Latest Article :
Home » , , , » पुस्तक समीक्षा:-प्रकृति को खंगालने की उम्दा कोशिश है ‘थार की ढाणी’

पुस्तक समीक्षा:-प्रकृति को खंगालने की उम्दा कोशिश है ‘थार की ढाणी’

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शनिवार, दिसंबर 17, 2011 | शनिवार, दिसंबर 17, 2011


 
संसार भर की अधिकांश बसावटों की तरह रेत के संमदर में बसे घरों की बसावट भी अनियोजित ही रही है। वैसे भी हमारे यहाँ मुअनजोदड़ों कालीन सभ्यता को छोड़कर सुनियोजित नगरों का निर्माण भी बहुत कम हुआ है। खेतों में बसे घर ढाणियाँ कहलाते है और ढाणियाँ थार की संस्कृति के विकास की प्रारंभिक अवस्था है।ढाणीथार की सामाजिक संरचना की सबसे छोटी लेकिन सबसे मजबूत इकाई है। इन ढाणियों ने थारवासियों के घुमक्कड़ी जीवन को स्थायित्त्व प्रदान किया है। रेत के समंदर में, जहाँ दूर-दूर तक मानवीय बसावट का कोई अता-पता नहीं, लेकिन इसके बावजूद कोई किसी से अछूता नहीं, सब एक-दूसरे से बहुत ही गहराई से जुड़े हुए है, सबकी जीवनीशक्ति एक ही है।

एक सवाल अनायास ही मन में कौंधता ही तमाम सारी भौगोलिक दूरियों के बावजूद थार के समंदर में ऐसा क्या है जो थारवासियों को जोड़े रखता है? युवा पत्रकार पृथ्वी परिहार की किताबथार की ढाणीइन सबका जवाब देती है। किताब मूलतः थार की ढाणियों के बहाने समूचे थार के लोकजीवन, उसकी बसावट बनावट पर एक सजग पत्रकार द्वारा लिखे महत्ती यात्रावृत्तांतों-रिपोर्ताजों का संकलन है। यह थार के लोकजीवन के उल्लास, खुबसुरती, जटिलता और उसी विविधता पर आधारित है। यहथार के कल्पवृक्ष’ (खेजड़ी),‘थार के सागवान’ (रोहिड़ा), ‘थार के अंगूर’ (जाल पर लगने वाले अंगूरनुमा फलपीलू’) के सौंदर्य को उकेरती है। इसमें ढाणी के सौंदर्य औक उसकी सामूहिकता को चित्रित करने का, उसके रस्मों-रिवाजों, उसकी प्रकृति को खंगालने की, थार के लोक में रसे-बसे कथारस को उड़ेलने की उम्दा कोशिश है। पत्रकारिता और साहित्य का एकमैव इस किताब की सबसे बड़ी विशेषता है।

ढाणियों के बसने बनने की कथा और उसमें लोक की उपस्थिति को उन्होंनें बड़े ही सहज, सरल और रोचक अंदाज में जिस सहज और सरस भाषा में प्रस्तुत किया है, वह बरबस हमें अपनी और खींचती है। उदाहरण के लिएआषाढके वर्णन को देखा जा सकता है-

जेठ की दुपहरी/
चौमासे की रातों,
(और) दादी की बातों पर/
बूंदों सा/गिरता है आषाढ़।
गाँव की गुवाड़ गलियों/
ढाणी की पगडंडियों/
डांगरों के छप्पर में,
(और) घर की मुंडेरों पर/
मिलता है आषाढ़।/
बारानी बाजरी,
ककड़ी और मतीरों/
दूध की हांडी,
(और) पतींडे के कोरे घड़े पर/
खिलता है आषाढ़।/
स्कूल जाते बच्चों/
बीज बोते किसानों,
माँ के सपनों/
बाबा के अरमानों, (और)/
कल की उम्मीदों को सिलता है आषाढ़।

ये पंक्तियां थार के रेगिस्तान मेंतिरते, फिरते, खिलते और सिलते आषाढकी कहानी बयां करती है। थार की संस्कृति में ऐसे कई शब्द है जो उसके सौंदर्य में चार-चांद लगाते है, उसकी सामूहिकता को चिह्नित करते है। उदाहरण के लिए - दो गाँवों के बीच का संधिस्थलकांकड़कहलाता है।  ‘कांकड़ढाणियों को गाँवों से जोड़ने या अलगाने का काम करता है। इसलिएकांकड़के निहितार्थ बड़े गहरे है क्योंकि यह दो जीवन दृष्टियों का मिलन बिंदु भी है। लेखक ने थार से अनजान पाठकों के लिए किताब के अंत मेंचक’, ‘कांकड़’,‘हाड़ी-सावणी’, ‘पलींडा-इंडूनी’, ‘तूड़ी-पलू-पराली’, ‘कोस-गोकोसजैसे ठेठ देशी शब्दों का छह पृष्ठीय संदर्भ-सार भी दिया है।

