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''श्रेष्ठ बाल साहित्य रचना सबके वश की बात नहीं।''-ओमप्रकाश कादयान

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, दिसंबर 23, 2011 | शुक्रवार, दिसंबर 23, 2011


पुस्तक समीक्षा
बाल साहित्य पर लिखना उतना आसान नहीं है जितना कि सुनने में लगता है, क्योंकि बाल साहित्य की किसी भी विधा पर कलम चलाने से पूर्व बाल साहित्यकार को बाल मन में झांकना पड़ता है। स्वयं को बालक की तरह सोचना पड़ता है, बाल मनोविज्ञान को भली-भांति समझना पड़ता है। आज श्रेष्ठ बाल साहित्य की रचना आवश्यकता से कहीं कम हो रही है। शायद कुछ साहित्यकार तो बाल साहित्य पर लिखना अवश्य छोटा काम मानते होंगे, इसलिए वो बाल साहित्य पर अपनी कलम चलाते ही नहीं। दूसरा कारण ये है कि श्रेष्ठ बाल साहित्य रचना सबके वश की बात नहीं। देश में बहुत कम साहित्यकार हैं जो लगातार बाल साहित्य विद्याओं पर स्तरीय लिख रहे हैं। किसी भी विध पर लिखना इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्त्वपूर्ण है स्तरीय लिखना। वर्तमान में जो बेहतर लिख रहे हैं उनमें से एक नाम है ‘त्रिलोक सिंह ठकुरेला’।

उत्तर पश्चिम रेलवे  में इंजीनियर त्रिलोक सिंह ठकुरेला ने इस दिषा में अच्छा कार्य किया है। कविता, दोहे, गीत, हाइकु, लघुकथा व कहानी विधाओं पर लिखने व विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले ठकुरेला का ‘नया सवेरा’ नव प्रकाशित बालगीत संग्रह है जिसमें कुल अठाइस बाल कविताएं दी गई हैं। खास बात ये है कि बालकवि ने इन 28 कविताओं के माध्यम से यथाशक्ति करीब सभी रंग बिखेरे हैं। कवि ने बाल मन में झांकते हुए, उनके प्रिय विषयों को ध्यान में रखकर कविताएं लिखी हैं। पेड़, अंतरिक्ष की सैर, तितली, रेल, गुब्बारे, सपने, उपवन के फूल, प्यारी नानी, गाड़ी, बादल, चन्दा मामा, पतंग आदि ऐसे विषय हैं जो बच्चों को भाते हैं। इसलिये कवि ने इन विषयों से सम्बन्ध्ति अच्छी कविताएं लिखी हैं। बच्चों को हमेशा लय में पढ़ना अच्छा लगता है, इस बात का भी कवि त्रिलोक सिंह ठकुरेला पूरा ध्यान रखा है। इनकी कविताओं में मधुर लय है जो बच्चों को आकर्षित करेगी। देखिये एक उदाहरण -

सागर से गागर भर लाते / बादल काले काले
लाते साथ हवा के घोड़े / दम खम पूफर्ती वाले।
कभी खेत में, कभी बाग में / कभी गाँव में जाते,
कहीं निकलते सहमे सहमे / कहीं दहाड़ लगाते।

कवि ने अपनी कविताओं के माध्यम से ये भी प्रयास किया है कि बच्चों को पर्यावरण व स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जाये तथा प्रकृति से विशेष लगाव पैदा हो। पर्यावरण सापफ सुथरा रखने की बात हो या पानी के संरक्षण की यहां पर कवि बच्चों में नई चेतना भरना चाहते हैं। देखिये-

पानी से ही यह सब सुन्दर, // पानी से जीवन है।

बच्चे उर्जावान होते हैं। उनमें बहुत कुछ करने की क्षमता व जोश होता है। नया वर्ष शीर्षक की कविता पाठकों में नई उमंगे भरती हैं -

नयी उमंगे, नयी तरंगे / नयी ताल, संगीत नया
सब में जगी नयी आशाएं / नयी बहारें, गीत नया।

