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बिजुकों का जादूगर 'डॉ. अवधेश मिश्र'

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, दिसंबर 16, 2011 | शुक्रवार, दिसंबर 16, 2011


सभ्यता और संभ्रान्तता के भार के नीचे हमारी प्राकृतिक, स्वाभाविक एवं आदिम प्रतिक्रियाएं लगातार दबती चली जाती हैं। हमारे संवाद, संकेत और व्यवहार भी एक नकली लालित्य ओढ़कर समाज के सामने आते हैं और इस तरह हम अपने झोले में सैकड़ों चेहरे अवसरानुकूल व्यवहार के लिए हमेशा तैयार रखते हैं। किन्तु इससे जो नुकसान होता है वह हमारी दृष्टि में आता ही नहीं। क्या ऐसा नहीं है कि हमारी सारी स्वीकारोक्तियाँ, नकार यहाँ तक कि क्रोध, प्रेम और काम जैसी प्रतिक्रियाएं भी नकली और इसी नाते हिंसक हो गई हैं (डॉ. अवधेश मिश्र) के मन के किसी कोने में गाँव की निश्छलता एवं निष्कपटता (जो अब गाँव में भी शायद दिखती नहीं) अभी भी परिणामों के मोल-तोल के विपरीत भी कहने-सुनने तथा कुछ वह भी बोल देने, जो बोल देना अपने जीवित रहने के लिए एक निश्चित अर्थ में जरूरी है, को प्रकट करती रहती है। ऐसे ही गाँव के निसर्ग और उस पृष्ठभूमि में खड़े हुए बिजूके ने शायद उनको अपने कैनवस पर वह चित्रित करने का अवकाश दिया जिसे शायद सम्यता और संभ्रान्तता के मापदण्डों के भीतर कह पाना या चित्रित कर पाना (यदि किसी तरह संभव भी हो तो) उसका संकेत-संप्रेषण का स्वाभावित्ता जन्य नुकीलापन नष्ट हो जाएगा। जीवन के विद्रूप को चित्रित करने का माध्यम कोई विद्रूप ही अवधेश को शायद इसलिए भी पकड़ में आया क्योंकि लोहा ही लोहे को काटता है।

समाज, राज्य, परिवार यह सारी इकाइयाँ जिन स्रोतों से जीवन पाती थीं विकसित होकर उनसे इन इकाइयों ने ही अपना नाता तोड़ लिया और इसी कारण आज हम देखते/भोगते हैं कि यह सभी अमानवीय हो गयी हैं। लोभ और लालच इतने पूज्य हो गए हैं कि लगभग सभी इनके मंदिर में नतमस्तक हैं। लोगों के मन में निराशा किसी आवश्यक उपभोग के न उपलब्ध होने की नहीं है बल्कि इसलिए है कि जो कुछ भी है वह मेरे पेट की सीमा के बाहर क्यों है! यह बात तय है कि इस उद्भर हिंसा और दारुण सम्बंधहीनता का अन्त राज्य की सेना व पुलिस के द्वारा तो नहीं ही किया जा सकता..... और कलाकार के हाथ में तो तरल रंग का एक सुकोमल, बिन्दु है और है एक रेशमी, लचकदार बालों का गुच्छा, जिसके सहारे कलाकार यदि हिंसक भी होगा तो कोई खरोंच भी तो नहीं आएगी। इसीलिए कलाकर को अपना सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने के लिए निरंतर नए-नए उन्मेष साधने होते हैं, नए माध्यम तलाशने होते हैं और नए मुहावरे जिन्हें (वादों की संज्ञा दी जाती है) गढ़ने होते हैं।

अवधेश के मन का निसर्ग गाँव का है इसीलिए इधर उन्होंने खेतों में खड़े ‘बिजूके’ के उज़बक आकार को अपने माध्यम के रूप में चुना है। इस शृंखला का प्रायः प्रत्येक कैनवस गाढ़े चटक रंगों में भाषित रेखीयता में आबद्ध खुरदुरे ग्रामीण टेक्स्चर से संपन्न एक स्वाभाविक आलाप को साधने में दत्तचित्त हैं। निश्चित रूप से इस माध्यम, रंग-योजना, रेखीय इन्द्रजाल और खुरदुरेपन के समग्र संयोजन से जिस एवं सांस्कृतिक विक्षोभ राजनैतिक, सामाजिक को निशाना बनाने का काम उनके मन में था उसे वे प्रभावी नुकीलेपन के साथ पूरा कर पाये हैं। मैं समझता हूँ इनका यह परिश्रम शायद उस विस्मृत कड़ी को फिर उँगलियों में फँसा दे और हम अपनी प्रतिक्रियाओं की- उन्हें व्यक्त किए जाने की वास्तविक कीमत चुकाकर भी व्यक्त करना प्रारंभ कर दें। सम्प्रतिन तो वह बदलाव हो सकता है जिसके न होने ने वह सबकुछ बदल दिया है जिसे न बदलना चाहिए था और इसी के साथ यह भी हुआ है जिसे बदल जाना हमारे बने रहने की अनिवार्य शर्त थी वह संसद विधायिकाओं, न्यायालयों और घरों में कुंडली मारकर बैठ गया है।

