पत्थर की घट्टी
पत्थर के वृत्ताकार ये दो शिल्प
जो निकल आए हैं खुदाई के दौरान
कुछ और नहीं
घट्टी के  दो पाट हैं।
समय की कई परतों से
़ढ़की हुई थी यह घट्टी
जो निकल आई है, अभी अभी 
छुपे हुए खजाने की तरह।
स्मृतियों का महीन आटा
दिखाई दे रहा है 
इनके बीच से निकलता हुआ।

घर के एक कोने में
रखी होती थी कभी यह
पुरानी फिल्मों  की हवेलियों मे जैसे 
सजा होता है कोई पियानो। 
घर आंगन के साथ होता था शृंगार इसका
बहन बांधती थी राखी
इसके  हत्ते पर
मिट्टी का दीपक जलाती थी मां
इसके पाटों पर 
लक्षमी पूजन के समय।
प्रभातफेरी  पर निकले सज्जनों के गान के साथ 
शुरू होता था दादी का घट्टी घुमाना
लोरी की तरह फूट प़ड़ती थी ग़ड़ग़ड़ाहट
जो नींद के सुखद संसार में फिर से ले जाती थी 
जागते हुए बच्चों को।
 

भूकंप के बाद कविता

भूकंप के बाद
एक और भूकंप आता है हमारे अंदर।
विश्वास की चट्टानें
बदलती है अपना स्थान
खिसकने लगती है विचारों की आंतरिक प्लेट 
मन के महासागर में उम़ड़ती है संवेदनाओं की सुनामी लहरें
तब होता है जन्म कविता का।
भाषा शिल्प और शैली का
नही होता कोई विवाद
मात्राओं की संख्या
और शब्दों के वजन का कोई मापदंड
नहीं बनता बा़धक
वि़धा के अस्तित्व पर नहीं होता कोई प्रश्नचिन्ह्
चिंता नहीं होती सृजन के स्वीकार की। 
अनप़ढ़ किसान हो या गरीब मछुआरा
या िफर चमकती दुनिया का दैदीप्य सितारा
रचने लगते हैं कविता। 

कविता ही है जो
मलबे पर खिलाती है फूल
बिछु़ड़ गए बच्चों के चेहरों पर
लौटाती है मुस्कान
बिखर जाती है नईबस्ती की हवाओं मे
सिकते हुए अन्न की खुशबू। 
अंत के बाद
अंकुरण की घोषणा करतीं
पुस्तकों में नहीं
जीवन में बसती है कविताएं।

गुम हो गए हैं रेडियो इन दिनों
बेगम अख्तर और तलत मेहमूद की आवाज की तरह
कबाड मे पडे रेडियो का इतिहास जानकर
फैल जाती है छोटे बच्चे की आंखें
न जाने क्या सुनते रहते हैं
छोटे से डिब्बे से कान सटाए चौ़धरी काका
जैसे सुन रहा हो नेताजी का संदेश 
आजाद हिंद फौज का कोई सिपाही
स्मृति मे सुनाई पडता है
पायदानों पर चढता
अमीन सयानी का बिगुल
न जाने किस तिजोरी में क़ैद है

देवकीनंदन पांडे की कलदार खनक
हॉकियों पर सवार होकर
मैदान की यात्रा नही करवाते अब जसदेव सिंह
स्टूडियो में गूंजकर रह जाते हैं

युवा कवि नवीन रांग्याल ने अश्वथामा ने कहा था,फिरकती लड़कियों में, किस्तों के सहारे व शेरी, कोन्याक स्लिबों  वित्से नामक कविताएं सुनाई। 

फिरकती ल़ड़कियों में
बोरियत से भरी गरमियों की
उन तमाम बोझिल दोपहरों में
कुछ मिनट  की आराम तलब
झपकी लेने के बजाऐ
घंटों इंटरनेट पर
तुम्हे खोजता रहा.
गूगल की उस विशालकार
समुद्रीय टेक्नोलॉजी पर भी
तुम मुझे नहीं मिली.
और में कई दोपहरों में
की - बोर्ड पर
तुम्हारी आवाजें तलाशता रहा.
कई आईने बनाए
ह़ज़ारों चहरें उलटता
और पलटता रहा रात भर।  
                                 


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


प्रेमचंद गांधी'कुरजां' पत्रिका के सम्पादक
लेखक और कवि
जयपुर,राजस्थान

09829190626
prempoet@gmail.com
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