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कोलाहल और रचनात्मकता से भरा-पूरा साल

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, दिसंबर 27, 2011 | मंगलवार, दिसंबर 27, 2011


लेखकों के जन्म शताब्दी समारो हों, संगोष्ठियों , पुस्तक लोकार्पणों, साहित्यिक विवादों, शोक सभाओं आदि के बीच 2011 भी कैलेंडर से दाखिल-खारिज होने वाला है। साहित्यिक दृष्टि से यह वर्ष रचनात्मकता से भरपूर रहा और विभिन्न विधाओं में अनेक उल्लेखनीय कृतियां आई लेकिन प्रख्यात उपन्यासकार श्रीलाल शुक्ल, आलोचक चंद्रबली सिंह, कमला प्रसाद, भवदेव पांडे और कुबेर दत्त जैसे साहित्यकारों के निधन से साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति भी सहनी पड़ी। वर्ष के अंत में साहित्य की विभिन्न विधाओं का वाषिर्क लेखा-जोखा भारत भारद्वाज की कलम से

उपन्यास
यूं तो इस वर्ष लगभग ढाई दर्जन उपन्यास प्रकाशित हुए लेकिन गुणवत्ता की दृष्टि से कुछ ही महत्वपूर्ण माने जा सकते हैं। हिन्दी में ऐतिहासिक उपन्यास लिखने की लंबी परंपरा रही है लेकिन अब इस क्षीण परंपरा को मेवाराम ने ‘सुल्तान रजिया’ से पुनर्जीवित किया है। इसके माध्यम से मेवाराम ने सुदूर कालखंड को जीवंत किया है। सहज भाषा- शैली के कारण यह उपन्यास अंत तक पाठकों को अपनी गिरफ्त में लिए रहता है। मंजूर एहतेशाम का नया उपन्यास ‘मदरसा’उनके अन्य उपन्यासों की भाव-भूमि से हटकर है। इसमें स्मृतियों से गुजरते हुए वे पात्रों के आभ्यांतरिक दुनिया में हो रहे परिवर्तन को लक्षित करते चलते हैं, साथ-साथ उन सवालों से भी टकराते हैं जो पीछे छूट गये। संजीव के नये उपन्यास ‘रह गई दिशाएं इसी पार’ की कथा- भूमि उनके पिछले उपन्यासों से भिन्न है। उपन्यास के घेरे में जीवन-मृत्यु के दो छोर हैं, जिसके बीच में मिथ, इतिहास, विज्ञान, प्रौद्योगिकी ही नहीं जैविकी भी है। यह सराहनीय प्रयास है लेकिन उपन्यास की जटिल संरचना सामान्य पाठकों के लिए दुबरेध साबित हो सकती है। इस वर्ष असगर वजाहत के दो छोटे-छोटे उपन्यास ‘पहर-दोपहर’ और ‘मन-माटी’ प्रकाशित हुए। असगर भाषा-शैली के मामले में सावधान लेखक हैं। इसलिए भी उनके छोटे उपन्यास संवेदना को झकझोरते हैं। विनोद कुमार शुक्ल का नया उपन्यास ‘हरी घास की छप्परवाली झोपड़ी और बौना पहाड़’