बच्चे कल्पनाओं की पंख लगाकर उड़ना चाहते हैं कभी तितली बनकर फूलों पर मंडराना चाहते हैं तो कभी पंख लगाकर चांद को छूना चाहते हैं, कभी पंछी बनकर बाग बगीचों की सैर करना चाहते हैं -

काश पंख होते अपने, तितली सी मस्ती करते
हम भी औरों के जीवन में खुशियों के रंग भरते।

बच्चों को नानी बड़ी प्रिय होती है तो नानी को बच्चों से अथाह स्नेह होता है। बच्चों के लिए नानी पात्रा इसलिये प्रिय है क्योंकि वह कहानियों का भंडार है। फरमाइश होते ही नानी बड़े प्रेम से कहानी सुनाती है। देखिये -

कितनी प्यारी बूढ़ी नानी / हमें कहानी कहती हैं।
जाते हम छुट्टी के दिन में/ दूर गाँव वह रहती हैं।।

बच्चों की कोमल भावनाएं झरनों के कलकल नाद की तरह होती हैं, इन्हीं भावनाओं में तितलियों के लहराते पंखों के रंग, चन्दा की शीतल चांदनी की शीतलता, उगते सूरज की सहज अरूणिमा व तारों की झिलमिलाहट होती है तथा नहीं परियों के स्वप्नलोक से दृश्य होते हैं। कवि त्रिलोक सिंह ने इन्हीं भावनाओं को भली-भांति समझा है फिर, बाल कविताओं की रचना की है।

बच्चों का मन भी पंछियों की भांति दूर नीले गगन की सैर करना चाहना है। देखिये ‘अंतरिक्ष की सैर’ कविता का एक अंश - नभ के तारे कई देखकर / एक दिन बबलू बोला
अन्तरिक्ष की सैर करें मां / ले आ उड़न खटोला।

पर्यावरण स्वच्छ रखने व घने वृक्ष लगाना पर्यावरण के प्रति चेतना जाग्रत करना आज की आवश्यकता है -  पेड़ों के इन उपकारों को हम भी नहीं भुलाएं।
आओ रक्षा करें, वनों की, आओ पेड़ लगाएं।

अनपढ़ता एक अभिशाप है, अच्छे जीवन के लिए शिक्षा जरूरी है, पढ़ना जरूरी है। इसलिए कवि कहता है -बिना पढ़ा पछताता है। पढ़ा-लिखा सुख पाता है।।
मिलकर विद्यालय जायें। पढ़ लिखकर सब सुख पायें।।

कवि ने अपनी कविताओं के माध्यम से पानी, पेड़, शिक्षा के महत्त्व को समझाया है तो बच्चों को अपनी कविताओं के माध्यम से अच्छी सीख दी है। मीठा बोलना, परोपकार करना, मिल-जुलकर रहना, अनुशासन में रहना, हंसते रहना सिखाया है। जीवन में सद्गुणों के कारण जीवन में नई उमंगे, नई तरंगे, नई उफर्जा भरने का बेहतर प्रयास किया है। देश व प्रकृति के प्रति प्रेम भाव जगाना, तीज त्यौहारों के प्रति रूचि जगाना, अच्छे सपने देखने, जीवन में सकारात्मक सोच पैदा करना कवि का मुख्य लक्ष्य नज़र आता है। बच्चों की रूचि बढ़ाने के लिए कविताओं  के साथ सुन्दर चित्र दिये हैं। मुख पृष्ठ बच्चों की कोमल व रंगीन भावनाओं जैसा है वह अनायास अपनी ओर आकर्षित करता है। कागज स्तरीय है। कुल मिलाकर बाल गीतकार त्रिलोकसिंह ठकुरेला का ये सराहनीय प्रयास कहा जा सकता है। 


पुस्तक-नया सवेरा ;बालगीत
लेखक, सम्पादक-त्रिलोक सिंह ठकुरेला
प्रकाशक-राजस्थानी ग्रन्थागार, सोजती गेट, जोधपुर,राजस्थान 
पृष्ठ संख्या -48, मूल्य:  50/- रूपये

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
ओमप्रकाश कादयान,
1416,सैक्टर-13, हिसार;
हरियाणा -125005,मो. 09416252232
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