असल में थार का सारा परिवेश प्रकृति और मनुष्य के विराट सामंजस्य पर टिका है।औरणऔरगोचरजैसे प्रकृतिप्रदत्त और सामुदायिक स्थल हमेशा से थार के लोकजीवन के अभिन्न अंग रहे है, लेकिन अब वे उनसे छिनते जा रहे है। इंदिरा गाँधी नहर के आगमन ने बीकानेर, गंगानगर हनुमानढ की पूरी तस्वीर ही बदल दी है। इसके सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह के परिवर्तन हुए है। ठेठ पश्चिमी थार के जालौर, बाडमेर, जैसलमेर जिले में भी ऐसा ही परिवर्तन खनिज तेल निकलने के बाद हुआ है। दोनों घटनाओं से थारवासियों को जितना तात्कालिक फायदा हुआ है और हो रहा है, उससे कहीं अधिक उन्हें दीर्धकालीन नुकसान हुआ है और हो रहा है। इन परिवर्तनों ने केवल जमीन को ही नहीं बल्कि यहाँ के मनुष्य को भी बंजर बनाने का काम किया है, उसने उनके बीच के अंतर को कम करने के स्थान पर उसे और अधिक गहरा किया है। उसने मनुष्य और प्रकृति के बीच के सामंजस्य को तोड़ने का काम किया है। दरअसल इसने थार की लोक-संस्कृति की बुनियाद को ही हिलाकर रख दिया। इसी कमजोर बुनियाद को खाद-पानी देने का काम यह पुस्तकथार की ढाणीकरती है।

लेखक पृथ्वी परिहार नेथार की ढाणीमें शब्दों के देशीकरण की लोकपरंपरा को बखूबी पकड़ा है और बताया है कि किस तरह हमारे  अंग्रेजीदां अभियंताओं ने नहरीकरण के नाम पर (केवल अपनी निजी सुविधा के लिए) थारवासियों परमाइल एटीजैसे जटिल अंग्रेजी शब्द थोपे? लेकिन हमारी लोकपरंपरा भी कहाँ हार मानने वाली थी। उसनेमाइल एटीकोमाई-लेटीबना दिया। फिरमाई-लेटीकोमायलटीऔर अंततःमायलड़ीकहकर उसे बिना किसी झिझक के अपना लिया। यह शब्दों के देशीकरण की लोकपरंपरा है।माइल एटीसेमायलड़ीके बीच की प्रक्रिया कितनी यंत्रणादायी रही होगी, इसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है। इस तरह यह किताब भूमंडलीकरण के सबकुछ को खा जाने वाले भयावह निहितार्थों को खोलती चलती है।

थार की ढाणीएकरूपता के नाम पर चल रहेलोककी अवहेलना के, उसकी समाप्ति के षड़यंत्रों को बेनकाब करने के साथ-साथ विकास की महानगरीय या अमरीकी अवधारणाओं के अंधड़ भविष्य को भी हमारे सामने रखती है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य मेंलोककी सही समझ और भूमंडलीकरण, उदारीकरण और बाजारीकरण की वृहदत्रयी से लोक-संस्कृति को बचाए बनाए रखने की दिशा में यह एक उल्लेखनीय हस्तक्षेप है। यह स्वायत्तता और स्वतंत्रता के नाम पर भूंमडलीकृत समाज द्वारा दिए जा रहे पश्चिमी संस्कृति के अंधे और लंगड़ाते मूल्यों का विरोध करती है। राजस्थान में थार की अंतिम सीमा गंगानगर हनुमानगढ है और दुर्भाग्य से इस समय वहीं थार की लोक संस्कृति सबसे अधिक खतरे में है। आज थार भी आर्थिक संसाधनों की खरगोशी दौड़ में शामिल तो हो चुका है लेकिन उसे इसके दुरगामी परिणामों के प्रति बी सचेत रहना होगा। अन्यथा थार में तेजी से हो रहे बदलावों से तो यी लगता है कि जिस अंधी दौड़ में आज हम जाने-अनजाने ही शामिल कर लिए गए है, उसके प्रभाव में कहीं हम जड़विहीन सांस्कृतिक धरोहर के वारिस बनकर रह जाएं?इस तरह ये पुस्तक हमारे बीमारू मानस को टटोलती के काम करती है क्योंकि यह बदलाव जितना भीतरी लगता है, उतना है नहीं, बल्कि वह बाहरी और बनावटी है।
(पुस्तक- ‘थार की ढाणी’, लेखक- पृथ्वी परिहार, पहला संस्करण- 2010,
प्रकाशन विभाग, सूचना भवन, सीजीओ कॉम्पलेक्स, लोदी रोड़, नई दिल्ली।)


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

(लेखक के बारे में जानने के लिए यहाँ क्लिक करिएगा.
SocialTwist Tell-a-Friend
Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template