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''तब समाज में साहित्य का आदर था, आज खेमेबाजी है।''-वीरेन्द्र आस्तिक

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, दिसंबर 17, 2011 | शनिवार, दिसंबर 17, 2011


साक्षात्कार : गीत सन्दर्भ


आप सृजन की ओर कैसे प्रवृत्त हुए? तब और आज के साहित्यिक परिदृश्य मे आप किस प्रकार का परिवर्तन देखते है ? 


उत्तर:  घर में साहित्यिक पुस्तके उपलब्ध थी, उन्हे पढ़ने का संस्कार पिताजी से मिला। मेरे घर में गांधी और महर्षि दयानंद सरस्वती जैसे समाज सुधारको के जीवन दर्शन की किताबे मौजूद थी। उन दिनों (शायद 1955-56) साप्ताहिक हिन्दुस्तान भी मेरे घर आता था। तब मै 5वीं कक्षा में था। गॉव का रहन-सहन था। साहित्य क्या होता है तब पता नही था। पिताजी की कई खूबियों मे एक थी उनका गायक होना। वे महफिलो मे ध्रुपद आदि गाते थे। कभी-कभी भजन आदि मुझसे भी गवाते थे। उक्त परिवेश में स्वाभाविक था, गीत-सृजन को महत्व देना। 



आपके प्रश्न के उत्तरार्द्ध का उत्तर है - तब एकजुटता थी, समाज में साहित्य का आदर था, आज खेमेबाजी है। व्यक्तित्व और कृतित्व में काफी फर्क आ गया है। अपने गीत के युवाकाल में कवि सम्मेलनों का महत्व था। तब जो साहित्य लिखा जाता था वही मंच पर पढ़ा ता था। गोष्ठियों-साहित्यिक अड्‌डेबाजी में निराला, महादेवी, दिनकर और बच्चन और नेपाली के संस्मरणों पर और उनकी रचनाओं पर चर्चा होती थी। तब हास्य कवियों का जमाना नहीं था। मंच पर श्रृंगार और ओज के दस कवियों में एक हास्यरसी हुआ करता था, लेकिन आज इसका उलट है। स्वतंत्रता संग्राम के साथ-साथ एक कार्य और हुआ, वह था भाषा का निर्माण। जब युद्ध स्तर पर निर्माण कार्य चल रहा होता है तब आदमी विदूषक नहीं हो सकता। आज लगता है जैसे हिन्दी भाषा के निर्माण का कार्य पूरा हो चुका है। शायद तभी सुविधा सम्पन्न पूंजीपतियों ने हास्य को जन्म दिया। हिन्दी के अच्छे-अच्छे प्रवक्ताओं ने हास्य के व्यवसाय में घुस कर वास्तविक कविता को मंच से बाहर कर दिया। आज साधना नहीं नाम और दाम के लिए लोग जुगाड़ के शार्टकट अपना रहे हैं।



आपने अपने साहित्यिक जीवन में गीत को अपनी अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बनाया, क्या कारण रहा ? 

उत्तर: गीत के साथ-साथ मैने गजलें और दोहे भी लिखे हैं। अब तो समीक्षाएं भी लिख रहा हूँ। अभिव्यक्ति के लिए गीत को माध्यम बनाया, क्योंकि मैने बताया कि मै बचपन से हर भजन कीर्तन आदि गाता था, मेरा कंठ सुगेय था। इन सभी के कारण मुझे लय और छन्द को समझने में कठिनाई नहीं हुई। दूसरी बात जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है कि मै भावुक, कल्पनाशील और स्वप्नदर्शी कुछ ज्यादा ही था। 



आपके रचनाकर्म मे जनचेतना और सामाजिक संवेदना का समाहार प्रभावशाली ढंग से हुआ है। 'रमुआ', 'नरगिस' और 'कोयल' जैसे गीत तो व्यापक स्तर पर व्याख्या चाहते हैं। इनके बारे मे आपका अपना दृष्टिकोण क्या है?