विलक्षण कथा शैली के कारण ध्यान आकषिर्त करता है। अन्य उल्लेखनीय उपन्यास हैं- ‘तीसरी ताली’ (प्रदीप सौरभ), ‘चलती चाकी’, (सूर्यनाथ सिंह), ‘वृदा: गाथा सदी की (ब्रजेश), ‘चांद ऋ द आसमान डॉट कॉम’ (विमल कुमार), ‘हॉस्टल के पन्नों से’ (मनोज सिंह), ‘विनायक’ (रमेश चंद्र शाह), ‘चार दरवेश’ (हृदयेश), ‘नील धारा’ (जितेन ठाकुर) और ‘द कंक्रीट बुद्धा’ (राजेश जैन)। तहमीमा अनम का अनूदित उपन्यास ‘वो दौर सुनहरा’ पूर्वी पाकिस्तान के बांग्लादेश बनने की पृष्ठभूमि पर लिखा महत्वपूर्ण कृति है। रोहिंटन मिस्त्री के अंग्रेजी में लिखित चर्चित उपन्यास ‘सच ए लांग जर्नी’ का हिंदी अनुवाद ‘इत्ता लंबा सफर’ बेहद दिलचस्प है, जो अपने समय की राजनीति और भ्रष्टाचार की नब्ज ही नहीं टटोलता बल्कि उत्तेजक व्यंग्य के जरिये भारत की अलग तस्वीर भी खींचता है। मराठी के सुप्रसिद्ध लेखक लक्ष्मण गायकवाड़ का नया उपन्यास ‘वकील पारधी’ है। ब्रिटिश शासनकाल में पारधी जाति को अपराधी की श्रेणी में सूचीबद्ध किया गया था। गायकवाड़ ने इस उपन्यास के माध्यम से इस तथाकथित अपराधी समाज की यातना-यंतण्रा के साथ उसके सांस्कृतिक और परिवेशगत जीवन-मूल्यों और सामाजिक संरचना का परिचय दिया है। नूर जहीर का अंग्रेजी में लिखित उपन्यास ‘माई गॉड इज ए वूमन’ का स्वयं लेखक द्वारा अनूदित ‘अपना खुदा एक औरत’ दिलचस्प है जिसमें एक मुसलमान औरत के खुद की तकदीर चुनने के संघर्ष की सशक्त गाथा है।

कहानी
प्रेमचंद के समय लिखी जा रही कहानी और आज की कहानी के रूप-रंग में ही नहीं बल्कि आत्मा में भी बहुत फर्क है। यथार्थ कोई जड़ वस्तु नहीं है, बदलते समय के साथ यथार्थ भी बदलता है। यदि इस बीच दुनिया तेजी से बदली है तो हमारे राष्ट्र, समाज, परिवार और व्यक्ति का यथार्थ भी बदलता है। यथार्थ को लेकर बहुत कहानीकारों में भ्रम और विभ्रम है। काशीनाथ सिंह ने ‘वागर्थ’ के युवा पीढ़ी विशेषांक (संपादक-रवींद्र कालिया) में लिखा है- ‘यथार्थ कहानी नहीं होता, कहानी में यथार्थ होता है। यथार्थ में छेड़छाड़ के बिना गद्य तो संभव है, गल्प नहीं।’ यह अकारण नहीं कि काशीनाथ सिंह युवा पीढ़ी की कहानी को यथार्थ से मुक्ति का संघर्ष कहते हैं। कहना मुश्किल है कि आज ज्यादा कहानियां लिखी जा रही हैं या कविताएं, क्योंकि अब कवि कहानियां लिखने लगे हैं और कहानीकार कविता। इस कारण भी दोनों विधाओं का अंतर मिटता-सा लग रहा है। कहानी की विषयवस्तु तो नहीं मगर इसके रूप और शिल्प में भारी बदलाव हुआ है, जो स्पष्टत: पश्चिमी लेखकों की नकल है। इस वर्ष प्रकाशित एक-डेढ़ दर्जन कहानी-संग्रहों में विजयदान देथा की ‘छब्बीस कहानियां’ उल्लेखनीय घटना है। पुस्तक की भूमिका में विजयमोहन सिंह ने उनकी एक और चर्चित कहानी ‘अनेकों हिटलर’ का जिक्र करते हुए संकेत किया है कि देथा जी इस कहानी में दिखाना चाहते हैं कि अमानवीय और क्रूर होने के लिए संपदा, प्रभुत्व और अकूत सत्ता ही हमेशा हिटलर नहीं बनाती। वह कहीं भी, किसी में भी दशा में अचानक उत्पन्न हो सकता है। ‘कोशी का घटवार’ जैसी कालजयी कहानी के लेखक शेखर जोशी का नया कहानी-संग्रह है- ‘आदमी का डर’, जिसमें मध्यवर्गीय भारतीय जीवन की त्रासदियों/कठिनाइयों/ दुविधाओं के अंधेरे के बीच से जीवन की धूल-धूसरित सचाइयां उजागर होती हैं। भालचंद्र जोशी का नया संग्रह ‘पालवा’ बिना किसी ताम- झाम के कहानी के बीच से यथार्थ को उद्घाटित करता है। युवा कहानीकार नीला प्रसाद के पहले कहानी-संग्रह ‘सातवीं औरत का घर’ के लोकार्पण पर हंस संपादक राजेन्द्र यादव और हिंदी के प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने जैसी तारीफ की, उससे यही लगा कि नीला प्रसाद का अज्ञातवास खत्म हुआ और समकालीन कहानी की दुनिया में इनकी पहचान बनी।

