''फिर भला मेरे कदम क्यूं पीछे हटते।''-विमला भंडारी - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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''फिर भला मेरे कदम क्यूं पीछे हटते।''-विमला भंडारी


पाठक साथियों उनका एक पुराना साक्षात्कार यहाँ छाप रहे हैं जब उन्हें वाचस्पति की उपाधी से समान्नित किया जा रहा है.ये बातचीत प्रख्यात पत्रकार दुर्गाशंकर त्रिवेदी द्वारा लिया गया साक्षात्कार प्रश्नावली एवं उसके उत्तर  के रूप में यहाँ प्रस्तुत हैं.-सम्पादक 
   
अपनी बाल्यावस्था की स्मृतियां बताइएं ?

विमला जी भंडारी 
उत्तर - बात उस समय की है जब मैं कक्षा 6 की छात्रा थी। यह वह समय था जब अंगेजी भाषा का ज्ञान कक्षा 6 से प्रारंभ होता था। अंग्रेजी जानना और बोलने का अपना एक महत्व था। उन्हीं दिनों एक हिट पिक्चर आई थी - संगम। मैंने यह पिक्चर अपने मम्मी पापा के साथ देखी। इसमें अंग्रेजी का एक वाक्य ‘‘आई लव यू’’ मुझे समझ नहीं आया। आता भी कैसे? मैं तो अभी पहली बी सी डी ही सीख रही थी। अंग्रेजी सीखने का नया-नया चाव था अतः मैंने पापा से इसका अर्थ पूछा। उन्होंने मुझे अर्थ बताने की जगह झिड़क दिया। मम्मी से पूछने का तो सवाल ही नहीं था क्योंकि वह यह भाषा जानती ही नहीं थी। मैंने सोचा, दूसरे दिन टीचर से पूछ लूंगी। दूसरे दिन मैं कक्षा में टीचर से प्रश्न पूछने के लिये खड़ी हुई। पास बैठी मेरी सहपाठीन मेरी फ्रॉक खीचने लगी और कहने लगी मत पूछो विमला, इसका अर्थ मैं तुम्हे बताती हूं। वह अर्थ बताते हुए बताने लगी - मैं तुमसे प्यार करता हूं। यह सुन मैंने उससे कहां- हुंह! यह भी कोई अर्थ हुआ? अगर इसका यहीं अर्थ सही है तो इसमें पापा के डांटने जैसी क्या बात हुई

यह अर्थ तो वो भी मुझे बता सकते थे। उसकी बात पर मुझे विश्वास नहीं हुआ और मैंने टीचर से पूरे विश्वास के साथ पूछा। एक पल के लिये टीचर अवाक् रह गई। कुछ नहीं बोली। फिर कहने लगी तुम्हें इसका अर्थ जानकर क्या करना है? पूरी बी सी डी याद की है या नहीं, पहले यह बताओ? टीचर ने भी अर्थ बताने की जगह मुझे डांटकर बिठा दिया। मैं मायूस होकर नीचे बैठ गई। मेरी सहपाठिन मुझे बराबर इसका अर्थ बताती रही किंतु मैं इसे मानने को तैयार नहीं थी। 

कस्बाई परिवेश में आपको लेखन की प्रेरणा कैसे मिली?

उत्तर- दरअसल मैंने लेखन और राजनीति में साथ साथ कदम रखा। जब मैंने पहला नगर पालिका के पार्षद का चुनाव लड़ा तब मुझे वोट मांगने के लिये पहली बार द्वार द्वार जाना पड़ा। मैं अपने घर की देहरी लांघकर पहली बार बाहर निकल आम जनता के बीच पहुंची। तब मैंने जाना कि लोग कैसे जीवन यापन करते है? कैसे अभावों में जीते है। उनके मन कितने निर्मल और निश्छल है। उन लोगों का प्रेम और अपनापन मेरी समस्त संवेदनाओं को जगा गया। जिसने मेरे जीवन की दिशा ही बदल दी। सोच बदल दी। रहन सहन और बातचीत के तौर तरीके बदल गये। एक बार की बात है मेरी किसी से बहुत जोरदार बहस हुई। उस दिन मन बहुत उदिग्न था। मैंने कागज पेन लिया और विचारों को उतार लिया। इन्हीं दिनों मैं पत्रकारिता में डिग्री कोर्स कर रही थी। एक सशक्त माध्यम से रूबरू हो रही थी। 

