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‘‘आजादी के बाद भी आदिवासी काली चमड़ी वालों से शोषित हैं’’- निर्मला पुतुल

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, दिसंबर 15, 2011 | गुरुवार, दिसंबर 15, 2011


बूंदी,राजस्थान 
राष्ट्रीय संगोष्ठी रिपोर्ट:-लंबी गुलामी के बाद देशवासियों को आजादी मिली है। पर आदिवासी उससे आज भी महरूम है। अगर आदिवासी में फर्क आया है तो वह केवल आवरण में जो दूर से देखने पर नजर आता है, अगर उस आवरण पर अंगुली का हल्का-सा दबाव डाला जाए तो वह बैंगा, सहरिया, शबर तक पहुंच जायेगी तब पता चलेगा कि (संथाल, मीणा और मुंडा) कुछ अपवादों को छोड़ दें तो हालात अच्छे नहीं है। आदिवासियों के आजादी बाद के हालात देखने के लिए 07-08 दिसम्बर 2011 को राजकीय महाविद्यालय, बून्दी में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रायोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ’’आजादी के बाद आदिवासी ने क्या हासिल किया ?’’ विषय पर आयोजित की गई। देशभर से आये विद्वानों रचनाकारों और शोधार्थियों ने पांच दर्जन से अधिक शोध पत्रों का वाचन किया। पत्रों में यह बात पुरजोर ढंग से उभरकर सामने आयी कि आदिवासी पर अगर शीघ्र कुछ नहीं किया गया तो बहुत-सी जनजातियां अपना अस्तित्व नहीं बचा सकेंगीं। 

बूंदी महाविद्यालय में एक वर्ष के अंतराल में ‘आदिवासी समाज दशा और दिशा’ देखने के पश्चात क्रमशः आदिवासी के हासिल पर ठहर कर मथंन किया गया। इस राष्ट्रीय महत्व  के विषय पर विचार करने के लिए झारखंड से आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल, बिरेन्द्र महतो और डॉ वीरेन्द्र सोय, महाराष्ट्र से कवि वाहरू सोनवणे और राजस्थान से हरिराम मीणा जैसे तीन-तीन कवियों के संगम से त्रिवेणी का अहसास होता है। यह एक ऐसा अवसर था जहां पर जीवंत अनुभव सुनने को मिले। झारखंड वालों से पता चला कि अगर ऐसी संगोष्ठी झारखंड में होती तो आयोजन स्थल पुलिस छावनी बन चुका होता पर यहां सब कुछ शांतिपूर्ण होता है। उद्घाटन समारोह की मुख्य अतिथि प्रसिद्ध आदिवासी कवयित्री निर्मला पुतुल, विशिष्ट अतिथि महाराष्ट्र के प्रसिद्ध आदिवासी कवि वाहरू सोनवणे व पूर्व उपकुलपति तथा ख्याति प्राप्त पत्रकार श्री रामशरण जोशी थे तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के निदेशक व रचनाकार डॉ0 आर.डी. सैनी ने की।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में आदिवासी शहीद बिरसा मुण्डा व दिवंगत डॉ रामदयाल मुंडा की तस्वीर पर दीप प्रज्जवलन व माल्यार्पण किया गया। प्राचार्य डॉ. डी.के.जैन ने संगोष्ठी का राष्ट्रीय महत्व बताते हुए सभी अतिथियों का हार्दिक स्वागत किया। विषय का प्रवर्तन करते हुए आयोजन सचिव डॉ. रमेश चन्द मीणा ने कहा कि विकास की नई-नई इबारत लिखते जा रहे देश में आदिवासी कहीं भी नजर नहीं आ रहा है। अतः ऐसे विकास को प्रश्नवाचक दृष्टि से देख लेना वाजिब है इसीलिए इस संगोष्ठी का आयोजन किया गया है। जब एक तरफ देश का निरंतर विकास हो रहा है और दूसरी तरफ विकास के ही नाम पर आदिवासियों का पलायन, विस्थापन जारी है। आदिवासी नक्सलवाद, ग्रीनहंट और सलुवाजुडूम जैसे आपरेशनों से हिंसा के शिकार हो रहे हैं। उदारी करण में बेशक विकास हो रहा है पर यह विकास महज चंद लोगों का है। इस विषमतापरक विकास के खिलाफ आवाज अब भारत में ही नहीं अमेरिका में भी उठ रही है। आदिवासी के संदर्भ में ठहर कर सोचने-विचारने केी जरूरत है। गांधी ढ़ाई सौ वर्षो की गुलामी से बिना हिंसा के ही निजात दिलाते हैं तब गांधी के देश में आदिवासी हिंसाग्रस्त रहे, विकास के नाम पर विस्थापित होते रहे। समतापरक देश के लिए ठीक नहीं है। 