कविता
हाल के वष्रो में संभवत: इस वर्ष सबसे कम कविता संग्रह आये। शायद इसलिए भी कि एक साथ अ™ोय, शमशेर, नागाजरुन, केदारनाथ अग्रवाल और फैज की जन्म शताब्दियां मनाने में हम इतने व्यस्त रहे कि कवियों की रचनावली, संचयन और असंकलित कविताओं के प्रकाशन पर ही ध्यान केंद्रित रहा। जन्मशती वर्ष में इन कवियों पर अनेक पुस्तकें निकलीं और इन पर हुई व्यापक चर्चा से नई पीढ़ी का ध्यान इनकी ओर गया। यही नहीं, इस बहाने लेखक संगठनों ने अपना दृष्टिकोण बदलते हुए अ™ोय की उपेक्षा के लिए पश्चाताप भी किया। वरिष्ठ कवि मलय का- ‘इच्छा की दूब’ और दिनेश कुमार शुक्ल का ‘समुद्र में नहीं’ में दुनिया-जहान की तमाम अच्छी-बुरी बातें हैं, साथ ही प्रेम का प्रतिबिंब भी। सामाजिक सरोकारों के प्रति प्रतिबद्ध कवि कुमार अंबुज के पांचवें कविता संग्रह ‘अमारी रेखा’ में सामाजिक विषमता, अन्याय, अभाव, गरीबी के बीच दरार खींचने वाले लोग हैं, जो स्वांत: सुखाय: के अर्थ को दूसरे के अनर्थ से जोड़ते हैं। कवि विमलेश त्रिपाठी के ‘हम बचे रहेंगे’ संग्रह में इनकी गहरी स्थानीयता उनके कवि की विशेषता है। इस वर्ष मशहूर उर्दू शायर फैज अहमद फैज पर चार-पांच पुस्तकें आयीं। गुलजार द्वारा संपादित ज्ञानपीठ से सम्मानित शहरयार की शायरी का उम्दा संकलन ‘शहरयार सुनो..’ आया। अन्य उल्लेखनीय संग्रहों में ‘अलमारी में रखे हुए दिन’ (अघोष), ‘बुद्ध मुस्कुराये’ (यश मालवीय), ‘अबोले के विरुद्ध’ (जयप्रकाश मानस), ‘युवा द्वादश’ (निरंजन श्रोत्रिय), ‘आने वाले कल पर’ (सुधांशु उपाध्याय), ‘जीवन जीवन के बाद’ (रंजना श्रीवास्तव) आदि हैं। अनुवाद के क्षेत्र में इस वर्ष की एक बड़ी उपलब्धि ‘एमिली डिकिन्सन की कविताएं : संचयन’ और वाल्ट व्हिटमन की ‘घास की पत्तियां : संचयन’ हैं। दोनों पुस्तकों का हिंदी अनुवाद चंद्रबली सिंह ने किया है।

