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''व्यवस्था का विरोध अदम गोंडवी का मूल स्वर है।''- इप्टा,जसम,प्रलेस व जलेस

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, दिसंबर 25, 2011 | रविवार, दिसंबर 25, 2011


लखनऊ, 24 दिसम्बर। 
अदम की कविताएँ जनता की भाषा में जनता की बात करती है। इनमे तल्खी व बेचैनी है। व्यवस्था का विरोध इनका मूल स्वर है। अदम ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन वे जनता के दुख दर्द व उसके अनुभव से गहरे रूप से जुड़े थे। स्वाघ्याय के माध्यम से उन्होंने अपने को सचेतन रूप से विकसित किया था। वे ऐसे दौर में सक्रिय रहे जब जन आंदोलन व जन प्रतिरोध शिथिल रहा है। ऐसे दौर में अदम हमारे अन्दर जन प्रतिरोध की मशाल जलाते हैं। हमें जिन्दगी के ताप को गहरे महसूस कराते हैं। इस अर्थ में वे नागार्जुन, दुष्यंत, गोरख पाण्डेय व धूमिल की तरह जनता के बड़े कवि हैं। उनका असमय जाना हिन्दी की प्रगतिशील व जनवादी काव्यधारा की बड़ी क्षति है।

यह विचार आज अदम गोण्डवी की स्मृति में आयोजित सभा में उभर कर आये। इस सभा का आयोजन इप्टा, जसम, प्रलेस व जलेस ने संयुक्त रूप से किया था। इसकी अध्यक्षता करते हुए कथाकार गिरीश चन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि उनकी कविता में गहराई और सादगी है। ये ऐसे कवि है जो सबको प्रेरित करते हैं। इनकी याद में  स्मृति सम्मान का आयोजन किया जाना चाहिए ताकि संघर्षशील कवियों व लेखकों को प्रोत्साहित किया जा सके। कार्यक्रम का संचालन जसम के संयोजक कौशल किशोर ने किया। कार्यक्रम के अन्त में यह घोषणा भी की गई कि अदम को लेकर गोण्डा व लखनऊ में सभी संगठन मिलकर जल्दी ही बड़ा कार्यक्रम आयोजित करेंगे जिसमें उनके साहित्यिक योगदान पर विस्तार में चर्चा होगी।

इस स्मृति सभा को इप्टा के राकेश, वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव, कवि व आलोचक चन्द्रेश्वर, वरिष्ठ लेखक शकील सिद्दीकी, नाट्य निर्देशक सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ व राजेश कुमार, ‘जनसंदेश टाइम्स’ के संपादक सुभाष राय, कथाकार दयानन्द पाण्डेय, रंगकर्मी मृदुला भारद्वाज, कलम विचार मंच के प्रतुल जोशी, रामकिशोर, अलग दुनिया के के0 के0 वत्स, कवि श्याम अंकुरम आदि ने संबोधित किया और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की।  

अदम को याद करते हुए वक्ताओं का कहना था कि अदम कबीर परम्परा के कवि रहे हैं। इनका जीवन उस किसान की तरह रहा, जो अभाव में जीता है। यही अभाव अदम के जीवन में रहा। उनके लिए कविता करना धन व ऐश्वर्य जुटाने, कमाई करने का साधन नहीं रहा बल्कि उनके लिए शायरी करना, गजलें लिखना सामाजिक प्रतिबद्धता थी, समाज को बदलने के संघर्ष में शामिल होने का माध्यम था।  अदम में सच को कहने का साहस व कला दोनों है। धोती और कमीज पहने, गंवार सा दिखने वाला यह कवि जब कविता पढ़ता था तो सुनने वालों को अन्दर तक हिला देता। उनकी कविताएँ जनता की चेतना को बदल देने वाली हैं। 

1990 में साम्प्रदायिकता के विरुद्ध सांस्कृतिक यात्रा को याद करते हुए वक्ताओं का कहना था कि सारी यात्रा अदमजी हमारे साथ थे और उनकी कविताएँ हमें संघर्ष के लिए नया आवेग देती थीं। वे व्यापक वामपंथी सांस्कृतिक आंदोलन के पक्षधर थे। अदम सभी मंचों पर जाते थे। पर  बात अपनी करते थे, किसी को अच्छा लगे या बुरा इससे बेपरवाह। अपनी जिन्दगी में और अपनी कविता में उनका यही रूप मौजूद है जहाँ वे समझौता नहीं, संघर्ष करते हुए मिलते हैं। यही जीवटता अदम में उस समय भी दिखी जब वे मौत से पंजे लड़ा रहे थे। कार्यक्रम कं अन्त में दोमिनट का मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। 

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

जन संस्कृति मंच,लखनऊ के संयोजक हैं.लखनऊ-कवि,लेखक  के होने साथ ही जाने माने संस्कर्तिकर्मी हैं.

एफ - 3144, राजाजीपुरमलखनऊ - 226017
मो - 08400208031, 09807519227
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