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बदलते दौर में Volunteerism के मायने :डॉ. किरण सेठ की जुबानी

Written By ''अपनी माटी'' वेबपत्रिका सम्पादन मंडल on शनिवार, दिसंबर 17, 2011 | शनिवार, दिसंबर 17, 2011



आज के दौर में, सबसे मेधावी लोग सर्वाधिक वेतन देने वाली नौकरियां पाना चाहते हैं और उनमें से कइयों को ऐसी नौकरियां मिल भी जाती हैं। वे बहुत मेहनत करते हैं, शायद सुबह के 9 बजे से लेकर रात के 10 बजे तक, तथा बड़ी-बड़ी कंपनियां और संगठन बना लेते हैं। परन्तु उनका बुनियादी उद्देश्य होता है, अपने लिए भौतिक जगत में ज्यादा से ज्यादा संग्रह करते चले जाना। यह एक सौदा है। यदि मैं कोई काम करता हूँ तो मुझे तुरंत ही उसका प्रतिफल मिलना चाहिए। बगैर किसी अपेक्षा के कुछ करने की सोच अब बासी मानी जाती है। यहाँ तक कि रोटरी क्लब व लायंस क्लब सरीखे लोकोपकारी संगठनों के सदस्यों के मुख्य उद्देश्य भी कुछ और ही होते हैं। गैर सरकारी संगठनों के कार्यालय और उनके वेतन कुछ बहुत बड़ी-बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों को टक्कर देते मालूम पड़ते हैं।

स्वैच्छिक सेवा का चलन क्यों खत्म हो रहा है? जाहिर है कि लोगों में यह भावना गहराती जा रही है कि स्वैच्छिक सेवा में उन्हें उस तरह से प्रतिफल नहीं मिलता जिस तरह किसी वैतनिक कार्य से मिलता है; और कुछ हद तक वे सही भी हैं। यदि कोई होशियार व्यक्ति उतना ही वक्त कोई तनख्वाह पाने के लिए बिताता है, तो उससे वह एक सुंदर कार खरीद सकता है या बहामा द्वीपों में छुट्टी बिताने जा सकता है। सच्चे अर्थों वाली किसी स्वैच्छिक सेवा में इस तरह के कोई लाभ नहीं होते। लोगों की ऐसी सोच इसलिए है क्योंकि वे अमूर्त जगत को अनुभव करना भूल गए हैं, और इसीलिए अकसर उसके अस्तित्व पर ही संदेह किया जाता है। हमारे यहाँ निष्काम कर्म का सिद्धांत है, जो कि न्यूटन के गति के तीसरे नियम जैसा है, और यह कहता है कि हर एक क्रिया की प्रतिक्रिया का स्रोत, उस क्रिया के होने के स्थान से भिन्न कोई अन्य स्थान होता है। यह प्रतिक्रिया विलंब से भी आती है और बहुगुणित भी होती है, इसके अलावा यदि कोई उसकी अपेक्षा करने लगे तो वह बंद भी हो जाती है। मौजूदा परिदृश्य गति के उसी तीसरे नियम पर आधारित है जो कहता है कि प्रत्येक क्रिया की समान और विपरीत प्रतिक्रिया होती है।

बहुत थोड़े से लोगों के पास सच्ची स्वैच्छिक सेवा के अमूर्त फलों को अनुभव करने का समय, विश्वास और धैर्य होता है। अनपेक्षा की सच्ची भावना के साथ काम करना भी बहुत मुश्किल होता है। हमारा मन इतना तेज़ होता है कि कोई भी कार्य करने से पहले वह पल भर में उसके बदले प्राप्त हो सकने वाले लाभ का गुणा-भाग कर लेता है। पर सच्चे लाभ तभी मिल सकते हैं जब मन की इस गतिविधि पर काबू पाया जा सके। अमूर्त प्रतिफल हमारे सामने तभी आता है जब हम इस बेहद मुश्किल काम को करने में सफल हो जाते हैं। और इस काम के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाली अवस्था का यदि कोई मनुष्य कुछ देर के लिए ही अनुभव कर सके, तो फिर वह पैसा, सत्ता, सेशेल्स की छुट्टियां, बीएमडब्ल्यू जैसी तमाम चीज़ें भूल जाता है।

आखिर में, समस्त खुशियों और दुःखों का संबंध हमारे मन से ही होता है और यदि मन अमूर्त जगत में दाखिल होने में सफल हो जाए, जिसे पाने में सच्ची स्वैच्छिक सेवा उसकी मदद करेगी, तो सभी मूर्त चीज़ों की महत्ता काफी हद तक घट जाती है।आज दुनिया में कई लोग स्वैच्छिक सेवा कार्य में संलग्न हैं। पर इसकी मुख्य वजह है ऐसा करने पर उन्हें होने वाला सुखद एहसास’’। यह एक अनूठा अनुभव है जिसके बारे में ऐसे ज्यादातर लोगों को पता होता है और यही उन्हें इस तरह का कार्य करने की प्रेरणा देता है। हालांकि यह भी एक सौदा ही है, पर कहीं ज्यादा गहरे किस्म का, और यदि व्यक्ति तात्कालिक रूप से होने वाले सुखद एहसास भर से ही संतुष्ट हो जाता है तो इसके भीतर मौजूद सारी संभावनाओं को पूरी तरह अनुभव नहीं किया जा सकता। एक स्तर पर, सबसे ऊंची श्रेणी की स्वैच्छिक सेवा में संलग्न व्यक्ति को दर्द का थोड़ा एहसास होना तो जरूरी है।

यदि कोई व्यक्ति बिना किसी अपेक्षा के खुद को किसी कार्य के लिए सच्चे अर्थों में समर्पित कर सके (जो कि बेहद कठिन काम है), तो उसे ऐसी अमूर्त पूंजी हासिल हो सकती है जो अवर्णनीय है। सच्ची स्वैच्छिक सेवा हमें अपने अंतर के जगत से जोड़ती है। ऐसा कार्य योग’’ बन जाता है जिससे हमें शांति और धीरज की प्राप्ति होती है। नतीजतन हमारी आकांक्षाएं घट जाती हैं और ऐसा होने पर हमारे लालच में कमी आ जाती है। इसलिए ऐसी अवस्था में होने वाले व्यक्ति को भ्रष्ट होने की कोई ज़रूरत नहीं होती जिसके चलते एक ऐसे समाज का निर्माण हो सकता है जहाँ जन लोकपाल बिल सरीखे सशक्त भ्रष्टाचार निरोधी उपायों की कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी। प्रत्येक मनुष्य के लिए यह बहुत ज़रूरी है कि वह अपनी पूंजी और समय का कम से कम 10% अंश किसी सच्चे स्वैच्छिक सेवा कार्य में लगाए।

इस आलेख को मूलत: अंग्रेजी से होशंगाबाद के प्रोफेशनल अनुवादक भरत त्रिपाठी ने हिंदी अनुवाद कर उपलब्ध कराया है.
योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
मूल आलेख स्पिक मैके नामक सांस्कृतिक 
आन्दोलन के प्रणेता डॉ. किरण सेठ ने लिखा है.

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