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि पूर्व कुलपति तथा वर्तमान में वर्धा विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रामशरण जोशी ने आदिवासियों के बीच लम्बे समय तक रहकर काम करने के अनुभवों को व्यक्त करते हुए आदिवासियों के विकास के बजाय पिछड़ते चले जाने पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आज हम स्वतंत्रता के 6 दशक बाद भी विकास के मापदण्ड की कसौटी निर्धारित नहीं कर पाये हैं। वर्तमान विकास में अन्तर्विरोध है, जिस पर आत्ममंथन करने की जरूरत है। विकास की रणनीति पूंजीवादी चरित्र धारण किये हुए हैं, जिसमें आदिवासी किसी भी तरह से फिट नहीं हो रहे हैं। वैश्वीकरण के मॉडल में जो फिट नहीं होते वे बर्बाद हो जाते हैं। बर्बाद होने वाला वर्ग आदिवासी ही है। क्यों आदिवासी क्षेत्र सैनिक छावनियों में तब्दील होते चले जा रहै हैं? आदिवासियों में असंतोष और नफरत का भाव क्यों पैदा हो रहा है? वस्तुतः जब तक आदिवासियों की सहभागिता विकास की रणनीति में निर्धारित नहीं की जायेगी, सार्थक परिणाम नहीं आयेंगे। भारत एक राष्ट्र राज्य है जिसमें 10 करोड़ आदिवासी हैं। इस दस करोड़ आबादी की अवहेलना नहीं की जा सकती। आज जरूरत है समतावादी व विषमतामुक्त विकास की। आखिर हमें सोचना पडेगा कि आदिवासी में नागरिकता की चेतना क्यों नहीं आ सकी है? विकास की रणनीति पर पुनः समीक्षा करने की महती आवश्यकता है। 