यह सब बहुत सारे संवेदन और बातें उनकी शृंखला को देखकर मेरे मन में उभरे सब (डॉ. अवधेश मिश्र) से एक बखिया उधेड़ू चर्चा का अवसर वस्तुतः ललित कला अकादेमी द्वारा कुछ समय पूर्व चंडीगढ़ में ‘न्यू मीडिया’ पर आयोजित ‘राष्ट्रीय कला सप्ताह’ के दौरान पैनल डिस्कशन के एक सत्र में अवधेश से चर्चा करने का अवसर मिला। और कला सृजन के उनके सरोकारों पर लम्बा संवाद हुआ। संवाद का आरंभ रंग और रेखाओं के उनके सरोकारों से ही हुआ। चित्र में रेखाओं का सर्वाधिक महत्त्व है या कहें तो रेखाएं चित्र में आत्मा की तरह होती हैं। जब रंग अपना अस्तित्व खोने लगते हैं तब रेखाएं ही बचती हैं औक        र आकारों को रचती हैं जो चित्र का केन्द्र बिन्दु होता है। इसे कला के प्रशिक्षण में आधारभूत तत्व के रुप में शामिल है किया जाता है। पर (अब यहीं की बात करें जहाँ हम ‘न्यू मीडिया’ पर चर्चा करने आए हैं) अब कला की परिभाषा/अवधारणा और प्रवृत्तियाँ बदल रही हैं। हम रंगों और रेखाओं से ऊपर उठकर/हटकर मीडिया और तकनीक की एक नई दुनिया में प्रवेश कर रहे है। जहाँ कला तो है पर विज्ञान और तकनीक के सहारे। फिर इंस्टालेशन की बात करें तो एक समय में यह भी बड़ा ही चमत्कृत करने वाला माध्यम रहा है पर ‘न्यू मीडिया’ का यह अगला चरण और भी चौंकाने वाला और इंस्टालेशन को पीछे छोड़ जाने वाला है। अब तो स्यात् लाइट-शेड-टोन्स सब कुछ कम्प्यूटर पर ही तय हो जाएगा और दर्शक की आँखें मानीटर पर। अब यहाँ न रेखाओं को साधने की आवश्यकता है और न ही शेड और टोन्स को रचने की दक्षता हासिल करने की। आकारों के लिए भी हम कैमरे की आँखों के ही मोहताज़ हो जायेंगे। बस हमें दक्षता चाहिए तो तकनीक और विज्ञान के साथ सहज होने की।

इन नए माध्यमों (न्यू मीडिया) के अतिरिक्त हो रहे कार्यों में विशेषकर चित्रों की बात करें तो कैनवस पर रेखा कार्य अब एक प्रकार से सिमटने लगा है, ऐसे मंे अभी भी आपके कार्य में लाइन वर्क की बारीकी है, संयोजन में रेखाओं का महत्त्व है, बल्कि आपके रेखांकन में अद्भुत आकर्षण है। इस पर क्या कहेंगे?  

हाँ, सही है कि अब अपने कैनवस पर चित्र के आधार के रूप में ड्राइंग करने वाले कम कलाकार हैं पर अब तो कैनवस पर काम करना ही कम हो रहा है, उस पर क्या कहा जाय? एक भ्रम की स्थिति फैल रही है कि रचा क्या जाय? कई चित्रकार मूर्तियाँ बनाने लगे हैं, इंस्टालेशन में काम करने लगे हैं और कई मूर्तिकार/प्रिंटमेकर चित्र बनाने लगे हैं। शायद उनमें आत्मबल की कमी आई है या उसी दिशा में पीठ कर लिया है जिस दिशा से बयार बह रही है (बाज़ार के साथ हो लिए हैं)।फिर भी मैं आज भी रेखांकन और चित्रण दोनों करता हूँ। जहाँ रेखांकनों में बुनावट कर प्रभाव पैदा करने वाला टैक्स्चर एक आकर्षण होता है और बारीक रेखाएं उसकी पूरक तो वहीं चित्रों में रेखाओं से निर्मित खुरदुरा टेक्स्चर चित्र को जीवन्त बनाता है।दरअसल मेरी कला शिक्षा का आरंभ लखनऊ से हुआ जहाँ मेरे गुरु नित्यानंद महापात्र थे। उन्होंने उड़ीसा, कोलकाता और लखनऊ के महान कलाकारों- मुरलीधर टाली, विकास महाचार्य, ललित मोहन सेन आदि के सान्निध्य में कला प्रशिक्षण पाया था।