दूसरे ही दिन मैंने अपना लिखा राजस्थान पत्रिका में प्रकाशन हेतु भेज दिया। पत्रिका में मेरा लेख रविवार परिशिष्ट के मुख्य पृष्ठ पर रंगीन चित्र में छपा। इस तरह सन् 1990 दिसंबर के अंक में मेरी पहली रचना छपी। सुखद आश्चर्य की बात है तब उस परिशिष्ट के संपादक आप अर्थात् दुर्गाशंकर त्रिवेदी थे। इसके बाद मैंने कई लेख लिखे जो निरंतर छपे। इसके बाद तो एक जनून मुझ पर सवार हो गया। लेख, बालकहानी, फीचर, कहानी लिखती रही। देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही। पाठकों के पत्र मेरे लेखन को सशक्त करते रहे। एक दिन की मैंने अपनी रचनाओं की 14-14 डाक भी भेजी थी। एक रात में तीन-तीन कहानियां भी लिखी थी। रचनाएं रेडियो में प्रसारित होने लगी। प्रोढ़ो के लिये, नवसाक्षरों के लिये लिखा।15-20 साल के राजनैतिक सामाजिक जीवन के साथ आज लेखन मेरी पहली जरूरत बन गई है। इस क्षेत्र में अपनी एक पहचान बनाकर लेखन के माध्यम से जो आज मैं किसी के लिये कुछ कर पाती हूं तो बहुत खुशी मिलती है।

उच्च शिक्षा के लिये संघर्ष करना पड़ा था या पारिवारिक सहयोग रहा।

उत्तर- अच्छे घर परिवार से संबंधित होने कारण मुझे प्रायः किसी भी क्षेत्र में संघर्ष कम ही करना पड़ा। मेरे दोनों पक्ष के परिवार ने मुझे हर कदम पर साथ दिया। केवल साथ ही नहीं मेरे बढ़ते कदम पर खुशी और गर्व भी महसूस किया। फिर भला मेरे कदम क्यूं पीछे हटते।

प्रथम प्रकाशित रचना के संदर्भ में आपकी प्रतिक्रिया जानना चाहूंगा।

उत्तर- अपनी पहली रचना को राज. पत्रिका के प्रथम पृष्ठ पर रंगीन चित्र सहित प्रकाशित देख मुझे बेहद खुशी हुई। मेरे परिजन, सास-श्वसुर और पति बेहद गौरांवित महसूस कर रहे थे। मेरे लिये यह खुशी बहुत विशिष्ट थी। अपनी पहचान दर्ज कराने के अनूठे सुख से लबरेज थी। रिश्तेदारों और लोगों के बधाई, सराहना और प्रशंसा भरे पत्रों ने, फोन ने खुद में असीम विश्वास जगाते हुए मुझे उत्साह से भर दिया। मन में इस क्षेत्र में पांव बढ़ाने की उमंगे हिलारे लेने लगी। मैं और लेखन, मेरे नित्यकर्म में शामिल हो गया। मैं अबाध गति से लिखने लगी और छपने लगी। एक मजेदार बात बताऊं- जिस दिन मेरे पास प्रकाशित रचना का पारिश्रमिक आता बच्चे मुझसे उसके एक हिस्से की राशि से चॉकेलेट लेकर खाते। उनका इस तरह खुशी मनाना मुझे गद्गद कर देता। मेरे लेखकीय जीवन में कई पड़ाव आये जो परमानंद के थे परन्तु पहली प्रकाशित रचना की यादगार मेरे अंतस में पहले प्यार की तरह आज भी अंकित है। मेरी यह रचना थी - ‘‘घरेलू कलह से कैसे निपटे’’

क्या लेखन आपके गृहिणी जीवन को प्रभावित करता है?