भिलोरी भाषा के प्रसिद्ध कवि वाहरू सोनवणे ने आदिवासी संस्कृति को परिभाषित करने वाले कई गीत सुनाते हुए आदिवासी जीवन के उज्जवल पक्षों को रखा। उन्होंने जोर देकर बताया कि आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने के नाम पर छला जा रहा है। सभ्य कहे जाने वाले समाज और राजनेताओं की दृष्टि में आदिवासी समाज निर्जीव, अमानवीय तथा असभ्य हैं। उनको विकसित करने के नामपर सिर्फ छला जा रहा है। समता पर आधारित व प्रकृति का संरक्षण करने वाले समाज पर चारों तरफ से आक्रमण हो रहे हैं। उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि आदिवासियों की इतिहासकारों ने तो उपेक्षा की ही है आज भी उनकी उपेक्षा पाठ्यक्रमों में देखी जा सकती है। पाठ्यक्रमों में आदिवासियों के लिए जो कुछ लिखा और पढ़ाया जाता है उसमें आदिवासियों को चोर, शराबी, आलसी, कामचोर के रूप में दिखाया जाता है। क्या आदिवासियों में कोई अच्छाई नही है, क्या उन्होंने किसी तरह से अच्छा काम नही किया? आजादी के दौरान किए आदिवासी बलिदानों को भुला दिया गया है। जब गांधी देश में आन्दोलन चला रहे थे आदिवासी उसी लड़ाई को सुदूर जंगलों में लड़ रहे थे तथा हजारों आदिवासी अंग्रेजों द्वारा गोलियों से भून दिये गये थे लेकिन लोग गांधी, तिलक, आदि के गुणगान करते थकते नहीं और आदिवासियों का बलिदान भुला दिया जाता है। देश का असली जलियांवाला हत्या काण्ड मानगढ़ पहाड़ी पर हुआ था जिसमें अनगिनत आदिवासी मारे गये पर इतिहास के पन्नों पर अंकित नहीं है। ऐसा क्यों? आदिवासियों ने मजबूरी में धर्म परिवर्तन किया, कांग्रेस में गये, भाजपा में गये, कम्युनिष्ट बने पर सभी जगह उनके साथ छल हुआ है किसी ने उसे अपने पैरों पर खड़ा नही होने दिया, स्वावलम्बन का पाठ नही पढ़ाया, ऊपर से उन्हें सभ्य बनाने का दम्भ भरते हैं। आदिवासी जाति नही जमात है, मुख्य धारा में लाने की बात सही नही क्यों कि मुख्य धारा में भी दोष है। क्या मुख्यधारा में आने पर उनकी संस्कृति और मूल्य बचे रह सकेंगे? आज उनकी धार्मिक, संस्कृति पर आक्रमण हो रहे हैं। 
मुख्य अतिथि निर्मला पुतुल ने आदिवासी औरत के साथ पुरुष के द्वारा किए जा रहे छल का पर्दाफास पूरे आत्मविश्वास के साथ करती है। दिकू समाज ने आदिवासियों को छला है। आदिवासी औरत को पुरुष हमेशा वासना की नजर से देखता है। आदिवासी स्त्री इस बात को अच्छी तरह से महसूस कर सकती है। यहां के इतिहासकारों तथा सभ्य समाज के बौद्धिक कहे जाने वाले लेखकों ने उन्हें गलत ढंग से चित्रित किया है तथा उन्हें ऐसा ही जाना व समझा गया है। आदिवासियों का शोषण आजादी से पहले गोरी चमड़ी के लोगों ने किया अब काली चमड़ी के लोग कर रहे है। उन्होंने कहा कि विकास कार्यक्रम और योजनाओं के माध्यम से आदिवासियों को छला जा रहा है। मुख्यधारा की मानसिकता साफ नही है। जहां तक आजादी हासिल होने की बात है, उसे जिल्लत, पशुता के सिवाय  कुछ नही मिला है। कभी उसकी जमीन छीनी जा रही है तो कभी उसकी संस्कृति। यदि देश उसका विकास चाहता है तो कम से कम उसे उसकी जमीन पर तो रहने दो। संस्कृति को मत छीनों। सरकार नहीं चाहती कि हमारा विकास हो। देश का आदिवासी, दलालों के हाथों बिक रहा है। आदिवासियों के साथ हो रहे छल से उनमें अविश्वास का भाव पैदा हुआ है। आदिवासी की सम्पदा, परम्परा और संस्कृति कैसे नष्ट हो, हर योजना अंततः इसी मकसद से बनाई जा रही है। अध्यक्षता कर रहे डॉ. आर.डी.सैनी ने आदिवासी शहीद स्थल मानगढ़ को राष्ट्रीय स्मारक बनाने की बात कही। जिस पर उपस्थित लोगों ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव किया। हमें जोड़ने की बात करना चाहिए तोड़ने की नही। लोकतंत्र में कई फैसले दबाव में लिये जाते हं। जिसका दबाव अधिक होगा उसके हक में फैसले हो जाते हैं। गोविन्द गुरु ने इसी दबाव का सहारा लिया। आदिवासी को अपनी लड़ाई लोकतांत्रिक तरीके से लड़नी चाहिए जैसे गांधी, गोविन्द गुरु तथा महात्मा ज्योतिबाफुले ने लड़ी। अन्त में उन्होंने कहा कि ‘‘करे कोई तरकीब ऐसी कि सब संभलते रहे, हवाये भी चलती रहे और दिये भी जलते रहे’’। उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ.ललित भारतीय तथा डॉ.विवेक मिश्र झालावाड़ ने किया। 