कहीं न कहीं वे संस्कार भी मेरे साथ हैं और बनारस में प्राप्त कला शिक्षा ने तो मेरे उन संस्कारों को एक मजबूत धरातल प्रदान किया। इसीलिए रेखांकन, आकारों का सहजीकरण टेक्स्चर और तानों की संवेदना मेरे कामों का मुख्य आधार होती है। यह तो रहा शिल्प का पक्ष। परन्तु भाव पक्ष की बात करें तो मेरा जन्म फैजाबाद जिले (उ.प्र.) के एक छोटे से गाँव (मठगोविन्द) में हुआ। जहाँ घनघोर बरसात, बाढ़, सूखा, गर्मी की पराकाष्ठा, बफार्नी हवाओं से सनी हुई हाँड़ कँपा देने वाली सर्दी और इस मौसम के साथ खेती बाड़ी के समस्त कार्य मैंने केवल होते ही नहीं देखा बल्कि शामिल रहा था उन सब में। वे संवेदनाएं आज मेरे चित्रों में, मेरे रेखांकनों में आकार लेती हैं। वे खुशियाँ, वह बचपन और उल्लास आज मेरे रंगों और आकारांे में विभिन्न रूपों में दिखता है। याद करता हूँ तो वह गरीबी, वह अभाव और उसके बीच जीने का और आसमान पर विजय पाने की अदम्य इच्छा शक्ति....बस आँखें नम हो जाती हैं।ऐसे वातावरण से आया हुआ कलाकार ही नहीं कोई भी व्यक्ति निश्चित रूप से अपने लिए, समाज के लिए और राष्ट्र के लिए ईमानदारी, निष्ठावान, परिश्रमी और सहज होता है वह कभी भी बाजार और उसके ग्लैमर की ओर न भागकर अपने उत्स के साथ खड़ा होता है, अपने मूल को रचता है और यही उसके सृजन की सार्थकता भी है।
अमूर्तन में भी आपके कैनवस पर आकृतियों की भरमार है। ठीक से यह नहीं कहा सकता कि इन्हें कैसे व्याख्यायित किया जाए परन्तु कैनवस पर उभरा बिजूका अलग से देखने वाले का ध्यान खींचता है। बिजूका शृंखला रचने के पीछे कोई खास वजह?

देखिए चित्र में निराकार तो कुछ भी नहीं है। कोई न कोई आकार तो चित्र के केन्द्र बिन्दु के रुप में होता ही है और वह कहीं न कहीं समाज और प्रकृति का प्रतिनिधित्व भी कर रहा होता है। जब हम रंग का एक स्ट्रोक लगाते हैं तो कोई न कोई आकार कैनवस पर अपना अस्तित्व ले लेता है। कभी वह कलाकार की मनः स्थिति के अनुरूप कोई आकार लेता है तो कभी वह मुख्य आकार का सहयोगी या पूरक बनकर संयोजन में ‘शान्त’ भूमिका निभा रहा होता है। शायद इसीलिए मेरे कैनवस पर आपको समाज और प्रकृति के अनेेक रूपाकार नज़र आते हैं और सभी एक साथ मिलकर कोई एक दास्ताँ सुनाते हैं, एक वातावरण, एक घटना एक जीवन को व्याख्यायित कर रहे होते हैं। खास तौर पर मेरे चित्रों के विषय व रंग-विधान नकारात्मक सोच में नहीं होते बल्कि उनमें एक जीवन, एक आशावादी सोच एवं आकांक्षा होती है- चटकीले रंगों में समृद्ध भारतीय संस्कृति की, एक सकारात्मक सोच की एवं सहिष्णु विचारों की।

बिज़ूका... क्या आप ऐसा नहीं कहेंगे कि हमारे मन के भीतर ही एक बिजूका बैठा है। सभ्य समाज के सभ्रान्त व्यवहार, वर्जनाओं तथा बहुधा परिहास से बचने की हमारी कोशिशें लगातार इस बिजूका को दबाती/ठेलती रहती हैं। स्मरण कीजिए बहुधा हम ऐसे मुँह विचकाते, कंधे उचकाते या हास्यास्पद देह मुद्राएँ बनाते हैं तो इस तरह की सारी प्रतिक्रियाएँ उसी बिजूकेपन के कारण ही क्या नहीं होती? हाँ, इसे स्पष्ट रूप से बता पाना शायद कठिन होगा कि बाहर खेत में खड़े बिजूकों ने मन में एक बिजूका सृजित किया या मन के भीतर के बिजूके ने उसे खेत में खड़ा किया। और जैसा कि मैंने बताया कि मेरा बचपन एक ऐसे गाँव में बीता जिसके चारों ओर खेत-खलिहान, नदी, जंगल, खाई, कंकरीली-पथरीली और बैलगाड़ी के गहरे निशानों वाली कच्ची/धूलभरी सड़कें थीं। इस सब के बीच ‘बिजूका’ जो कि बेचारा दिन रात हमारे खेतों की रखवाली करता था, के साथ हम लोगों के अनेक तरह के अनुभव थे। कभी सुनसान सड़कों पर जंगलों के बीच से दिखने पर वह कोई जंगली जानवर दिखता था तो कभी हाथ से इशारा करके बुलाता हुआ दिखता था, कभी अंधेरी रातों में वह डरावना दिखता था तो कभी विदूषक की भूमिका में। कभी ऐसा ‘धोखा’ लगता था कि हम सब जानते हैं कि उसके होने और न होने का कोई मतलब नहीं है, फिर भी वह वीरान में हमारी रखवाली करने के लिए विवश है। यानि कहीं ‘प्रहरी’ की भूमिका तो कहीं ‘भयावह’ की, कहीं ‘विदूषक’ की तो कहीं ‘धोखा’ और कहीं वह एक ‘समय का साक्षी’ है जो आदि काल से अपनी जगह पर खड़ा समय को बदलते/भागते हुए देख रहा है और तटस्थ खड़ा मुस्कुरा रहा है, पाषाण युग से सैटलाइट युग तक का प्रत्यक्षदर्शी।