उत्तर: गीत में चेतना और संवेदना का समन्वय ही तो किया जाता है। दूसरे शब्दो मे कहूँ तो रचनाकार हृदय और बुद्धि का पारिग्रहण कराता है गीत में। कर्म का स्वामी होता है हृदय और कर्म को सार्थक दिशा देने का कार्य करती है बुद्धि। दरअसल मेरे गीतों के कथ्य में जनबोध और समाजबोध अलग-अलग नहीं हैं। वहॉ जन का ही समाज है । अब प्रश्न के उत्तरार्द्ध का उत्तर दूंगा। पहली बात- मैं कोई आलोचक तो हूँ नहीं। आलोचकों की व्याखयाएं विस्तार से होती हैं फिर भी.......। मेरे विचार से मूल तो रचना ही होती है। रचना की रचना होती है आलोचना। गीत रचते समय जो जमीनी दृश्य होता है उसके बारे में तो रचनाकार से ज्यादा किसको पता होगा। दरअसल 'रमुआ' अति साधारण-जन का प्रतीक शब्द है। यह शब्द उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जो गरीबी की रेखा से भी निचले स्तर का है। इस गीत में अनेक संज्ञाएं - विशेषण रमुआ के पर्यायवाची बनकर रमुआ के अर्थ को व्यंजित करते हैं, जैसे धोती, लंगोटी, रोटी, मोची, मजदूरी, छप्पर, आदि। इन शब्दो के विलोमार्थ शब्द भी हैं जो रमुआ की अस्मिता को मूल्यांकित करते हैं। साथ में ये सारे शब्द एक कथा भी कहते जाते हैं। गीत का मुख्य केन्द्र है इसमें सुख और सुख के आसपास है घटनाओं का जाल। भारत की गरीब जनता जिस सुखवाद की छाया के नीचे बसर करती है उसका प्रतीक है रमुआ। हिन्दी कविता मे एक अलग तरह का जीवन दर्शन है यह। इसमें गांधीवादी विचारधारा भी समाहित हो गई है शायद।



 मेरी कविता का नायक दरअसल भीड़ का भी प्रतीक है, उसका कोई अपना नहीं है, शायद तभी मंत्री की गाड़ी से कुचलकर मरजाने पर कोई दंगा आदि नही हुआ। वह ऐसा मोची है जो खुद जूता नहीं पहन सका अर्थात उसकी हैसियत से बहुत दूर था जूता। इसी प्रकार 'नरगिस' है जो छोटी कविता की बड़ी कथा है और जो सांप्रदायिकता और फिर सद्‌भाव के असाधारण रूप को प्रकट करती है । पता ही नहीं चल पाता कि कब रचनाकार ने प्रेम तत्व या दैविक रूप को एक अस्त्र के रूप में खड़ा करके एक व्यक्ति (नरगिस के पापा) के हृदय का परिवर्तन कर दिया। उसे संप्रदायी होने से बचा लिया। 'कोयल' नौकरी पेशा लड़कियों- महिलाओं का प्रतीक शब्द है। यह गीत भी एक रूपक कथा है। महिला का तेज तर्रार होना, ईमानदार होना पुरूष वर्ग को असहनीय है। अंततः व्यवस्था के तहत धूर्तबाज सीनियर उसकी कीर्ति को धूमिल करने के प्रयास में जुट गए। विपत्ति में फॅसी महिला को सीता याद आती है। सीता एक ऐसा प्रतीक-बिम्ब है जो कथा को नयी दृष्टि देता है। राम याद आते तो गलत हो जाता। उस समय सीता जैसा धैर्य और साहस चाहिए था महिला को। सीता को राम पर अटूट विश्वास था, वे रावण का बध करके उसे मुक्ति दिलाकर अंगीकार करेंगे । यह सब कविता में है नहीं सिर्फ सीता शब्द से उद्‌भाषित होता है । दरअसल 'कोयल' और 'नरगिस' स्त्री सशक्तीकरण की भूमिका में भी है।



मेरे विचार से आम आदमी की वेदना ही आपके गीतों का प्रतिमान है। क्या कहना चाहेंगे ?