उद्घाटन सत्र के बाद छः सत्रों में कार्यक्रम चलता है ‘‘विकास की अवधारणा में आदिवासी’, ‘मीडिया में आदिवासी के लिए जगह’, भारतीय साहिय में आदिवासी’, उदार भारत में आदिवासी महिला, ‘ डॉ.रामदयाल मुंडा को याद करते हुए डॉ वीरभारत तलवार का व्याख्यान’ और समापन में आदिवासी क्षेत्रीय आयोग के निदेशक द्वारा सम्पन्न हुआ। प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता दलित साहित्यकार रत्नकुमार सांभ्रिया, मुख्य वक्ता बजरंग बिहारी तिवारी, दिल्ली, विशिष्ट वक्ता वीर सिंह रावत बांसवाड़ा तथा झारखण्ड से आये डॉ. वीरेन्द्र सोय रहे। डॉ आदित्य गुप्ता झालावाड़ के साथ सत्र में लगभग 15 शोधपत्र प्रस्तुत किये गए। पत्रों में आजादी के बाद अपनाये गये विकास के मॉडल की विसंगतियों को कई तरह से उजागर किया है। आज विकास के मॉडल में आदिवासियों की परिस्थितियों पर विचार नही किया जा रहा है विकास के दुष्परिणाम आदिवासी भुगत रहे हैं वे विस्थापित है अपनी पुश्तैनी जमीन से, देवता-से पहाड़ और जीवन देने वाले जंगल से। सत्र संचालन डॉ. ललित भारतीय ने किया तथा धन्यवाद डा. लालचन्द कहार ने दिया।

पहले दिन के अंत में दो समानान्तर सत्र आयोजित किये गये पहले में ‘मीडिया में आदिवासी के लिए जगह’ तथा दूसरा सत्र ‘भारतीय साहित्य में आदिवासी’ विषय पर आयोजित हुए। ‘भारतीय साहित्य में आदिवासी’ विषय पर आधारित सत्र के अध्यक्ष साहित्यकार पुन्नी सिंह तथा मुख्य वक्ता जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ.वीरभारत तलवार रहे। सत्र में भारतीय साहित्य में आदिवासी साहित्य की पड़ताल करने वाले लगभग 12 शोध पत्र प्रस्तुत किये। डा. मनीषा शर्मा ने कथा साहित्य में आदिवासी महिला की अस्मिता, डॉ. सियाराम मीणा ‘ग्लोबल गांव में आदिवासी’, कोमल सोमाणी ने शैलूष के नटों की स्थिति, डा. गीता कपिल ने अल्मा कबूतरी में आदिवासी नारी की संघर्ष गाथा, सुश्री अनीता ने ग्लोबल गॉव में आदिवासी अस्मिता, रुचि मिश्रा ने कब तक पुकारुं उपन्यास में चित्रित आदिवासी समाज, नीतू सिंह चौहान ने अल्मा कबूतरी उपन्यास में आदिवासी जीवन, दिव्या सिंह ने भारत की आदिवासी महिलाओं के विकास की समस्याएँ,, ज्योतिष चौहान ने ‘कलावे में उभरती भील शोषण की त्रासदी’, सृष्टि भारतीय ने ‘भारतीय आदिवासी साहित्य और साहित्यकार’ विषय पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किये, जिनकी प्रो.वीरभारत तलवार ने समीक्षा की तथा साहित्यकार पुन्नी सिंह ने बताया कि भारतीय साहित्य में आदिवासी को वह स्थान नही मिला जिसका वह हकदार रहा है। सत्र का संचालन हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. विजयलक्ष्मी सालोदिया ने किया।