 अर्थात् अनेक भूमिकाओं में बिजूका को देखा है, हम सबने। वही स्मृतियाँ हैं जो नए-नए रंग-रूपों में, नवीन विचारों में, अनेक प्रवृत्तियों और तकनीक में विभिन्न प्रकार से कैनवस पर अपना आस्त्वि लेती हैं। कभी, बहुसंख्य नेता जो राजनीति को सेवा नहीं पेशा समझते हैं, अनेक तरह के उनके स्वार्थपरता से परिपूर्ण कार्य जो स्वाभाविक रूप से समाज विरोधी होते हैं, से बनने वाली भयानक तस्वीर बिजूका में दिखती है तो कभी उनके द्वारा फैलाए जा रहे परिवारवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद... आदि। यह सभी कुछ मेरे कैनवस पर ‘बिजूका’ के माध्यम से ही रूपायित होता है। कभी सरकार और सरकारी तंत्र द्वारा किए जा रहे जन विरोधी कार्य या निजी स्वार्थ में लिप्त होकर किए गए कार्य जिससे जन मानस आहत होता है, मेरे चित्रों का विषय बन जाते हैं।इस तरह से बिजूका मेरे सृजन का ऐसा आधार है जो ‘त्रिकालदर्शी’ भी है और ‘समय का साक्षी’ भी, ‘निरीह’ और ‘भयावह’ भी। इसीलिए मेरे चित्रों का बिजूका कभी समय और परिस्थितियों पर हँसता है तो कभी आगाह करता है या कहीं उल्लास से भरा होता है.... एक निष्कपट सटीक प्रतिक्रिया।

हाल के आपके एक चित्र में चमकदार पीले, लाल और काले रंगों के आवरण के केन्द्र में भी बिजूका है। रंगों की एन्द्रिकता में इसके जरिए आप क्या कोई खास संदेश देना चाहते हैं?
यह तो मनःस्थिति (समय विशेष पर मन में फैले रंग) होती है, कभी हल्के रंग तो कभी गाढ़े रंग। दरअसल इस देश में अनेक रीति-रिवाज हैं, अनेक लोक कलाएं हैं। क्षेत्रीय स्तर पर रंग-रूप, बोली, पहनावा सब कुछ बदलता रहता है पर देखें तो क्षेत्रीय पहनावों और लोक कलाओं में गहरे और चमकीले रंग अधिक प्रयोग किए जाते हैं। गाँवों में क्षेत्रीय स्तर पर विविध प्रकार के नाच-गान भी पारंपरिक रूप से अपना स्थान पाते हैं। मेरे क्षेत्र में नौटंकी, धोबिया नाच, बिरहा, चमरउवा नाच, कठघोड़वा, आदि मुख्य रूप से प्रचलन में थे। इनकी पोशाकों में चटकीले रंगों का बाहुल्य होता है जो अत्याकर्षक होते हैं। इसके अतिरिक्त जिस प्रकृति की गोद में मैं खेला-कूदा हूँ वह विविध रंग-रूपों से समृद्ध है। वहाँ सब कुछ मौलिक है। दूर तक जंगली घास और पौधों में विभिन्न प्रकार के पुष्प, खेतों में हरियाली और उसके ऊपर सरसों के पीले फूल मटर का बैंगनी और सफेद फूल, सनई की सूखी फली का बजना और उसके आकर्षक फूल, टेसू के कतार बद्ध पेड़ों पर पुष्पों का दिखना मानो प्रकृति ने चटक रंग के कपड़े पहन रखे हैं। 

