रघुविन्द्र यादव के नूतन दोहे - अपनी माटी Apni Maati

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गुरुवार, दिसंबर 29, 2011

रघुविन्द्र यादव के नूतन दोहे




होती हैं जिस देश में, नौकरियां नीलाम.
रिश्वत बिन कैसे वहां, होगा कोई काम.



बेशक मैं हर दिन मरा, जिन्दा रहे उसूल.
जीना बिना उसूल के, मुझको लगे फिजूल.



बहुत दिनों तक जी लिए, शीश झुका कर यार.
अब तो सच का साथ दो, बन जाओ खुद्दार.



कहीं उगे हैं कैक्टस, कांटे, कहीं बबूल.
दौर गिरावट का चला, मरने लगे उसूल



गन्दा कह मत छोडिये, राजनीति को मीत.
बिना लड़े होती नहीं, अच्छाई की जीत.



जनता के दुःख दर्द का, नहीं जिसे अहसास.
कैसे उस सरकार पर, लोग करें विश्वास ?



आनी जानी चीज है, सत्ता तो श्रीमान.
चोटी चढ़ते ही सदा, आती नई ढलान.


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

रघुविन्द्र यादव 
  • कृतियाँ- मौलिक- नागफनी के फूल  (दोहा संग्रह), कामयाबी की यात्रा.      सम्पादित- पर्यावरण परिचय, जीने की राह, शंखनाद, अभिनन्दन के स्वर.अन्य प्रकाशन- सैंकड़ों दोहे, फीचर, लेख, कविताएँ, लघुकथाएँ देशभर के पत्र-पत्रिकाओं/वेब पत्रिकाओं और संकलनो में प्रकाशित.
  • विशेष-आकाशवाणी के अनुबंधित फीचर लेखक.सम्मान- साहित्य, शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में उलेखनीय योगदान के लिए दर्जनों साहित्यिक, सामाजिक और शासकीय संस्थाओं द्वारा
  • सम्मानित/पुरस्कृत दोहा विधा के विकास में बहुमुखी एवं बहुआयामी योगदान के लिए अभिव्यक्ति साहित्यिक मंच द्वारा "दोहा रत्न" की उपाधि से अलंकृत. 
  • आजीविका-हरियाणा शिक्षा विभाग में व्यावसायिक प्राध्यापक
  • सम्प्रति-हरियाणा की प्रमुख साहित्यिक पत्रिका "बाबूजी का भारतमित्र" के संपादक.
9034343679

"प्रकृति-भवन"
नीरपुर, नारनौल (हरियाणा) 123001
9034343679


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