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''वे अनपढ़ हैं, unschooled हैं पर संस्कृति के point of view से बहुत cultured हैं। ''-हबीब तनवीर

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, दिसंबर 15, 2011 | गुरुवार, दिसंबर 15, 2011


हबीब तनवीर का यह साक्षात्कार 
उनके जीवन के अंतिम दिनों में 
आखिरी के साक्षात्कारों में से एक है. 
धर्मेन्द्रअभी तक के जीवन में आपने 85 बसंत देखें हैं और लगभग 50 साल सेप्रोफेशनल थियेटर कंपनी भी चला रहें हैं, तो थियेटर को कैरियर बनाकर आपने जोअपना पूरा जीवन इसे समर्पित कर दिया है, उसके बारे में आप अब क्या सोचते हैं?

हबीब साहब मैंने अपना पूरा जीवनथियेटर को समर्पित इसलिए किया है कि मुझे इसमें मजा आता है और मैं तो बहुत ही optimistic हूं थियेटर को लेकर। वो कायम हो गया है और कायम रहेगा।

धर्मेन्द्रअपने नाटकों में आपने जोलोकके नए मुहावरे की इबारत की है, उसकी प्रेरणा आपको कहां से मिली और इसके प्रयोग का आपका उद्देश्य क्या रहा है?

हबीब साहब – ‘लोककी प्रेरणा मुझे गांववालों के अभिनय, उनके खुलेपन, उनके गाने,उनके नाच को देखकर मिली और इसके चुनने का एक प्रयोजन तो यह रहा कि मैं शिक्षित नागरिक कलाकार के गाल पर एक थप्पड़ लगाऊं। मतलब यह है कि उनसे कहीं बेहतर गांव वाले हैं। वे अनपढ़ हैं, unschooled हैं पर संस्कृति के point of view से बहुत cultured हैं। unschooled हैं मगर educated हैं in the real sense of the world. दूसरी चीज़ ये कि हमारी जो tradition है वो टूट-टूट कर आगे बढ़रही है जो पिछली कई सदियों से टूट गई है। 19th century से revival हुआ तोFolk में एक continuity हुई है। एक लगातार विकसित होने की योग्यता थी औरमुझे उसमें एक universal language की तलाश थी जो मुझे मिल गई।

धर्मेन्द्रनया थियेटरके बैनर तले ग्रामीण छ्त्तीसगढ़ी कलाकारों के साथकभी-कभी शहरी कलाकारों ने भी मिलकर प्रस्तुतियां दी हैं तोलोक थियेटरकोकरते वक्त ग्रामीण और शहरी कलाकारों के बीच आपने कैसे सामंजस्य बैठाया?

हबीब साहबशुरुआती दिनों में हमें बहुत तकलीफ हुई थी लेकिन समय के साथसब बनता गया और अब नहीं होती।

धर्मेन्द्रअपनी इतनी लंबी रंग-यात्रा के दौरान आप पहले अभिनेता, फिरनिर्देशक और आखिर में नाटककार एवं रूपांतरकार के रूप में बेहद सक्रिय रहे,कौन सी भूमिका आपको ज्यादा चुनौतीपूर्ण लगी?

हबीब साहबभई ! मुझे acting का हमेशा से शौक रहा है लेकिन अब मैं अपनेनिर्देशन को ज्यादा महत्वपूर्ण मानता हूं।

धर्मेन्द्र आप रायपुर के रहने वाले हैं औरनाचा’, ‘करमा’, ‘ददरियाआदि कोकरीब से महसूस किया होगा आपने जबकि अभिनय का प्रशिक्षण आपने यूरोपीयदेशों से लिया है, तो आपकी संवेदना के ये जो दो आयाम हैं उनके बीच कैसे संतुलनबनाते हैं आप?

हबीब साहबबंबई मेंइप्टाके साथ मैं इनके करीब आया और आता गया।लेकिन यूरोप में चुंकि तमाम सुविधाएं थीं और मन थोड़ा लगता भी था लेकिन मैंने उस मोह का त्याग किया क्योंकि मैं अनुभव करता था कि एक भिन्न भाषा, संस्कृति और भिन्न दर्शक समूह के बीच मैं काम नहीं कर सकता और खुद को अभिव्यक्त भी नहीं कर पाता।

धर्मेन्द्रआपनेनया थियेटरके लिए छ्त्तीसगढ़ी कलाकारों को चुना, जबकि आपके नाटकों की मूल प्रवृति यथार्थवादी ही रही है। तो क्या आपको कभी इस बात का खतरा महसूस हुआ कि गांव-देहात से आए लोक-कलाकार शहरी मंच पर महज प्रतिरोपित दिखाई दें?