सावन के बादलों और उसके रंग-रूप की अनुभूति वही कर सकता है जो गाँवों और खेतों से जुड़ा हो। यह अनुभूतियाँ जब मेरे मानस में कौंधती हैं तो मैं एक बार फिर अपने को उसके अति निकट पाता हूँ और जब कैनवस मेरे सामने होता है और ब्रुश हाथ में तो रंगांे के डिब्बे से अपने मनः स्थिति के अनुरूप कोई शेड उठाकर ब्रश से कैनवस पर फैलाना आरंभ कर देता हूँ और वही रंग योजना बन जाती है। जिस चित्र की बात आप कर रहे हैं उसमें एक गहरे लाल फ्रेम में पूरा संयोजन निबद्ध है। बिजूका खड़ा है और एक पशु भी उसके साथ है। वास्तव में दोनों का साथ बहुत पुराना है। दोनों सदियों से एक दूसरे को देखते और साथ देते आए हैं। चित्र की पृष्ठभूमि में ‘चूल्हा’ भी नजर आता है जो ग्राम्य जीवन का आधार है। मिट्टी के चूल्हे की रोटी का स्वाद व्यक्त नहीं किया जा सकता। जिसने वह जीवन जिया है, अनुभव किया है वही उस तल पर जाकर सोच सकता है। एक नगरीय जीवन में जिया, पला, बढ़ा व्यक्ति उस रोटी का मूल्य और स्वाद दोनों नहीं जान सकता जिसने बरसात की नमी से भीगी लकड़ियों को जलाने के लिए बूढ़ी माँ की आँखों से बहते आँसू और धुएं में झुलसा चेहरा नहीं देखा होगा। इसीलिए मेरे अनेक चित्रों और रेखांकनों में चूल्हे की आकृति भी नजर आती है।
जहाँ तक इस चित्र में संदेश देने की बात है तो यह उल्लास के रंग हैं। हमारी संस्कृति में अनेक पर्व, त्यौहार, उत्सव-जलसे इसीलिए प्रचलन में हैं। हम फसलों से जुड़ी खेती-बाड़ी के कामों में व्यस्त रहते हैं, तो जीवन में एकरसता सी बनने लगती है ऐसे में ये रंग जिन्दगी को और जीवन्त बनाते हैं, एक अवसर देते हैं खुश होने का, उल्लास मनाने का।

चित्र में पीछे खिँची आड़ी या बेड़ी रेखाएं वह आधार हैं जिसपर इबारत लिखी गई है या लिखी जानी है। शिल्प के तल पर यह कहीं रंगों की तानों से दबी रहती है तो कहीं उभरी रहती है, कहीं नीचे से झाँकती नज़र आती है। यह तानों को और भी संवेदनशील बनाकर एक टेक्स्चर उत्पन्न करती है।

आपके चित्रों की बड़ी विशेषता अमूर्तन में मूर्तन और मूर्तन में अमूर्तन है। एक प्रकार से दृश्य जो है, गोचर... उसे रंग और रेखाओं में परोटते हुए भी बहुतेरी बार उनमें रिचुअल्स भी दिखाई देते हैं। मसलन आपके हर चित्र में एक गोला और पार्श्व में कुछ आलंकारिक आकृतियाँ (अमूर्तन में भी) अलग से पहचानी जा सकती हैं? आपको नहीं लगता?
मैं जीवन के उस अमूर्त पक्ष को देखना चाहता हूँ जो सार है। इसी तरह मेरे चित्र भी अमूर्तनोन्मुख होते हैं जिसमें जरुरी आकार तो हैं, पर संयोजन में, पृष्ठभूमि में, टेक्स्चर के मध्य लुकाछिपी खेलते हैं, कहीं आकार प्रामिनेंट हो जाते हैं कहीं पृष्ठभूमि में विलीन होते दिखते हैं। इन आकारों में डिटेल नहीं होता। प्रायः यह अति सहज और प्रतीकात्मक होते हैं और जहाँ तक प्रश्न रिचुअल्स के आभास का है तो यह मैं पहले ही कह चुका हूँ कि ग्राम्य संस्कृति से जुड़े हर पहलू रीति-रिवाज, परम्पराएं, लोक-कलाएं, निसर्ग आदि का मेरे जीवन से गहरा रिश्ता रहा है और यह सब आज जाने-अनजाने मेरे चित्र पट पर आकार लेते रहते हैं। चित्रों में मुख्य आकार/विषय के अतिरिक्त कुछ सहयोगी आकार और प्रतीक होते हैं, जिनमें आलंकारिता भी होती है।

 यह चित्र के शिल्प का आवश्यक अंग है और यही चित्र को सम्यक रूप से देखने की रुचि भी उत्पन्न करता है। यह सभी तत्व मेरे चित्र में विद्यमान रहते हैं पर हर अगले चित्र को पिछले से अधिक रुचिपूर्ण बनाने में उन प्रॉब्लम्स को दूर करने की कोशिश रहती है जिसका सामना पिछले चित्र में किया जा चुका होता है। शायद यह सभी रचनाकारों के साथ होता है तभी हर अगला चित्र पिछले की अगली सीढ़ी के रूप में कलाकार की यात्रा बताता हुआ चलता है।मेरे चित्र का गोला कहीं तो सूर्य, कहीं चन्द्रमा और कहीं दादी-नानी की अनेक कहानियों का बयान करने वाला एक पिटारा होता है। जिसे देखते हुए आँगन में दादी के साथ लेटे उन्हीं की जुबानी दुनिया को देखने की कोशिश हर बच्चा कर रहा होता है।

रंगों के चुनाव में प्रतीक और बिम्बों को सहेजने का भी कोई खास नजरिया रहा है?