उत्तर- उल्टी बात है। मेरा लेखन गृहिणी जीवन से प्रभावित होता रहा है। बल्कि मैं तो यह कहती हूं कि उबड़-खाबड़ गति से चलता है। घर-परिवार, पति, बच्चे और बुजुर्ग हमेशा मेरी पहली प्राथमिकता रहे है। लेखन को मैंने हॉबी के रूप में अपनाया है। समय को चुरा कर इस कर्म को करती रही हूं। यह बिल्कुल सही है कि अगर मुझे पर्याप्तसमयऔरश्रम की बचतमिलती तो मुझमें उर्जा की कमी नहीं रही। मेरी महत्वकांक्षा कभी-कभी सन्यास को श्रेयस्कर मानने लगती है। लगता है सबकुछ छोड़-छाड़कर दूर कंदराओं में बैठकर लिखा जाय। मेरा लक्ष्य बहुत ऊंचा है और मेरी मंजिल बहुत आगे तक जाती है किंतु मैं अपनी पूरी निष्ठा और समग्र चेतना से इससे जुड़ नहीं पाती। अगर ऐसा होता तो मैंनेफिरकीजैसा अनूठा उपन्यास कब का लिखा होता। शायद और दस पुस्तकों की कल्पना को साकर कर पाती। कई नायक कई पात्र मेरी कल्पनाओं में जन्म लेकर दम तोड़ते रहे है। कलमबद्धता के अभाव में मेरे सजृन का गर्भपात होता रहा। इसका मुझे बेहद अफसोस और मलाल रहता है। पर घर-परिवार, पति-बच्चे-बुजुर्ग मेरी थाती है इनकी बलिवेदी पर मैं सजृन नहीं चाहती। हां, पर कभी-कभी अधूरे कार्य को अंजाम तक पहुंचाने के लिये मुझे ऐसा भी करना पड़ता है। तब मन इनकी अनदेखी समझ अपराध भाव से ग्रसित हो जाता हैं। फिर परिवार पर समस्त चेतना केन्द्रित कर इस खामियाजे को पूरा करने की कोशिश करती हूं।

अपने शोध परक ऐतिहासिक ग्रंथ के संदर्भ में कुछ बताइये।

उत्तर- छः वर्ष के रनअप एण्ड पेन डाऊन जैसी स्थिति को निरंतर पार करते हुएसलूम्बर का इतिहासनामक शोध ग्रंथ उदार व्यवसायीयों द्वारा प्रदत्त आर्थिक सहयोग से प्रकाशित हुआ। इसका तत्कालीन गृहमंत्री गुलाबसिंहशक्तावत द्वारा भव्य लोकार्पण समारोह हुआ। सलूम्बर राजमहलों के जोधनिवास प्रागंण में करीबन हजार-डेढ़ हजार लोगों के अपार जनसमूह ने इस पुस्तक का स्वागत किया। इसके साथ ही इसके ऐतिहासिक गौरव को मंडित करते हुए पहली बार सलूंबर को पर्यटन से जोड़ने की मैंने मांग उठाई गई। सलूंबर को 800 वर्ष पुराना इतिहास सौंप कर मैं सरस्वती की इस असीम अनुकम्पा पर बेहद संतुष्ट थी। निसंदेह इस पुस्तक ने मेरे सम्मान, यश को बढ़ाते हुए सशक्त हस्ताक्षर के रूप में मेरे लेखन को स्थापित किया।मैं लेखिका बनूंगी ऐसा तो मैंने कभी सोचा ही नहीं था। विवाह से पूर्व मैं तो विज्ञान स्नातक थी, डॉक्टर बनना चाहती थी। विवाह के 15 साल बाद अक्समात् ही (महिला आरक्षण की कृपा से) मैंने राजनीति में फिर लेखन, और फिर सामाजिक क्षेत्र में एक साथ प्रवेश किया। चुनाव जीतकर मैं पार्षद थी। उदयपुर मंडल के स्काऊट एवं गाईड की उपप्रधान और विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में छपने वाली, आकाशवाणी से जुड़ी हुई एक रचनाकार थी।