आलोचना
पिछले दिनों एक हिंदी पाक्षिक द्वारा आयोजित ‘नया दशक: नया लेखन’ परिचर्चा में हिंदी के वरिष्ठ आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने कहा, ‘आलोचना की हालत सबसे बुरी है। अब साहित्यिक आलोचना लिखी नहीं जा रही है, लोग विमर्श कर रहे हैं। आलोचना का मतलब है- कालजयी कृतियों का पुनमरूल्यांकन और अपने समय की रचनाशीलता के नयेपन का उद्घाटन। यह नहीं हो रहा है। इस दृष्टि से केवल नंदकिशोर नवल की कृति ‘तुलसीदास’ महत्वपूर्ण है। नवल जी ने विमर्शो में न जाकर पाठ आधारित आलोचना लिखी है। इसी तरह पुरुषोत्तम अग्रवाल की पुस्तक ‘अकथ कहानी प्रेम की’ में भी कबीर के प्रेम और भक्ति की पुनव्र्याख्या है, जो सराहनीय है।’ आलोचना के नाम पर प्रकाशित पुस्तकों पर नजर डालें तो पता चलता है कि हिंदी की कई विधाओं पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं और आलोचक कहानियां और आलोचना के लोकतंत्र को बचाने के लिए धरती-आसमान एक किए हैं। एक तरफ कमला प्रसाद का ‘आलोचना का लोकतंत्र’ है तो दूसरी तरफ देवेंद्र चौबे का ‘आलोचना का जनतंत्र’। बीच में है पल्लव का ‘कहानी का लोकतंत्र’। इधर कृष्णदत्त पालीवाल ‘हिंदी का आलोचना पर्व’ मना रहे हैं तो उधर गोपेर सिंह ‘आलोचना का नया पाठ’ कर रहे हैं। हिंदी कहानी का इतिहास (दूसरा खंड- गोपाल राय), ‘समकालीन कहानी: नया परिप्रेक्ष्य’ (पुष्पपाल सिंह) भी इसी वर्ष आये हैं। निर्मला जैन की पुस्तक ‘कथा समय में तीन हमसफर’ वस्तुत: कृष्णा सोबती, उषा प्रियंवदा के कथा- संसार का पुनर्पाठ है। निर्मला जैन ने इनके कथा-संसार के अदृश्य पक्षों को उद्घाटित करने की भरसक कोशिश की है। ‘प्रेमचंद की विरासत और गोदान’ शिवकुमार मिश्र की नई पुस्तक है, जो संभवत: प्रेमचंद: विरासत का सवाल में कुछ जोड़कर बढ़ाया गया है। ऐसे समय में जब हम शिवदान सिंह चौहान को भूल रहे हैं, मधुरेश ने ‘मार्क्‍सवादी आलोचना और शिवदान सिंह चौहान’ लिखकर हमें सचेत किया है। हिंदी आलोचना संसार में फ्रांचेस्का ऑर्सीनी की पुस्तक ‘हिंदी का लोकवृत्त’, जिसका अनुवाद नीलाभ ने किया है, एक अनुपम पुस्तक है। इसमें 1920-1940 के राष्ट्रवादी युग में भाषा और साहित्य का नये दृष्टिकोण से अध्ययन किया गया है।

जीवनी, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत
कथा-साहित्य की इन लोकप्रिय विधाओं से पाठक तादात्म्य स्थापित कर लेता है, क्योंकि ये जीवन के राग-रंग के काफी निकट हैं। विनाथ त्रिपाठी द्वारा लिखी आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की जीवनी ‘व्योमकेश दरवेश’ इस वर्ष की चर्चित कृति है, जिसमें पं. द्विवेदी के शांति निकेतन-प्रवास से लेकर काशी विविद्यालय में वापसी और विरोध तक का वर्णन है। त्रिपाठीजी ने द्विवेदी जी के रचनाकार रूप पर भी विचार किया है। द्विवेदी जी के जीवन पर लिखी यह मुकम्मल किताब है, यद्यपि इसमें उनका स्तुति-गान कुछ ज्यादा ही है। ओम थानवी का यात्रा-वृतांत ‘मुअनजोदड़ो’ वर्ष की दूसरी सर्वाधिक चर्चित पुस्तक है। लेखक ने सिंधु घाटी के खंडहरों या फिर अजायब घर में जो देखा, उसका विस्तार से वर्णन है। लेखक ने इस सभ्यता से संदर्भित पुस्तकों का भी गहराई से अध्ययन किया है। पुरातत्व एवं इतिहास के बीच यहां सीधी टकराहट है। इस पुस्तक की भाषा काव्यात्मक है इसीलिए मोहक है। शमशेर जन्मशती वर्ष में दूधनाथ सिंह के संपादन में ‘एक शमशेर भी है’ पुस्तक निकली जिनमें उनके आत्मीयों के संस्मरण हैं। दूधनाथ सिंह ने इसे ‘शमशेर जी की चित्र-विचित्र छवि का पारिवारिक अलबम’ कहा है। चूंकि शमशेर जी मलयज और उनके परिवार के साथ लंबे अरसे तक जुड़े रहे- इसलिए भी कृति का महत्व है। पुस्तक में यदि शमशेर के अनुज तेज बहादुर चौधरी के संस्मरण भी संकलित होते तो निश्चित रूप से इसका महत्व बढ़ जाता। अन्य पुस्तकों में हैं- ‘कल परसों के बरसों’ (संस्मरण-ममता कालिया), ‘मैं था और मेरा आकाश’(संस्मरण-कन्हैया लाल नंदन), ‘जिन्हें मैनें जाना’ (संस्मरण- उषा महाजन)। इस वर्ष मराठी से हिंदी में अनूदित गंगाधर चिटणीस की आत्मकथा ‘मंजिल अब भी दूर’ और मराठी से ही अनूदित ज्ञानेर मुले की आत्महत्या ‘माटी, पंख और आकाश’का प्रकाशन भी हुआ। ‘दास्तां खून और शमशीर की’ एक बेटी की जुबानी फातिमा भुट्टो की आत्मकथा है- जिसमें उन्होंने सियासत के बदरंग चेहरे से नकाब हटाया है।