वैसे तो मैं सभी रंग-योजना में काम करता हूँ। प्रत्येक चित्र को कुछ अलग शेड में रखना चाहता हूँ, प्रयास करता हूँ। कभी तो सफलता मिलती है और कभी पैलेट में वही रंग स्वतः आ जाते हैं जो मानस पटल पर दमक रहे होते हैं पर मेरे पसंदीदा रंग-हरे और नीले वर्ण-विधान में अनेक चित्र देखे जा सकते हैं। जहाँ तक प्रतीक और बिम्ब का प्रश्न है तो भावानुकूल/विषयानुकूल प्रतीक और आकार का प्रयोग सभी चित्रों में करता हूँ। कुछ पहले की चित्र शृंखला में ‘फेस्टिव मूड’ के रंग, आकार और प्रतीक थे और उसके बाद ‘चाइल्ड हुड मेमोरीज़’ शृंखला में स्वाभाविक रूप से प्रतीक और आकार बदल गए। इनके अतिरिक्त ब्रश स्ट्रोक्स, टेक्स्चर और संयोजन समय-समय पर चित्र और विषय की आवश्यकतानुसार बदलते रहे हैं। अभी रंग की मोटी परत और बहुत उभरे टेक्स्चर मेरे चित्रों के आकर्षण के रूप में देखे जा सकते हैं। जैसे हम शरीर पर त्वचा के टेक्स्चर देखते हैं, प्रकृति में पेड़ों इत्यादि की छाल का अपना टेक्स्चर होता है और वह उसको जीवन्तता प्रदान करते हैं, उसी प्रकार ये टेक्स्चर मेरे चित्रों को सजीव बनाते हैं। दर्शक उन्हें छूकर देख सकता है।

इधर कला का जो बाजार बन रहा है, कला के माध्यम जब बदल रहे हैं (प्रसंगतः न्यू मीडिया के अंतर्गत) तो कैनवस का भविष्य आप कैसा देख रहे हैं?

आज के लगभग एक-डेढ़ दशक पूर्व एक मुहिम चली थी ‘‘कैनवस बनाम वीडियो आर्ट’’ किन्तु बाजा़र की मंदी ने उसे तोड़ दिया। मुहिम अवसान को प्राप्त हो गई। निश्चित रूप से यह बाजा़र द्वारा प्रायोजित थी। बहरहाल कैनवस का अस्तित्व सदैव रहा है और रहेगा। मैं न्यू मीडिया का विरोध नहीं कर रहा हूँ पर केवल ‘न्यूमीडिया’ के ग्लैमर की चकाचौंध में आने की आवश्यकता नहीं है, यदि प्रयोग आवश्यक हैं तो अवश्य किए जाएं। साथ ही अनावश्यक प्रयोगों से बचा जाए, जिनसे भ्रम की स्थिति न बने। अन्यथा कलाकारों से अधिक सशक्त स्थिति में टेक्नीशियन होंगे जो मीडिया के नए माध्यमों, सॉफ्टवेयर और अभियांत्रिकी/विज्ञान में अति सहज हैं और नई पीढ़ी कला के नाम पर चमत्कारों को देखकर दिग्भ्रमित होगी।

यह सच है कि आज ‘न्यू मीडिया’ पैर पसार रही है पर यही भी सच है कि साठ-सत्तर सालों में यह जहाँ तक पहुँची है उससे यह भी साफ हो गया है कि अधिसंख्य कलाकारों और दर्शकों/कला प्रेमियों द्वारा यह पूरी तरह ग्राह्य नहीं है। कैनवस और मूर्तियों को देखकर दर्शक को जो अनुभूति होती है वह अतुलनीय है। यही रसास्वादन आज कैनवास/मूर्तिकला को उस स्थान पर ले गया है, जहाँ उसका भविष्य सुरक्षित है।
कैनवस से जुड़ाव की शुरुआत....? 

