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''मध्यवर्गीय दोगलेपन की एक-एक परत को ‘रेहन पर रग्घू’ हमारे सामने रखता है। ''विश्वनाथ त्रिपाठी

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, दिसंबर 23, 2011 | शुक्रवार, दिसंबर 23, 2011


वरिष्ठ साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी (पुखराज जाँगिड से हुई बातचीत पर आधारित)

काशीनाथ जी 
प्रतिष्ठित कथाकार काशीनाथ सिंह को उनकी औपन्यासिक कृतिरेहन के रग्घूके लिए 2010 का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिलना हिंदी साहित्य के लिए बहुत ही शुभ समाचार है और हिंदी समाज को इसका स्वागत करना चाहिए। काशीनाथ सिंह बेहद प्रतिभाशाली और अपने ढंग के अकेले लेखक हैं। अरसे से लिख रहे काशीनाथ सिंह ने कथासाहित्य में अपनी जगह बनाई है। काशीनाथ सिंह के साहित्य की विषयवस्तु और उसकी भाषा उन्हें अपने समकालीनों से अलग और उल्लेखनीय बनाती है। उनकी बतकही की आख्यानपरक शैली और बनारसी लहजे वाली ठेठ भाषा का रचनाशिल्प साहित्यप्रेमियों के लिए हमेशा से गहरे आकर्षण का विषय रहा है। 

काशीनाथ सिंह की भाषा उनकी रचनात्मक उत्कृष्टता और लोकप्रियता का एक महत्त्वूर्ण आधार भी है। उनकी कहानियों में भारतीय जीवन को समग्रता में देखा-परखा जा सकता है। अपना मोर्चा’, ‘काशी का अस्सीऔररेहन पर रग्घूविषय और शिल्प दोनों के लिहाज से काशीनाथ सिंह के बेहतरीन उपन्यास हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंनेघर का जोगी जोगड़ाऔरयाद हो कि याद होजैसे उत्कृष्ट कोटि के संस्मरण लिखे हैं। इधर चंद्रप्रकाश दिवेदी उनकेकाशी का अस्सीको लेकर एक फिल्म भी बना रहे हैं।

काशीनाथ सिंह के बहुचर्चित उपन्यासकाशी का अस्सीका शीर्षक बहुत ही सुविचारित है। इसके दो अर्थ हैं। एक तो काशी माने बनारस और दूसराकाशी माने काशीनाथ सिंह। यानी काशीनाथ सिंह ने काशी से एका कर लिया है और दोनों एक-दूसरे के पर्याय हो गए हैं। काशी मतलब काशीनाथ सिंह और काशीनाथ सिंह मतलब काशी। इस मायने मेंकाशी का अस्सीके बादरेहन पर रग्घूउनके साहित्य की एक विशिष्ट उपलब्धि है। इसमें वे अपनेनगरसे अपनेघरकी ओर आते हैं और जीवन के प्रत्येक कोने को खंगालते हैं। इस लिहाज सेरेहनपर पलतेरघुके सपने को व्याख्यायित करता उपन्यास का शीर्षक (‘रेहन पर रग्घू’) भारतीय मध्यवर्ग के जीवन की विडंबना को गहराई से स्पष्ट करता है। 

रेहन पर रग्घूका परिवेश चाहे घर का हो या बाहर का, संदर्भ चाहे जीवन के हो या मृत्यु के, व्यक्ति खुद को हमेशा जोखिमों में घिरा हुआ पाता हैं। गंवई गंध उनके अपने जीवन संघर्ष को तो गरिमा प्रदान करती ही है, वह उनके रचे पात्रों को भी जीवंतता बनाती है। गाँव उनके पात्रों की आत्मा में रचा-बसा है इसीलिए सबकुछ के बावजूद नगरीय परिवेश की कालिमा उन्हें अपनी चपेट में नहीं ले पाती। उनकी यही विशेषता उनकी रचनाओं को भारतीय संदर्भ प्रदान करती है।रेहन पर रग्घूके रघुनाथ भूमंडलीकृत होते समाज में लगातार हाशिए पर धकेली जा रही संस्कृति के प्रतीक के रूप में हमारे सामने आते है।उपन्यास उदारीकरण के बाद के भारतीय परिवेश में, उसकी सामाजिक संरचना में तेजी से आए उन आत्मघाती बदलावों को चिह्नित करता है, जिन्होंने भारतीय समाज को भीतर-ही-भीतर खोखला बना दिया है। मध्यवर्गीय दोगलेपन की एक-एक परत को यह बड़े ही प्रभावशाली ढंग से हमारे सामने रखता है। असल में, ‘रेहन पर रग्घूके रघुनाथ की कहानी आत्मीयता के पुलों के ढहने की कहानी भी है।

काशीनाथ सिंह ने अपनी रचनाओं में शहर में गाँव कैसे प्रवेश कर रहा है और गाँव में शहर कैसे प्रवेश कर रहा है, को बहुत ही बारीकी से दिखाया है। गाँव और शहर दोनों आपस में घुल-मिलकर किस तरह से एक नई संस्कृति का निर्माण कर रहे हैं, इसे उनके साहित्य में देखा जा सकता है। मैं समझता हूँ कि प्रेमचंद ने जो सिलसिलागोदानसे शुरू किया था, उनका साहित्य उसी परंपरा का विकास है। काशीनाथ प्रगतिशील दृष्टिकोण के लेखक हैं। बात चाहे नारी समस्या की हो या दलित समस्या या भाषा की समस्या या राजनैतिक समस्या की, उन सारी समस्याओं के प्रति काशीनाथ सिंह का दृष्टिकोण प्रगतिशील है। लेकिन वे लेखक भी हैं, इसलिए उनकी जो प्रगतिशीलता है, वह अपने ढंग से आई है। उनकी रचनाओं में समस्याओं के प्रति एक ऐतिहासिक और विचारधारात्मक दृष्टिकोण मिलता है और वह लेखक के माध्यम से आया है इसलिए उसमें लेखक का अपना व्यक्तित्त्व और उसकी अपनी शैली मिलती है। 

संभवतः पूरे भारतीय साहित्य में यह पहली बार हुआ है कि दो भाइयों को साहित्य के लिए यह पुरस्कार मिला है और यह अपने आप में एक अद्वितीय बात है। इससे पहले 1971 में नामवर सिंह कोकविता के नए प्रतिमान’ (आलोचना) के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिल चुका है। काशीनाथ सिंह सीधे, सच्चे और गंभीर व्यक्ति हैं। उन्होंने जीवन में गहरा संघर्ष किया है। वंचितों पीड़ितों के प्रति उनके मन में बहुत सहानुभूति है, इसीलिए महाश्वेता देवी उन्हेंतीसरी कसमका हीरामन कहती हैं। वे नामवर जी के अनुज हैं लेकिन नामवर जी के व्यक्तित्त्व का उन्हें कोई लाभ नहीं मिला। उन्होंने उसे पार करके अपनी एक अलग छवि बनाई है।


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