हबीब साहब नहीं, ऐसा नहीं है। पीटर ब्रुक ने इसका जवाब दे दिया है। उन्होंनेकहा है किनया थियेटरहर मुमकिन कोशिश करता है गांव वालों को गलत रास्तोंसे बचाने के लिए। यह इस हिसाब से कि उनके पास कितनी बड़ी पूंजी है लोकपरंपरा की, लेकिन यह अहसास दिलाने से ख्याल आता है। यह मेरा अनुभव औरobservation भी है कि जब उड़ीसा के गांवों की साड़ियों को कमला देवीचट्टोपाध्याय ने बढ़ावा दिया तो शहरी लड़कियां और औरते भी पहनने लगीं। औरजब शहरी पहनने लगीं तो गांव वालों ने उनकी नकल में अपनी चीज़ को फिर सेअपना लिया। मतलब उनको खुद ही अपनी कदर नहीं मालूम थी लेकिन जब देखाकि उसे फैशन में औरते पहन रहीं हैं उनकी बुनी हुई साड़ियां तो खुद भी पहननेलगीं। कहने का मतलब यह है कि देखकर ही अच्छी चीज़ों की चेतना आई औरअगर अच्छी चीज़ है तो उसकी कदर भी है। लेकिन आज कदर इतनी नष्ट कर दी गईहै, इतनी brain washing हो गई है, इतनी घृणा से देखा गया है गांव वालों को किवे भूले-भटके हैं कि कितनी कमाल की चीज़े हैं उनके पास में। लेकिन अब ढेर सारेNGO और उनके माध्यम से, जाने-अनजाने आपके और कमला देवी के माध्यम सेभी कदर बढ़ रही है। तो इसलिए ऐसा कुछ नहीं है लेकिन फिर भी अब दुनिया भरकी शक्तियां, forces खुले हैं, टेलीविजन के माध्यम से, मंडी के माध्यम से, communication centre से कोई नहीं बचा है। सब पर असर पड़ रहा है। तोइसमें एक आदमी अपनी कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। फिर भी हमनेजितना हो सका, किया। और ये ताकतें लगीं हुईं हैं नष्ट करने में हमारी परंपरा को,हमारे संस्कारों को। तो अब ये भले ही ज्यादा शक्तिशाली हों लेकिन मेरा ख्याल हैकि हम सब मिलकर एक जागृति पैदा करें, चेतना उजागर करें तो इसे रोका जासकता है।

धर्मेन्द्रइप्टायाजन नाट्य-मंचजैसे संगठनों का असर धूमिल पड़ने के बादआजहिंदी थियेटरएक सशक्त सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में कहीं दिखाई नहीं देरहा है, तो ऐसे में आपने अपने लिए कौन सी भूमिका चुनी है?

हबीब साहब मैंनेवाम पक्षकी भूमिका चुनी है, ‘व्यवस्था विरोधीभूमिका मेंमैं यकीन करता हूं। देखिए जबइप्टाशुरू हुआ तो केवल CPI थी, यह उनका शुरूकराया हुआ था। लेकिन बाद में CPI के दुनिया भर के तमाम टुकड़े हो गए, तो आपफिर ये क्यों उम्मीद करते हैं किइप्टा’ compact रहेगा। तो मतलब कहने का यहहै कि बहुत ना सही मगर वह भूमिका कुछ तोनया थियेटरहै, विवेचना कर रहाहै, अभिलाप कर रहा है। बहुत से, कानपुर, पटना, छ्त्तीसगढ़। इसमें शोलापुर,कोल्हापुर, ये अलग-अलग नाम हैं जो कर रहें हैं और प्रगतिशील थियेटर भी हैं। तोउस आंदोलन सेनास्टैल्जियाको लेकर कुछ नहीं कर पाओगे। वो ज़माना जो बीतगया सो बीत गया। अब आज क्या हो रहा है यह देखिए, आइन्दा उसी में क्यासंभावना है, वो देखिए। थोडा सब्र कीजिए और कोशिश कर देखिए कि ज्यादातरअच्छे थियेटर निकल रहें हैं, ‘मानवतापरक थियेटर’, ‘प्रगतिशील थियेटर’, ‘जेनुईनथियेटर

धर्मेन्द्र1982 केएडिनबरा नाट्य-उत्सवमें जबचरनदास चोरकोफ्रिंजप्रथम पुरस्कारमिला और इस तरह से आपने छ्त्तीसगढ़ी लोक-कलाकारों कोवैश्विक मान्यता दिलाई तो कैसा महसूस किया आपने? उस वक्त की कोई बेहदरोचक बात जो आप हमसे शेयर करना चाहते हों।