उत्तर: आपका सोचना बिल्कुल सही है, लेकिन यह वह वेदना है जो आम आदमी के उत्पीड़न से उद्‌भूत है। वास्तव मे मेरे गीतों में आम और खास के द्वन्द्वात्मक संबंधों की व्यंजना है। कहीं कहीं तो वेदना जीवन दर्शन में रूपान्तरित हो गई है। कहीं तो 'जिन्दगी ही धर्म है' जैसी सूक्तियां हैं। कहीं अन्तिम आदमी में नई दुनिया के रचाव की उम्मीद है। अनपढ  में तथागत का मूर्तन। निपट आदमी में ईश्वर का प्रकट होना। स्वर्ग का साधारणीकरण। तो कहीं गमले में खिले गुलाब के रूप में वही रमुआ है जिसका अभी पीछे उल्लेख हुआ था। कहने का आशय यही कि आपको मेरे गीतों में संवेदना और विचार के विविध और अछूते आयाम मिलेंगे । 



आप व्यक्तिगत जीवन में अच्छे साहित्य एवं सच्चे साहित्यकारों के हिमायती रहे हैं, जिसका प्रमाण 'धार पर हम- एक और दो' और आपके समीक्षात्मक आलेख हैं। आलोचना की कसौटी पर अच्छा गीत और एक सच्चा गीतकार कैसा हो? 

उत्तर: गीतकार यदि सच्चा होगा तो गीत अच्छा होगा ही। 'आलोचना की कसौटी क्या है' पर विचार ही नहीं करता गीतकार। एक विषय के रूप में आलोचना शास्त्रका अध्ययन जरूरी हो सकता है। अध्ययन तो रचनाकार के अनुभव संसार को समृद्ध करता ही है। लेकिन रचना प्रक्रिया के दौरान रचनाकार के सामने वह अनुभूत सत्य होता है जिसने उसको भीतर तक मथ दिया होता है। वहॉ अमूर्त, मूर्त होने के लिए सांगोपांग जुटाने की प्रक्रिया में होता है। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि उस समय रचनाकार स्वयं अनुभूति मात्र हो जाता है। रचना और आलोचना का पहला रिश्ता तो द्वन्द्व का है और द्वन्द में अच्छी रचना तो हो नहीं सकती। दूसरी बात एक सच्चा गीतकार, आलोचना की कसौटी पर ध्यान ही नहीं देता। आलोचना स्वयं रचना की ओर आती है, क्योंकि रचना से ही आलोचना की नई मान्यताएं निकलती हैं। हॉ यह सही है कि मैंने अच्छी रचना और सच्चे साहित्यकारों की तलाश में कुछ अच्छे कार्य किए हैं लेकिन यह तभी संभव हो सका है जब मेरे भीतर पहले से ही वह ईमानदारी और दृष्टि मौजूद रही। आज तो ईमानदारी-सच्चाई जैसे मूल्यों का पतन हो चुका है। सच्चा रचनाकार अच्छे की तरफ भागता नहीं, वह समग्रता में खुद को तलाशता है। वह जो होता है, वही तलाशने में व्यतीत होता रहता है । 



देखने में आया है कि महत्वपूर्ण गीत संकलनों में संपादकों ने अपनी रचनाओं को भी प्रस्तुत किया है, किन्तु 'धार पर हम-दो' में आपने अपने आपको अलग रखा। क्या वजह रही? और इस प्रकार की (पुस्तक प्रकाशन हेतु) क्या कोई अन्य योजना भी है ? 