नाटक
भीष्म साहनी के संपूर्ण नाटकों का दो खंडों में प्रकाशन उल्लेखनीय है। धर्मवीर भारती के नाटककार रूप को भी उनके कवि रूप से कम प्रसिद्धि नहीं मिली। पिछले दिनों उनके नाटक ‘अंधा युग’ का मंचन हुआ तो दर्शकों की अपार भीड़ जुटी। ‘नदी प्यासी थी’ में उनके छोटे-छोटे पांच नाटक संग्रहीत हैं। ‘रति का कंगन’ सुरेन्द्र वर्मा का नया नाटक है। इसकी भाव-भूमि के केन्द्र में भौतिक लिप्सा है। जितेन्द्र भाटिया की पुस्तक ‘खिड़कियां और रास्ते’ में उनके दो रंगमंचीय नाटक ‘जंगल में खुलने वाली खिड़की’ और ‘रास्ते बंद हैं’ संकलित हैं।

विविध
इस वर्ष गांधी जी पर दो महत्वपूर्ण पुस्तकें- ‘गांधी एक असंभव संभावना (सुधीर चंद्र) और हिंद स्वराज: नव सभ्यतािवमर्श (वीरेन्द्र कुमार बरनवाल) आई। पत्रकारिता के क्षेत्र में दिलीप मंडल की पुस्तक ‘मीडिया का अंडर्वल्ड’ विशेष उल्लेखनीय है। हिंदी में स्त्री-विमर्श और दलित-विमर्श दोनों अपने मूल एजेंडा से भटक गए हैं। यही कारण है कि इन विमर्शो के केन्द्र में एक तरफ स्त्री-देह है तो दूसरी तरफ दलितदु र्वासा। फिर भी स्त्री-विमर्श के नाम पर ‘सुनो तो सही’ (रजनी गुप्त) और ‘स्त्री और सेंसेक्स’ (रंजना जायसवाल) देखी जा सकती है। वि राजनीति पर प्रकाशित दो पुस्तकें उल्लेखनीय लगीं- ‘तुर्क एशिया-यूरोप-अफ्रीका (एम. उसमान) और फिलिस्तीन और अरब-इस्रइल संघर्ष (महेन्द्र मिश्र)। कृष्णदत्त पालीवाल के संपादन में अ™ोय रचनावली के छह खंड भारतीय ज्ञानपीठ से निकले हैं। शमशेर और केदार रचनावली प्रकाशन के क्रम में है। नागाजरुन रचनावली प्रकाशित हो चुकी है। कुल मिलाकर तमाम तुमुल कोलाहल के बीच रचनात्मकता से भरा- पूरा रहा यह साल.


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
भारत भारद्वाज
पुस्तक-वार्ता के संपादक और वरिष्ठ आलोचक,
पूरा परिचय कविता कोश पर यहाँ उपलब्ध हैं.
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