हबीब साहब बहुत अच्छा लगा मुझे।एडिनबरामेंस्काट्समैनन्यूज़ पेपरवालों ने जब announce किया तो उन्होंने मुझसे पूछा किये क्या हुआ? हम तोएक लफ़्ज भी नहीं समझ रहे थे फिर भी हमने सिर्फ प्रथम पुरस्कार दिया बल्किअब तक की वो परंपरा भी तोड़ दिया जिसमें हम आखिर में पुरस्कारों की घोषणाकरते थे।चरनदास चोरको दूसरे दिन ही हमने प्रथम पुरस्कार की घोषणा करदी।माना कि बहुत सी entries अभी बाकी थीं, 52 International entries मेंजबचरनदास चोरकी जीत हुई तो अभी सब खत्म नहीं हुए थे। लेकिन जब सबखत्म हो गए तब भीचरनदास चोरको कोई आंच नहीं आई। प्रथम award उसीको मिला और उन्होंने फिर मुझसे पूछा कि यह क्या था? तो मैंने जवाब दिया किमैंलाईटिंग बूथ में था और यह देख रहा था कि ये कलाकार कुछ इस तरह काperformance कर रहे हैं कि जैसे अपने चौपाल में कर रहे हों और यह कह रहे हैंकिहम इंसान की एक बोली बोल रहे हैं, आप इंसान हैं, हमारी बोली समझतेरहेंगे।चुनांचे ये चीज़ थी जो थियेटर में एक मैजिक की तरह होती है जो आपकेसिर चढके बोलती है। आपने देखा उनके गाने में, नाच में, संवाद में, कुछ थे एकvibration जिसे आपने पकड़ लिया था, जिनमें सब गोरे थे। हिंदुस्तानी बहुत हीकम थे मुश्किल से गिनतियों में, उंगलियों में गिन ले आप, जबकि हाल छः सौ लोगोंका था।

धर्मेन्द्र – ‘नया थियेटरके वे शुरुआती कलाकार जिन्होंने आपके साथ अनेकअविस्मरणीय प्रस्तुतियां दी थी, आज उनमें से ज्यादातर नहीं हैं और आप भी उतनेसक्रिय नहीं रहे हैं तोनया थियेटरके भविष्य के बारे में आप क्या सोचते हैं?

हबीब साहब आज ज्यादातर उनमें से मर गए हैं लेकिन अगर टेलीविजन उनकापीछा करना छोड़ दे तो शायद वह चल जाएगा, जो उसे नष्ट करने पर आमादा है।लेकिन फिर भी कुछ लोग हैं जो कर रहे हैं genuine. छ्त्तीसगढ़ी आज-कल, program के नाम पर जोनाचारात भर होता था, अब दो-ढाई घंटे का हीकार्यक्रम कर लेते हैं जिसका नज़रिया भी डिस्को हो गया है। इसी तरह गुजरात कागरबाऔर महराष्ट्र कालावणीभी प्रभावित हो रहा है। इस तरह से जो ये प्रथाशुरू हो गई है, वह बहुत ही खतरनाक है।

धर्मेन्द्रस्पिक मैकेके साथ कैसे और किन परिस्थितियों में जुड़े आप?

हबीब साहबस्पिक मैकेअच्छा काम कर रहा है। वे tradition को सवारने कीकोशिश कर रहें हैं तो उनका मैं बहुत शुक्रगुज़ार हूं। बड़े-बड़े उस्तादों को उन्होंनेcatch किया है। भीनसेन जोशी जैसे वो तमाम उस्ताद उसमें शामिल हैं। मैं भीशामिल हूं, बिस्मिल्ला खां भी थे। तो ये बच्चों में, स्कूलों में, कालेजों में एक नई awareness पैदा कर रहे हैं कि आपके पास जो परंपरा है वो काबिले-कद्र है। ऐसीचीज़ नहीं है कि यह कल की थी, कल की ही रहेगी। आज के काम की नहीं है, ऐसीबात नहीं है। और वो हमेशा काम आएगी और उसी रिवायत से हम नवीनता पैदाकर सकते हैं। रिवायत को दबाना, नवीनता के पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है।रिवायतों के होते हुए उसके विरोध में सही, आप नवीनता की उम्मीद कर सकते हैं।

धर्मेन्द्रआपनेफिल्मऔरथियेटर’, दोनों में अभिनय किया है और अन्यभूमिकाओं में भी बेहद सक्रिय रहें हैं, तो कौन सा माध्यम आपके लिए ज्यादाचुनौतीपूर्ण रहा है?