बचपन में दीवारों पर, जमीन पर मिट्टी में उँगली या किसी छोटी सी लकड़ी से कुछ आस-पास की आकृतियाँ जैसे- नाव, हवाई जहाज, ट्रैक्टर, बैल, बकरी, चिड़िया आदि बनाया करता था, जिसे आस-पास के लोग प्रोत्साहित करते थे पर वह मार्ग दर्शन नहीं मिल पाया कि इसकी समुचित शिक्षा-दीक्षा हो सके या किस प्रकार चित्र रचना करूँ कि वह सार्थक दिशा में हो।

इसी तरह हाई स्कूल-इण्टमीडिएट फिर बी.ए. करता गया, बेमन से। बी.ए. करते समय फैजाबाद शहर में एक नन्दलाल पाण्डेय मिले जो कला एवं शिल्प महाविद्यालय, लखनऊ से कला-शिक्षित थे। उनसे यह संस्कार जरूर मिला कि मैं अपनी आगे की पढ़ाई कैसे करूँ और इसी तरह कला एवं शिल्प महाविद्यालय, लखनऊ में शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय गया जहाँ मुझे बी.एफ.ए. (चित्रकला) में प्रवेश मिल गया। मेधावी रूप में वहाँ से स्वर्ण पदक भी मुझे दिया गया और वहीं से मैंने एम.एफ.ए. की उपाधि भी ली। पश्चात् डॉक्टरेट (रुहेल खण्ड विश्वविद्यालय, बरेली) करने के साथ ही मैंने एक समर्पित चित्रकार के रूप में लखनऊ में रहकर कार्य आरम्भ किया और आज भी कर रहा हूँ। इच्छा है कि देश और देशीय सीमा से बाहर सभी बड़े नगरों में कभी न कभी मैं अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाऊँ, अपनी कला से सभी को परिचित कराऊँ। इस तरह से मेरा कैनवस से नाता बना और विवाह (2003) पूर्व मेरे घर वाले तो प्रोत्साहित करते ही थे किन्तु विवाहोपरान्त मेरी पत्नी डॉ. लीना मिश्र ने हर प्रकार का सहयोग देकर कैनवस से मेरे इस सम्बंध को और भी प्रगाढ़ बनाया।

पिकासो ने कभी कहा था, ‘‘कलाकृति का कोई अस्तित्व नहीं होता....वह कोई भौतिक वस्तु नहीं है।....वास्तव में कला जीने का एक तरीका मात्र है।’’ कहा जाता है हमारे यहाँ कलाएं अभी भी जीवन से जुड़ी नहीं हैं या अभी भी आम आदमी का कला से सीधे कोई सरोकार नहीं है आप इसे कैसे देखते हैं?

जहाँ तक आम आदमी का प्रश्न है तो हम यह नहीं कह सकते कि वह कला से जुड़ा नहीं है। अनेक कलाएं (लोक कलाएं) आम आदमियों के बीच ही पनपी हैं। अब विशेष रूप से किसी कला की बात करें तो शायद समकालीन कला के साथ आम आदमी का जुड़ाव नहीं है। यह संप्रेषण का अभाव जो आम आदमी और समकालीन कला के बीच हमें दिख रहा है उसके लिए कोई एक पक्ष जिम्मेदार नहीं है। आज कलाएं ‘बाजा़र से जुड़ गई हैं और संग्राहकों के संग्रहों में जाकर दब गई हैं’ या समय-समय पर केवल नीलामी-घरों में देखी जाती है। जहाँ यह एक सच्चाई है वहीं कलाकार भी रातोंरात स्टार बनने और धनाढ्य होने के सपने देखने लगा है, वह कम कीमतों में कला को आम जनता के बीच नहीं जाने देना चाहता। इसके साथ ही यदि हम आदमी के पक्ष को देखें तो कितने लोग समाज में ऐसे हैं जो करोड़ों का मकान बनवाने, फार्म हाउस बनवाने के बाद उसमें हजारों की ही पेंटिंग टाँगते हैं? इस देश में यह संस्कार कहाँ विकसित हो रहा है कि अच्छे/मँहगे टेलीविजन सोफे, फर्नीचर या अन्य मनोरंजन के साधनों या घर में ही जिम के अनेक सामान सजाने (स्वास्थ्य के प्रति सजग होने) के साथ ही अच्छे चित्रों को भी दीवार पर टाँगें? इससे हमें मानसिक खुराक मिलती रहेगी? आखिर एक अच्छा व्यक्ति बनने, व्यक्तित्व को संतुलित रखने में कलाओं/साहित्य का भी तो जबरदस्त योगदान है।

इसीलिए इस बिन्दु पर पूरा समाज जिम्मेदार है केवल कोई एक पक्ष नहीं। देखें तो कौन सी कला ऐसी है जो मार-काट, हिंसा, आतंकवाद, क्षेत्रवाद, परिवारवाद, जातिवाद, धर्मवाद या इस तरह की कुरीतियाँ और अनाचार फैलाती हैं? मैं तो कहता हूँ कि यदि यह संस्कार हमारी अगली पीढ़ी में डाले जाएं, उन्हें कलाओं से जोड़ा जाय तो उपरोक्त अनेक समस्याओं से समाज को निजात मिल जायेगी। वे जीने का सलीका सीख जायेंगे। सम्पूर्ण भूमण्डल सहिष्णु बन जायगा। हम एक दूसरे को समझने, परखने की क्षमता विकसित कर लें, हमारे भीतर सहानुभूति/समानुभूति का तल और गहरा हो जाय और सभी का सभी से सरोकार बढ़ जाय, ऐसे स्वप्नों को जीवन में उतारने की वांछित संवेदनशीलता कला के गहरे संस्पर्श एवं अनुभव से आ सकती है। मात्र कला की समझ एकाकी है यह तो तब पूरी होती है जब हम एक कलापूर्ण जीवन और सहअस्तित्व का मंत्र साध पाते हैं।

कलाकार होने के साथ ही पिछले एक दशक से आप कला पत्रिका ‘कलादीर्घा’ के संपादन से भी जुड़े हुए हैं। आपके कलाकार को संपादन का यह कर्म बाधित नहीं करता?