वह दिन मेरे जीवन का अहम दिन था जब मैं रेल में कोटा जाने के लिये सफर कर रही थी। एक पुस्तक बेचने वाला आया। उससे मैंने महाराणा प्रताप पर लिखी एक 30 पेज की छोटी पुस्तिका खरीदी। उसे पढ़ने के साथ मुझे सलूम्बर के गौरवमयी इतिहास का स्मरण हो आया। हाड़ीरानी के बलिदान पर एक ऐसी ही छोटी पुस्तिका लिखने की मैंने सोची ताकि उसके त्याग और बलिदान की कहानी जन-जन तक पहुंचे और जन प्रेरणा ले। मेरे पास मेरे नानाजी जो कि सलूम्बर ठिकाने के कामदार थे उनकी हस्तलिखित 33 पेज की सलूम्बर इतिहास को रेखाकिंत करती हुई एक पाण्डुलिपी रखी हुई थी। सलूम्बर आते ही सबसे पहले मैंने उस पाण्डुलिपी के आधार पर 22 पेज का पहला सलूम्बर का इतिहास लिखा। अब इसके प्रकाशन की सोच मैं राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय के उन दिनों के वाईस चांसलर प्रोफेसर भवानी शंकर गर्ग से मिली। उन्होंने मेरे काम को देखा और मुझे विद्यापीठ की एक ईकाई साहित्य संस्थान के तत्कालीन निदेशक डॉ. देव कोठारी के पास भेज दिया। डॉ. कोठारी ने मेरी पाण्डुलिपी निरीक्षण के बाद कई प्रश्न पूछे और मुझे मार्गदर्शन दिया। मेरे उत्साह को देख उन्होंने कई कार्य करने को कहे।

यह वह समय था जब तो मैं इतिहास को जनती थी और ही शोध-अध्ययन और अन्वेंषण को। कार्य करती रही। फील्ड कार्य में मेरे पति का भरपूर सहयोग रहा। उनके साथ कई स्थानों का भ्रमण किया। कई लोगों से सम्पर्क किया। कैमरा खरीदा, फोटोग्राफी सीखी। टेप खरीदी और लोगों के साक्षात्कार, लोक गीत रिकार्ड किये। सलूम्बर इतिहास के पृष्ठों की संख्या बढ़ती रही। स्थापत्य, नगर वर्णन आदि कार्यो में विख्यात इतिहासविद डॉ. राजशेखर व्यास का महत्वपूर्ण योगदान रहा। मेरा लेखन करीब करीब पुस्तक का आकार ले चुका था। एक महीने के अथक प्रयास से मैंने सलूम्बर ठिकाने का नक्शा भी तैयार करवा लिया। लगभग 60-70 सलूम्बर से जुड़े फोटो भी संग्रहित हो चुके थे। इसी समय सलूम्बर कॉलेज के वाईस प्रिंसिपल के रूप में हमारे परिचित, इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर असावा का सलूम्बर कॉलेज में नियुक्त होना हुआ। उन्होंने लगातार दो दिन की बैठक देकर इसे जांचा और आवश्यक सुधार के सुझाव दिये। इस पर मैंने इसका पुनः परिशोधन किया। इतिहास विषय में स्नातक होने का दुख मन में सालता रहा। 

अंत में पुस्तक आकार ले चुकी थी। उसके पूरे कलेवर को मैंने अनुक्रम में बांट कर शीर्षक दे दिये थे। अब इसके प्रकाशन और कम्प्यूटर टाईप सेटिंग दो प्रमुख काम बचे थे। सलूम्बर में लाईट का बार बार जाना और कम्प्यूटर वाले की टाईपिंग की गलतियां और तिस पर उसके नखरे मेरी बर्दाश्त के बाहर हो गये। मैंने अपने दामाद मनमोहनजी पोरवाल से इस कठिनाई का उल्लेख किया। उन्होंने मुझे खुद कम्प्यूटर खरीद लेने की सलाह दी। बच्चों ने भी साथ दिया। कम्प्यूटर खरीदा गया और मैंने घर बैठे दामाद और बिटिया मनीला, कपीला के सहयोग से अपने काम की चीजों को सीख लिया। यह 1998 का समय रहा होगा। मैंने अपनी किताब का मैटर खुद टाईप किया, सेट किया और अंत में प्रकाशन का रास्ता खोजा मेरे पति ने। उन्होंने अपने नजदीकी प्रमुख व्यवसायियों से सम्पर्क कर आवश्यक से अधिक धन जुटा दिया। इस प्रकार मेरी एक नहीं दो-दो पुस्तक एक साथ अनुपम प्रकाशन के बैनर तले प्रकाशित हुई। दूसरी प्रकाशित होने वाली पुस्तक बाल उपन्यास इल्ली और नानी थी। जिसे राष्ट्रीय बाल शिक्षा परिषद ने कहानी का राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया।

औरत का सचकी कहानियां नारी मन की अनुभूतियों की गहनता से रची गई हैं। पाठकीय प्रतिक्रियाएं क्या रही?