हबीब साहब मुझे तो थियेटर से लगाव ज्यादा रहा है क्योंकि इसमें बहुत मजाआता है। फिल्मों में इसलिए जाता हूं कि बुला लिया जाता हूं, पैसे मिल जाते हैं जोथियेटर में नहीं है। लेकिन मैं इसे छोड़कर कभी नहीं जाता हूं। यह बड़ी बात है।लेकिन मैं उसे इंकार नहीं करता। वो अलग medium है, उसकी कूबत अलग है।

धर्मेन्द्रआपके काम की लोगों ने अलग-अलग तरह से व्याख्या की है। किसी ने उसेपारंपरिककहा है, किसी नेप्रयोगधर्मीतो किसी ने उसेलोक-अभिव्यक्तिके निकट पाया है। स्वंय आप क्या सोचते हैं इस बारे में?

हबीब साहब मेरे ख्याल से वो अपनी-अपनी सोच है। मुझे सब स्वीकार है जोकुछ लोग कहते हैं। अपनी नज़र मेंलोक-थियेटरके माध्यम से जोमाडर्न थियेटरमैंने बनाया है, वोलोक-थियेटरनहीं है।लोक-थियेटरका माध्यम जरूरतः उसकेअंदर से निकला है लेकिन वो मेरी कोशिश से नहीं। आप जो पहचाने जाते हैं, तो मैंउसकोमाडर्न-थियेटरकहूंगा – ‘आधुनिक-थियेटर ऐसे कई थियेटर हैं जोअलग-अलग अपनी भूमिका अदा कर रहें हैंमाडर्न थियेटरसे निकलकर अलगcategory में। इनमें रतन थियम हैं, पाणिक्कर हैं, जो अपने-अपने इलाकाई रास्तोंसे, अलग-अलग रास्तों से अपनी मंज़िलों में पहुंच रहे हैं।

धर्मेन्द्रअभिनय को लेकर जो अनेक संस्थाएं सक्रिय हैं, मसलनराष्ट्रीय नाट्यविद्यालययाकला विद्यालय’, उन्होंने अपने पाठ्यक्रमों में हमारी लोक याशास्त्रीय-शैलियों को जगह नहीं दी है। इसीलिए यहां से प्रशिक्षण पाने वालेकलाकार ब्रेष्ट या स्तानिस्लाव्स्की की शैलियों से ज्यादे परिचित होते हैं, हमारीअपनी लोक-शैलियों से उनकी अंतरंगता कम बन पाती है। क्या कहेंगे आप इस बारेमें?

हबीब साहब ये बहुत अफ़सोसनाक बात है। मुझे तो लगता है कि किसी भी मुल्कके शास्त्रीय और लोक का आपस में गहरा रिश्ता होता है और वही बेस भी होनाचाहिए। ब्रेष्ट का वही बेस था, शेक्सपीयर का वही बेस था, खुद स्तानिस्लाव्स्की काभी वही बेस था। उसी प्रक्रिया में एक नई चिंगारी जो निकली, वो आधुनिक बनगई, ब्रेष्ट के यहां भी, स्तानिस्लाव्स्की के और शेक्सपीयर के यहां भी।

धर्मेन्द्र आज के रंगमंचीय परिदृश्य के बारे में क्या सोचते हैं आप?

हबीब साहबअच्छा है, बहुत अच्छा है क्योंकि ऐसा लगा कि आते हुए भीबहुत ही अच्छा है। क्योंकि बहुत से इलाकों में अच्छे थियेटर उभरे हैं।

धर्मेन्द्रनई पीढ़ी से थियेटर के बारे में क्या कहना चाहेंगे आप?

हबीब साहबबस, लगे रहो मुन्ना भाई, करते रहो और अपनी ठोकरों से सीखतेरहो। यही मेरा पैगाम है नई पीढ़ी को। मज़ा ना आए तो मत करो। if u enjoy,उसमें अगर रूचि है तो आपको खुद--खुद जो दर्शक है, वह कसौटी है, वहencourage या discourage करेगी। मतलब vibration मिल जाएगा आपको।अगर गलत vibration नहीं है तो बंद कर दीजिए। इंजीनियर बन जाइए, कंप्यूटरसाइंस में चले जाइए, बिजनेस सवांरिए। थियेटर का पीछा छोड़ दीजिए। लेकिनअगर थियेटर में रूचि है तो उसमें कितने ही दुख भोगिए, मजा तो आना ही है, मजातो आता ही है। तो अगर पैशन है तो आप दुख भी भोग लेंगे।

धर्मेन्द्र आपने फोन पर भी इतना समय मुझे दिया जिसका मैं बहुत आभारीरहूंगा। बहुत-बहुत धन्यवाद सर
योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-युवा शोधार्थी धर्मेन्द्र 
ये बातचीत इस लिंक से कट-कोपी-पेस्ट किया है.
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