‘मीडिया में आदिवासी के लिए जगह’ विषय पर आयोजित सत्र में अध्यक्षता दिल्ली से आये साहित्यकार अनिल चमड़िया ने की तथा मुख्य वक्ता के रूप में जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय जोधपुर के प्रोफेसर डा. श्रवण कुमार मीणा रहे। मीडिया की भूमिका पर विचार व्यक्त करते हुए मुख्य वक्ता ने बताया कि अगर आदिवासियों की समस्या और मुद्दों पर मीडिया के बतौर विचार किये जाने पर पता चलता है कि लोकतंत्र का यह चौथा स्तंभ भी आदिवासियों के मुद्दों को ठीक से नही उठा पा रहा है वह हर समय पूंजीवादियों के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। राज्य की छवी को कॉरपोरेट स्टेट में बदलने में मीडिया की भूमिका रही है। जब से पेड न्यूज का चलन बढ़ा है तब से उसकी विश्वसनीयता कम हुई है। अनिल चमड़िया ने बताया कि मीडिया में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व का शुरू से ही अभाव रहा है। आज मीडिया में काम करने वालों में आदिवासी कहीं दिखाई नही देते। मीडिया में आदिवासियों के न होने के कारण आदिवासियों की आवाज मीडिया में कभी चिन्ता का कारण नहीं बनती है। इस सत्र में दिल्ली से आये पत्रकार शैलेश, डॉ. केदार प्रसाद मीणा, पूर्णिमा उरांव, अरूण उरांव, वर्धा से आये चंन्द्रीका ने आदिवासी और मीडिया के सवालों को अपने शोध पत्रों में प्रस्तुत किया। अन्त में आयोजन सचिव डॉ. रमेशचन्द मीणा ने सभी अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापित किया।

दूसरे दिन संगोष्ठी का चौथा सत्र 9 बजे से पुस्तकालय भवन में प्रारम्भ हुआ। अध्यक्ष निर्मला पुतुल तथा मुख्य वक्ता डॉ. सपना चमड़िया, विशिष्ट वक्ता प्रो. मनोज कुमार एवं विवेक शंकर मिश्र रहे। इसमें सर्वप्रथम श्री वीरेन्द्र कुमार माथुर ने ‘‘विकास की अवधारणा में आदिवासी’’ पर अपना पत्र वाचन किया तत्पश्चात् श्री लालचन्द कहार ने श्री सोनवणे की कविता ‘‘आदिवासियों की अस्मिता’’ एवं ‘‘पालमण्डी बस्ती’’ कविताओं की विवेचना की। श्री गुलाब चन्द पांचाल ने निर्मला पुतुल की कविता ‘‘उतनी दूर मत ब्याहना बाबा’’ पर पत्र वाचन किया। श्री रामस्वरूप मीणा ने आदिवासी महिला सशक्तिकरण समस्या व चुनौती, श्री अशोक कुमार गुप्त ने लद्दाख की आदिवासी महिलाओं के शोषण तथा वहां की पारम्परिक प्रथाओं और आर्थिक स्थितियों पर पत्र वाचन किया तत्पश्चात् श्री दामू ठाकरे ने महाराष्ट्र की आदिवासी महिला की स्थितियां रखीं। संचालन कर रहे श्री विवेक मिश्र ने निर्मला पुतुल की कविता ‘‘उतनी दूर मत ब्याहना बाबा’’ का पाठ एवं कविता की यथार्थपरक समीक्षा की। डॉ. कंचना सक्सेना ने आदिवासी शोषण व अत्याचारों पर पत्र वाचन किया। मुख्य वक्ता डॉ. मनोज कुमार (दिल्ली) ने अपना पत्र वाचन किया तथा श्री ओम प्रकाश कुकी (बून्दी) ने आदिवासी शिलालेखों एवं शैलचित्रों को अपने लेपटॉप पर विडियो क्लिपें दिखाई तथा विस्तार से जानकारी दी। इसके पश्चात् श्री विवेकशंकर मिश्र (बारां) ने सहरिया जनजाति के आजादी के बाद विकास पर अपना पर्चा पढ़ा। मुख्य वक्ता डॉ. सपना चमड़िया ने आदिवासी स्त्रियों की वर्तमान स्थिति पर पत्र वाचन किया।सत्र की अध्यक्ष कवयित्री निर्मला पुतुल ने सत्र मं पढ़े गए शोध पत्रों पर विस्तार से विचार प्रस्तुत करते हुए स्त्री के प्रति पुरुष मानसिकता को बदलने की जरूरत बताया। जब तक उन्हें बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता तब तक बदलाव संभव नहीं है। जब आदिवासी बच्चा गर्भ से ही कुपोषित है तब बराबरी कैसे हो सकती है? आदिवासी को दोस्त समझे जाने की जरूरत है। डॉ. अनीता यादव ने धन्यवाद ज्ञापित किया। 