उत्तर: लेकिन ऐसे भी संकलन हैं जिनमें संपादकों ने खुद को बतौर रचनाकार प्रस्तुत नहीं किया। 'धार पर हम (१९९८)' का मैं संपादक भी हूँ और एक गीतकार भी। मैंने उसमें खुद को अन्तिम कवि के रूप में रखा, यह सोचकर कि मैं तो निःस्वार्थ साहित्य सेवा में तत्पर हूँ। किन्तु वहॉ यह तर्क तो दिया जा सकता है कि रचनाकार ने खुद को चर्चा में लाने के लिए संकलन को निकाला। लेकिन यदि संपादन कार्य एक ही शीर्षक से दूसरे-तीसरे खण्ड के रूप में निकलता जा रहा है तो फिर कोई तर्क छोड़ना ठीक नहीं। तब संपादक पूरी तरह स्वतन्त्र होता है अपनी दृष्टि-दिशा के प्रति। अच्छे परिणाम के लिए तभी वह निर्मम भी हो सकेगा। कभी-कभी खुद पर आश्चर्य होता है- बिना किसी की सलाह लिए और बिना 'तार सप्तक' जैसी योजना को देखे यह कार्य कर डाला। भविष्य में, इस तरह की किसी योजना पर पुनः कार्य कर सकता हूँ, पर अभी कहना मुश्किल है ।



गीत एवं नवगीत में अन्तर क्या है? उसके आधुनिक एवं उत्तर आधुनिक सरोकार क्या है? और उसके सामने कौन-सी चुनौतियॉ हैं?

उत्तर: गीत और नवगीत में काल (समय) का अन्तर है। आस्वादन के स्तर पर दोनों को विभाजित किया जा सकता है। जैसे आज हम कोई छायावादी गीत रचें तो उसे आज का नहीं मानना चाहिए। उस गीत को छायावादी गीत ही कहा जायेगा। इसी प्रकार निराला के बहुत सारे गीत, नवगीत हैं, जबकि वे नवगीत की स्थापना के पहले के हैं। दूसरा अन्तर दोनो में रूपाकार का है। नवगीत तक आते-आते कई वर्जनाएं टूट गईं। नवगीत में कथ्य के स्तर पर रूपाकार बदला जा सकता है। रूपाकार बदलने में लय महत्वपूर्ण 'फण्डा' है। जबकि गीत का छन्द प्रमुख रूपाकार है। तीसरा अन्तर कथ्य और उसकी भाषा का है। नवगीत के कथ्य में समय सापेक्षता है। वह अपने समय की हर चुनौती को स्वीकार करता है। गीत की आत्मा व्यक्ति केन्द्रित है, जबकि नवगीत की आत्मा समग्रता में है। भाषा के स्तर पर नवगीत छायावादी शब्दों से परहेज करता दिखाई देता है। समय के जटिल यथार्थ आदि की वजह से वह छन्द को गढ़ने में लय और गेयता को ज्यादा महत्व देता है । 



नवगीत, गीत का आधुनिक संस्करण जरूर है, लेकिन आज की युवा पीढ़ी नवगीत को ही गीत मानती है और यह स्वाभाविक भी है। पिता और पुत्र में पीढ़ी का अन्तर जरूर होता है लेकिन पुत्र, पिता को पिता ही कहता है। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात तो यह है कि रचना को गीत या नवगीत कुछ भी कह लें पर उनके तीन अंग अविभाज्य हैं, ये हैं- लय, आमुख और अंत्यानुप्रासिकता। गीत-नवगीत के सौन्दर्यबोध के ये महत्वपूर्ण और अनिवार्य अंग है। अब आते हैं आपके प्रश्न के उत्तरार्द्ध पर । साहित्य (नवगीत) से आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता वाद के सरोकार हैं जैसे समाज के सरोकार हैं। आधुनिक युग तक आते-आते साहित्य, समाज का केवल दर्पण ही नहीं रहा, बल्कि अब तो वह मनुष्य और उसकी वैश्विक सभ्यता का द्रष्टा भी है और विश्व-विचारक/ विश्लेषक भी। साहित्य का उत्तर आधुनिकतावाद, विश्व-समाज का भूमण्डलीकरण है जो प्रकारान्तर से (व्यावसायिक और औपनिवेशिक दृष्टि से) एक साथ कई हरकतें कर रहा है- वह गरीब की रोटी छीन रहा है, भ्रष्टाचार को परवान चढ़ा रहा है, देश को अंग्रेजीपरस्त बना रहा है, स्त्री को निर्वसन कर रहा है और साहित्य को बेबस-निर्वीय बना रहा है। गीत-नवगीत को इन्हीं सारी चुनौतियों का जबाव देना है। किसी हद तक वह दे भी रहा है। लेकिन वह सतर्क रहे, भूमंडलीकरण के इस यज्ञ में घी डालने का अवसर मिल गया है, उन देसी सामंतवादी सांप्रदायिक ताकतों को, जिनका सफाया कर दिया था प्रेमचंद, प्रसाद और निराला की आंधी ने। 