नहीं, ‘कला दीर्घा’ और मेरी कला एक दूसरे को सहयोग करते हैं। पत्रिका संपादित करने की प्रक्रिया में बहुत सारे कलाकारों, कलाओं, घटनाओं, आयोजनों आदि से मैं परिचित और अद्यतन होता रहता हँू। मैं समझता हूँ कि किसी कलाकार को भी अपनी मोनोटोनी ब्रेक करने के लिए ‘कुछ और’ चाहिए, केवल कोई प्रेमिका ही नहीं ‘कला दीर्घा’ जैसा कुछ रचनात्मक भी। इस पत्रिका से मुझे यह भी सीखने, जानने और समझने का अवसर मिलता है कि एक कलाकार और कला के साथ कैसे न्याय किया जाय। इसीलिए सन् 2000 से नियमित यह पत्रिका प्रकाशित हो रही है और साथ ही नियमबद्ध तरीके से प्रतिवर्ष कुछ सामूहिक व एकल कला प्रदर्शनियाँ भी। यदि नियम से समयबद्ध तरीके से कार्य किया जाय तो दोनों एक-एक दूसरे के पूरक के रूप में भूमिका निभाते हैं, शायद इसी का परिणाम है कि इस वर्ष लगातार मैं कई एकल प्रदर्शनियाँ कर पा रहा हूँ।

भारत से बाहर भी आपकी कला प्रदर्शनियाँ लगती रही हैं। वहाँ आपके कार्य को लेकर कैसी प्रतिक्रिया रही है?

लंदन, बर्मिंघम, दुबई और मस्कट में मेरी प्रदर्शनियाँ आयोजित हुई हैं। वहाँ मेरे काम को सराहा गया है। कई कला-प्रेमियों ने मेरे चित्रों को अपने दीवारों की शोभा बनाया है। आज भी विदेश के कला प्रेमी मेरी वेबसाइट  या फेसबुक पर मेरी पेंटिंग देखकर मुझसे संपर्क करते हैं, अपने कविता, निबन्ध और कहानी संग्रहों के कवर पर प्रकाशित करते हैं। कई बार इन चित्रों पर अनेक तरह की प्रतिक्रियाएं आती हैं, उसकी थीम, कला स्कीम और फार्म पर चर्चा होती है। अच्छा लगता है यह जानकर कि वहाँ भी मेरी कला के कद्रदान हैं।

कोई और इच्छा/योजना?

मैं समझता हूँ, ठीक ही चल रहा है। नियमित रूप से मैं अपनी कला को समय दे पा रहा हूँ। विचार आते हैं रूपायित होते हैं। प्रयोग करने के लिए अनेक तकनीक और सामग्रियों का इस्तेमाल कर पाता हूँ। प्रदर्शनियाँ हो रही हैं। कला पर चर्चा हो रही है एक कलाकर के लिए इससे अच्छा और क्या हो सकता है? बस इच्छा है कि भारत का कोई कोना न बचे जहाँ मेरी कलाकृतियाँ न पहुँचें। मैं खूब काम करता रह सकूँ।इस वर्ष दिल्ली और मुंबई में चार बड़ी प्रदर्शनियाँ हुई हैं, आगे  और प्रदर्शनियाँ करूँगा, और चित्र बनाऊँगा, बाजा़र के लिए नहीं अपने विचारों को रूपायित करने के लिए। विचार, जो समाज की कुरीतियों, प्रशासनिक/राजनैतिक अव्यवस्थाओं से आहत और शोषित होने तथा न्याय न मिलने की हताशा। तो नकारात्मक संवेदन भी एक परिवर्तन का भी उत्साह तथा विश्वास से दमकते हुए होंगे के उपरान्त आते हैं। मैंने पहले ही कहा है कि मैं आशावादी हूँ, उल्लास के रंग भरता हूँ। जिंदगी को जीना चाहता हूँ .... सबको साथ लेकर।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
Dr Rajesh Kumar Vyas
III/39Gandhi Nagar
Nyay Path, Jaipur-15
Mobil- +91 94615 00204
Email: dr.rajeshvyas@yahoo.co.in
dr.rajeshvyas5@gmail.com
Blog: http://drrajeshvyas.blogspot.com
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