पांचवां सत्र विशेष रूप से डॉ. रामदयाल मुण्डा की स्मृतियों को समर्पित था। जिनका देहावसान 30 सितम्बर, 2011 को हो गया था। वे इसी महाविद्यालय में 2010 में हुई राष्ट्रीय आदिवासी संगोष्ठी में मुख्य अतिथि रहे थे। डॉ. वीर भारत तलवार ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। डॉ. मुण्डा शिकागो में रहकर अट्ठारह साल अध्यापन करने वाले शिक्षाविद् रहे हैं परन्तु मुंडा वेश-भूषा व व्यक्तित्व से अन्त तक अपने आदिवासी समाज से जुड़े रहते हैं। वे अपने उद्बोधन के बाद बाँसुरी की धुन छेड़ना नहीं भूलते थे। मुंडा राजनीतिज्ञ थे, विद्वान थे और उच्चकोटि के बुद्धिजीवी थे लेकिन असफल राजनेता रहे। मेरा उनसे परिचय 1974 में हुआ जो अंत तक बना रहा। उन्होंने रांची विश्वविद्यालय के भाषा विभाग को जिस तरह से बनाया और चलाया वह प्रेरणादायी और अनुकरणीय है। झारखंड को बनाने में उनका योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। मुंडारी भाषा में अधिक कवि नहीं हुए फिर भी उन्होंने 1967 में मुंडारी कवियों का संग्रह निकाला। उनके प्रयास से अलग हटकर कविताएं लिखीं गई। वे गीत गाते थे जो लोक में जाकर बदल जाया करते। एक पुस्तक राजनीति पर लिखी जिसमें झारखंड के भविष्य की चिंता देखी जा सकती है। आदिवासी समाज सोया हुआ है उसकी गति धीमी है उसे गति प्रदान करने वाले रहे हैं डॉ मुंडा। मुंडा कवि थे, कहानीकार थे। उनकी कहानियां महाश्वेता देवी से अधिक जीवंत रही है। उनकी कहानी ‘उस दिन रास्ते में’ कोमल किस्म की वेदना से युक्त है। जो रैणु की ‘रसिकप्रिया’ और रवीन्द्रनाथ टेगोर की कविता की याद दिला जाती है। वे मुंडारी में गीता, ध्रवस्वामिनी’ का अनुवाद करते हैं। वे नारीवादी नहीं रहे हैं। डॉ. तलवार ने उनकी मुण्डारी भाषा में लिखी कविताओं का हिन्दी पाठ प्रस्तुत किया। उनके अनुसार बौद्धिक क्षमता में डॉ. मुण्डा का कोई सानी नहीं था।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक एन.एल.पवन ने पुलिस के नजरिये में आदिवासियों की स्थिति को बखूबी पूरी स्पष्टता से प्रस्तुत किया। उनका कहना था कि यह वर्ग अभी तक मुख्य धारा में शामिल नहीं हो पाया है। यह समाज की विड़म्बना है कि वीर, साहसी यौद्धा आदिवासी समुदाय को छोटा कहा जाता है और चालबाज लोग बड़े कहलाते हैं। इतिहास भरा पड़ा है, प्रश्न खड़ा है कि आदिवासी मुख्यधारा से दूर है। पुलिस की समाज में छवि इस अर्थ में हैं-‘जो कमजोर है, जो छोटे हैं, जिसका दमन हो रहा है, उनके रक्षक होने चाहिए। दुख है कि पुलिस उनके साथ है जो उनका दमन करते हैं। पुलिस और पुरोहित दोनों में समानता है दोनों ही जजमान से कुछ लिए बिना नहीं मानते हैं। पुलिस मत्स्य न्याय के खिलाफ बनाई गई थी। वह गरीब का काम नहीं करती तभी ऐसे विषयों पर संगोष्ठियां करनी पड़ती है। उन्होंने आरक्षण फिल्म का उदाहरण दिया और उपस्थित शिक्षक समुदाय से आग्रह किया कि भविष्य में एकलव्य के साथ द्रोणाचार्य जैसा व्यवहार न हो। सत्र के अध्यक्ष डॉ. हरिराम मीणा ने रामदयाल मुण्डा की याद में श्रृद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके अधूरे पड़े कामों को पूरा करने की आवश्यकता पर जोर दिया। 

दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का समापन समारोह दोपहर 02.30 बजे आयोजित किया गया जिसके मुख्य अतिथि आदिवासी साहित्यकार हरिराम मीणा और अध्यक्ष क्षेत्रीय आदिवासी आयोग, जयपुर के निदेशक गोविन्द सोमावत रहे। साहित्यकार हरिराम मीणा ने कहा कि सदियों से आदिवासी जंगल, जल, जमीन का जो दावेदार रहे हैं किन्तु आज वकील पूछता है कि तुम्हारे पास क्या सबूत है कि यह जमीन तुम्हारी है़। आदिवासी के सन्दर्भ में यह प्रश्न बेतुका है, क्योंकि उनकी जमीन सरकारी कागजों में दर्ज ही नहीं हो पाई है। उनके यहां निजी सम्पŸिा की अवधारणा ही विकसित नहीं हो सकी है। इस कारण से भी वे जमीन खो रहे हैं। आज उन्हें शांतिभंग करने वाला कह कर मारा जा रहा है जो चिंता का विषय है। सत्र के अध्यक्ष गोविन्द सोमावत ने आदिवासियों की समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बेरोजगारी और गरीबी, उनकी प्रमुख समस्या है, उन्हें 365 दिन रोजगार चाहिए तथा शिक्षा, स्वास्थ्य आदि क्षेत्रों में आदिवासियों के लिए काम करने की आवश्यकता है। सरकार की योजनाओं की जानकारी पूर्ण न होने के कारण उनको लाभ नहीं मिलता है। प्राचार्य, डॉ. डी.के.जैन ने बाहर से आये अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यह संगोष्ठी देश और समाज के लिए उपयोगी सिद्ध होगी तथा आदिवासियों के संदर्भ में सकारात्मक माहौल निर्मित करेगी। 

विकास की अवधारणा में आदिवासी शामिल हो इसके लिए संगोष्ठी में कुछ बिंदु सामने आये हैं-विस्थापन, पलायन, पुनर्वासन और जीविका-अर्जन के संसाधनों का लघु व बृहत स्तरों पर सर्वेक्षण किया जाए, विभिन्न परियोजनाओं से प्रभावित आदिवासियों की समस्याओं का समाधान होना चाहिए, वन कटाई और भूमिअर्जन के मामले में संबंधित क्षेत्र के लोगों की पंचायत का निर्णय मान्य हो, निजी पूंजी के लोगों को किसी तरह की छूट नहीं दी जाए। इन अंचलों के लोगों के लिए विवेचनात्मक शिक्षा प्रणाली शुरू की जाए। अंचलों में संवेदनशील व प्रतिबद्ध प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति होनी चाहिए, छोटी-बड़ी परियोजनाओं के क्रियान्वयन में स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाए। सक्रिय ‘आंतरिक औपनिवेशीकरण’ की समस्त प्रक्रियाओं का अंत किया जाए। ऐसे बीस सूत्र रामशरण जोशी द्वारा सुझाए गए तो 1913 में राजस्थान के मानगढ़ में मारे गए भीलों के स्थल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किए जाने का प्रस्ताव पारित किया गया। आयोजन सचिव ने बाहर से आये अतिथियों, शोधार्थियों और विद्वानों का आभार व्यक्त करते हुए आदिवासी साहित्य लेखन और शोध कार्य करने की आवश्यकता बतलाई। साहित्यकारों, मीडियाकर्मियों और आदिवासियों के सावचेत होने पर ही सार्थक परिणाम सामने आयेंगे। इसके बाद सभी अतिथियों ने हाडौती का खास डिस(पकवान) कŸा बाफला का भोजन कर प्रस्थान किया। 


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डॉ सियाराम मीणा,
(राजकीय महाविद्यालय,बून्दी)
2-ए-16, जवाहर नगर, बून्दी, राज. 323001
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