 कभी गीत और नई कविता के विद्वानों के बीच तनातनी सुनने को मिलती है, तो कभी कविता और कहानी के बीच। इससे आज के समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?


उत्तर : संदेश तो अच्छा नहीं जाता लेकिन वह पीढ़ी जो कविता बरक्स गीत या कहानी बरक्स कविता आदि से खुद को चर्चा में रखती थी, अब अवसान की ओर जा चुकी हैं। मेरे विचार से साहित्य को पढ़ने वाला जो समाज है वह साहित्य के भीतर की तनातनी और फतवेबाजी आदि को पढ़ने में रूचि नहीं लेता। मेरी जानकारी में अधिकांश जो कवि और लेखक हैं, साहित्य की दुरभिसंधियों से दूर रहना चाहते हैं। एक हकीकत और भी है- हमारा समाज गद्य कविता में ज्यादा रूचि नहीं लेता। वास्तव में साहित्य के पाठक वर्ग को बनाने में जिन विधाओं की महती भूमिका रही है, वे हैं- गीत, गजल, दोहा, कहानी और उपन्यास, व्यंग्य विद्या भी। जाहिर है उसकी पसन्दगी इन्हीं विधाओं में केन्द्रित होगी। 



नयी पीढ़ी  को ऐसा लगता है कि पुरानी पीढ़ी के कुछ गीतकार उनकी रचनाओं को कमतर आंकते हैं (अपवादों को छोड़कर) और कई समर्थ गीतकार ऐसे भी हैं जो उभरते गीतकारों के बारे में न तो सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी करते हैं और न ही उनकी रचनाधर्मिता पर कलम चलाते हैं, आप क्या कहना चाहेंगे? 



उत्तर: देखिए, कला के क्षेत्र की स्पर्धा- स्पृहा तो जगजाहिर है। नई और पुरानी पेशी में रचनात्मक द्वन्द्व का रहना स्वाभाविक-सा है, क्योंकि विरासत में हमें एक पॉलिटिक्स मिली हुई है- वह है कौन अपना कौन पराया की। कहानी-कविता और उपन्यास आदि के क्षेत्र में ईर्ष्याएं और दुरभिसंधियॉ कम देखने को मिलती हैं, वहॉ तो आलोचक भी प्रोत्साहित करते हैं। यह दुर्भाग्य है कि गीत-नवगीत के क्षेत्र में आलोचक उस स्तर के हैं नहीं। जो नवगीतकार आलोचक बनते हैं वे पूर्वाग्रही ज्यादा होते हैं। इन सबके बावजूद, एक समर्थ युवा रचनाकार को हताश नही  होना चाहिये। देखिए, साहित्य के कथित  शिखर पर जो रचनाकार है, उनमें से कितनों को देखा गया है कि वे स्वयं विवादास्पद ह। इतना ही नहीं उन्हे 'साहित्य का माफिया' की डिग्री से भी नवाजा गया, लेकिन क्या कोई फर्क पड़ा? नहीं। इन्हीं के बीच डा० राम विलास शर्मा जैसी बेदाग हस्तियॉ रहीं। क्या कोई उनके आदर्शो पर चला ? नहीं ।