उत्तर- औरत का सच कहानी संग्रह का आना बाद की चीज है। इसकी कई कहानियां विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी थी। मसलन राजस्थान पत्रिका, पंजाब केसरी, नई दुनिया, आज, जैसे कई दैनिकांे के अलावा सरिता, गृहशोभा, मेरी सहेली, जाहन्वी, मधुमती जैसी कई पत्रिकाओं में छपने के बाद मुझे कई पत्र प्राप्त हुए। पाठकों की भी विभिन्न श्रेणियां रही। साधारण पाठक से लेकर प्रबुद्ध वर्ग एवं समीक्षकों के पत्र मुझे प्राप्त हुए। संग्रह की पहली कहानीगोमती का दर्दजहां मेरी 70 वर्षीय सास द्वारा अत्यधिक प्रशंसित हुई वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. कमलकिशोर गोयनका ने इसे मुंशी प्रेमचंद की कहानियों के समकक्ष माना। 

डॉ. गोयनका लिखते है कि वे प्रेमचंद पर 14 समीक्षा की पुस्तके लिख चुके है। उनकी प्रशंसा पाकर मैं निहाल थी। उन्होंने इसकी तुलना प्रेमचंद केदो बैलनामक कहानी से की। दो बैल कहानी जिसे मैं आज तक नहीं पढ़ पायी हूं। इसी तरह इस संग्रह की दूसरी कहानीजनमगांठ के गुलाबजामुनजिसे सुनकर मेरी मां की आंखों से अविरल अश्रुधार बह निकली थी और वह इसके अंत पर बहुत खुश हो उठी थी। इसको भी प्रेमचंद की कहानी से तोला गया। प्रेमचंद की बूढ़ी काकी से इसकी तुलना हुई तो मैंने बूढ़ी काकी को पढ़ा। संग्रह की कहानीयशोधरा दीदीहो यामैं और तुमयामैंकृकृ...मैंयाअचीन्हा स्पर्शसभी ने पाठकों को दर्द दिया, रूलाया और सम्बल दिया। वे अपने दिल के तार पत्रों के माध्यम से जोड़ने लगे। पर बहुत कठिन होता है इस निरंतरता को बनाएं रखना। दो चार पत्रों बाद मुझे उनसे नाता तोड़ना पड़ता था। कई लोग मिलने घर चले आते और अपनी समस्याएं रखते। तो कई अपने रिश्ते जोड़ते। इस क्रम में बालकृष्ण मुज्जतर साहब का उल्लेख करना अति आवश्यक है। मुज्जतर साहब ने मुझे अपनी मानस पुत्री बना लिया था। उनका पहला पत्र मिला। लिखा था- प्यारी विदुषी बिटिया। इस संबोधन ने मुझे रूला दिया। करीबन बीस साल बाद किसी ने मुझे इस तरह संबोधित किया था। मेरे पिता के देहान्त के बाद इतने प्यार, अपनापन और सम्मान के साथ रसपगे ये बोल लिखे थे- 72 वर्षीय कुरूक्षेत्र के मशहूर शायर और शहर के मेयर ने।

आपने बाल साहित्य भी रचा पर इधर बंद क्यों हो गया?

उत्तर- बाल साहित्य लिखने में एक अर्द्धविराम जरूर आया था पर उसकी कमी मैंने एक ही छलांग लगाकर अभी इसी साल पूरी कर ली है।बगिया के फूलनामक 60 पृष्ठों का, 15 बाल कहानियों का संग्रह मार्च में आया। जिसका लोकार्पण उदयपुर की प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था युगधारा ने अपने दो दिवसीय बाल साहित्य सम्मेलन में करवाया। इस पुस्तक पर युगधारा सम्मान से मुझे गौराविंत भी किया गया।

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