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डा. मनोज श्रीवास्तव की कविता 'डिठौना '

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, दिसंबर 26, 2011 | सोमवार, दिसंबर 26, 2011



डिठौना
जब भी काजल आँजा 
लाल की आँखों में,
उजले भाल पर टीप दिया
डिठौना...
डाहती बुरी नज़रों से
टोने-टोटकों, भुतही हवाओं से
कलेज़े को सुरक्षा कवच
पहनाने के लिए

ममता-भरा मन
जुड़ा गया
हुलसा-हरसा गया

ग़लचौरा-बतकही जी-भर की
मनासेधुओं का नैन-मटक्का भी झेला
खेत-खलिहानों में मजूरी करते हुए भी
निश्चिन्त रही सारे दिन,
बबुआ खेलता रहा
भयानक खोहों-बिलों के इर्द-गिर्द
घुटनों-हथेलियों से लिसढ़कर
यात्रा करता रहा
झरबेरियों के जंगल में
कई बार साँप छूकर चला गया
गोज़र-बिच्छी उसके बदन पर रेंग गए
और जब साँझ भए
वह माई के कोरा में लपका
तो पहले से ज्यादा खिलखिलाया

ममता के मज़बूत अंगूठे ने
उसके मटमैले माथे पर
फिर, बरबस टीप दिया
डिठौना...
गालों पर असंख्य चुम्बन अंकित किए
हथेलियाँ कानों के पास घुमाकर
उसकी चिरायु की कामना की

माँ!
अपने स्वर्गस्थ हाथ निकालकर
मेरे प्रौढ़ भाल पर टीप दो
अमिट डिठौना का अमर छाप
और तितिक्षाओं से भर दो
मेरा मनोबल कि मैं
लड़ सकूं
अपनी उम्र और देह से बाहर भी
और दे सकूं
झुलसे-झुराए जगत को
संतोष का अक्षत वरदान

माँ! तुम
संसार के माथे पर भी
टीप दो एक अमिट डिठौना
और दे दो इसे
अभयदान!

(कभी ये कविता 'समकालीन भारतीय साहित्य' (साहित्य अकादमी, नई दिल्ली की पत्रिका) में प्रकाशित हुई थी)

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


डा. मनोज श्रीवास्तव 
आप भारतीय संसद की राज्य सभा में सहायक निदेशक है.अंग्रेज़ी साहित्य में काशी हिन्दू विश्वविद्यालयए वाराणसी से स्नातकोत्तर और पीएच.डी.
लिखी गईं पुस्तकें-पगडंडियां(काव्य संग्रह),अक्ल का फलसफा(व्यंग्य संग्रह),चाहता हूँ पागल भीड़ (काव्य संग्रह),धर्मचक्र राजचक्र(कहानी संग्रह),पगली का इन्कलाब(कहानी संग्रह),परकटी कविताओं की उड़ान(काव्य संग्रह,अप्रकाशित)

आवासीय पता-.सी.66 ए नई पंचवटीए जी०टी० रोडए ;पवन सिनेमा के सामने,
जिला-गाज़ियाबाद, उ०प्र०,मोबाईल नं० 09910360249
,drmanojs5@gmail.com)
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