नवगीत के क्षेत्र में साधना तो है लेकिन उसको मूल्यांकित करने वाला कोई नही है। वहॉ तो वर्चस्व की जोर आजमाइश में बड़े-बड़ों के विरूद्ध षडयंत्र चल सकता है। उधर वरिष्ठों को मंच पर या कागज पर जब कुछ कहना होता है तो उन्हें चाटुकार याद आते हैं। इसके इतर वे श्रम और प्रयत्न क्यों नहीं करते कि कहॉ-कहॉ वास्तविक रचना है। एक समर्थ रचनाकार चाहे युवा हो या वरिष्ठ, वह मुखापेक्षी नही होता। संयम, धैर्य और दूरदर्शिता हो तो पीढ़ियों में बहुत कुछ सीखना-सिखाना चलता ही है। सोच यह होनी चाहिए कि साहित्य समुद्र में कोई कश्ती मिल जाये तो ठीक अन्यथा एक दिन रचनाकार को स्वयं कश्ती बन जाना होता है। गीत- बिरादरी में सबसे बड़ी कमी एकजुटता की है। इस बात को मैने बार बार कहा है । 



गीत-नवगीत को समर्पित संस्थान एवं पत्र-पत्रिकाएं कौन-सी हैं और उनका क्या योगदान रहा है? 

उत्तर: यह सब मुझसे क्यों पूछ रहे हैं। आप स्वयं एक नवगीतकार है। इंटरनेट पर वेबसाइट्स चलाते हैं। आपकी जानकारियॉ कुछ कम तो नहीं, फिर भी संस्थाओं-पत्रिकाओं का उल्लेख कर पाना तो मुश्किल है। देखने में आता है कि उन लघुपत्रिकाओं की संख्या भी कुछ कम नहीं जिनको गीतकवि स्वयं निकालते हैं, जैसे कहानीकार कहानी की पत्रिकाएं निकालते हैं। मध्य प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान में तो परम्परा सी है, वहॉ की सरकारें आर्थिक अनुदान और विज्ञापन आदि भी देती है। उत्तर प्रदेश में भी कभी-कभी किसी-किसी को कुछ मिल जाता है। पंजाब, कर्नाटक, और महाराष्ट्र और गुजरात से भी हिन्दी पत्रिकाएं निकलती है। मेरे संज्ञान में है कि सभी छोटी-बड़ी पत्रिकाएं नवगीत छापती हैं, अपवादों को छोड़कर। यह बात अलग है कि कुछ पत्रिकाएं कविता शीर्षक से नवगीत छापती है । 



क्या आप युवा गीतकारों/ आलोचकों के लिए संदेश देना चाहेंगे?

उत्तर: गीत के नए रचनाकारों को मेरा यही संदेश है कि वे गीत की प्राचीन और आधुनिक बारीकियों को आत्मसात करें। अपनी आंखिन देखी को और जग देखी को भी मंथन करके गीत में उतारें ही नहीं बल्कि उसको विदग्ध और व्यंजनापूर्ण बनाएं। युवा रचनाकार जो बड़ी-बड़ी डिग्रियॉ लेकर गीत क्षेत्र मे आ रहे हैं, वे गीत के इतिहास का भी अध्ययन करें और अपने भीतर एक बड़ा आलोचक पैदा करने का प्रयत्न करें। ऐसा आदर्श आलोचक जो गद्य कविता के आलोचको पर भारी पड़े। अब केवल गीत लिखने से काम नही चलने वाला। आलोचना भी एक रचना है। इस मर्म को भी गीतकारों को समझना होगा।   




 बातचीत की है :-

अवनीश सिंह चौहान 

सम्पादक: पूर्वाभास 



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1 टिप्पणी:

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


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