कविता समय-2:और फेसबुक पर बयानते प्रेमचंद गांधी - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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कविता समय-2:और फेसबुक पर बयानते प्रेमचंद गांधी


'भाषा का भूगोल'  नामक रचना जल्द आपके बीच आने वाली है इस बात के लिए जाने कितने पाठक मित्र इंतज़ार कर रहे हैं. आज उसी रचना के  रचनाकार प्रेमचंद गांधी की कुछ फेसबुक पोस्ट यहाँ री-पोस्ट कर रहे हैं जिनका सन्दर्भ फिर से कविता के लिए विशुद्ध रूप से पिछले साल चले आयोजन से जुदा है.बकौल प्रेमचंद गांधी  :बड़े नामी-गिरामी और बहुत अच्छे कवि शहर में आये हुए हैं कि बहुत विचित्र लग रहा है इन सबके बीच... खैर, 'भाषा का भूगोल' का एक अंश इन सब कवियों के सम्मान में प्रस्तुत है:-

तर्कहीन कहानियों से छाये हुए थे कहानीकार
विवेक सिर्फ नामवाचक संज्ञा थी और
दृष्टि चश्मे से आती थी
सर्व-नकारवादी और निषेधवादी दौर था वह
बिना प्रेम किये लोग
प्रेम कहानियां लिखते थे और
अदावत को प्रेम कहते थे
जिन्हें एक सरल वाक्य लिखना नहीं आता था
वे कविताएं लिखने लगे थे
लोग शब्दों को ऐसे खर्च करते थे
जैसे भूखी भैंस भकोस लेती है चारा

निर्बुद्धि काल था लेखन का वह
मुक्त और निरपेक्ष चिंतन का यही होना था हश्र
साहित्य, समाज और दुनिया को
डूब जाना था अराजकता और विसर्जन में
हर तरफ हरसूद था...

कविता समय-2 बहुत सार्थक और सफल रहा। इतने सारे कवि मित्रों से एक साथ मिलना बेहद आनंददायक अनुभव रहा। इस बार पिछली बार की तुलना में बातचीत अधिक विषयकेंद्रित रही, लेकिन उत्तेजक बहस हो सकी। शायद इसलिए कि हिंदी कविता का 'अन्य' पक्ष अनुपस्थित रहा। ग्वालियर से जयपुर और अगले बरस मुंबई यानी लगातार मग़रिब की ओर यात्रा करता 'कविता समय' बकौल अशोक कुमार पांडे दो चक्रों तक इसी क्रम में चलेगा और तीसरे चक्र में छोटे शहरों की ओर रुख करेगा। यह सार्थक पहल हिंदी कविता का कुछ तो भला करेगी ही, क्योंकि यह कवियों का अपना आयोजन है और तीन संयोजकों की त्रिवेणी, जिसमें तीनों ही योद्धा हैं, बहुत कुछ कर दिखाने का हौंसला रखते हैं। इस बार एक बात मुझे बहुत खटकी कि अल्पसंख्यक समुदाय का एक भी कवि शिरकत नहीं कर सका। यह हिंदी के लिए बहुत गंभीर चिंता की बात है।

कविता समय-2 में भी पहले की तरह यह सवाल उठा कि आज की कविता में लय है कि नहीं। बाद में अनौपचारिक बातचीत में अशोक कुमार पांडे, कुमार अनुपम, प्रांजल धर, अनुज लुगुन आदि कवि मित्रों ने स्वीकार किया कि सबने आरंभ में गीत, ग़ज़ल और छंद में हाथ आजमाया है। अशोक कुमार पांडे और कुमार अनुपम ने तो बाकायदा अपने गीतों के टुकड़े सुनाए। मुझे भी याद आया कि कैसे 11वीं कक्षा के दिनों में मिर्जा ग़ालिब को पढ़ने के बाद 300 पेज की एक कॉपी ग़ज़लों से भर दी थी। कई भजन भी लिखे थे और प्रेमगीत भी। इप्टा के नाटकों में और अपने दो नाटकों में भी गीत लिखे हैं। लेकिन अपनी बात को प्रभावी ढंग से कहने के लिए अब हमें छंद का बंधन उचित नहीं लगता है, इसलिए मेरे जैसे अधिकांश कवि छंद छोड़ चुके हैं और नई कविता लिख रहे हैं। इसलिये बहुत से छंदवादी मित्रों का यह आरोप कि नई कविता वालों को छंद नहीं आता, मुझे तो ग़लत लगता है। कविता में महत्वपूर्ण बात अब यह है कि वो जिस बात को कहना चाह रही है उसे समग्रता में कह पा रही है कि नहीं।


मेरा तो यह सुस्पष्ट मानना है कि किसी भी कला को जब शास्त्रीय बना दिया जाता है तो वह बंधनों में बंध जाती है और एक खास किस् का कुलीन समुदाय उस पर अपना अधिकार समझने लगता है। वही तय करता है कि उस कला में क्या और कैसे, किन लोगों के द्वारा होना या किया जाना चाहिए। रामकुमार सिंह की बात बहुत अच्छी  है, लेकिन महाकाव्यों के बारे में जितना मैंने जाना पढा है, उसके अनुसार कह सकता हूं कि वहां छंद का बंधन बहुत कुछ तोड़ा गया है। संस्कृत नाटकों में, जहां पूरी तरह छंद आदि का ध्यान रखा जाता था, मृच्छकटिकम या कि उत्तररामचरितम, ठीक से याद नहीं रहा, उसमें तो पूरे एक पृष्ठ का वाक्य है, उसे किस छंद में रखेंगे... कविता में छंद का आग्रह वैसा ही है जैसे पाक कला में निष्णात व्यक्ति के हाथ से ही भोजन ग्रहण करना, आईटीआई पास कारीगर से मकान, दुकान बनवाना, बिजली, पानी आदि के काम करवाना। ...मुझे जलेबी बनाना आता है तो इसका मतलब नहीं कि मैं हमेशा जलेबी बनाता रहूं या कि मेरी योग्यता जलेबी की है तो मुझे गुलकंद नहीं बनाना चाहिए।



योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


प्रेमचंद गांधी'कुरजां' पत्रिका के सम्पादक
लेखक और कवि
जयपुर,राजस्थान

09829190626
prempoet@gmail.com
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