आयोजन रपट:मैं सुबह का गीत हूँ... - अपनी माटी

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आयोजन रपट:मैं सुबह का गीत हूँ...


’वनमाली’ परिसर में गूंजा भारतीजी का काव्य संगीत 

भेपाल। 
’नए-नए विहान में/

असीम आसमान में/

मैं उदय का गीत हूँ /

मैं विजय का गीत हूँ /

मैं सुबह का गीत हूँ...’ 



जीवन की नई उमंग-तरंग और उम्मीदों का पैग़ाम देती इन काव्य पंक्तियों के साथ प्रख्यात कवि,नाटककार और पत्रकार डॉ. धर्मवीर भारती के रचना संसार को वनमाली सृजन पीठ में आत्मीयतापूर्वक याद किया गया। आधुनिक हिन्दी नाट्य् साहित्य की क्लासिक रचना ’अंधा-युग’ के यशस्वी लेखक स्व. भारती के छियासीवें जन्मदिन (25 दिसंबर) के निमित्त आयोजित ’रचना-स्मृति’ प्रसंग में ख़ासतौर पर राजधानी के युवा सृजनधर्मियों ने शिरकत की। जहाँ एक ओर भारतीजी की कालजयी कृति ’कनुप्रिया’ को युवा संगीतकार संजय द्विवेदी और नीतेश मांगरोले ने सुमधुर कंठ से भावभीनी अभिव्यक्ति प्रदान की वहीं कला समीक्षक विनय उपाध्याय, रंगकर्मी सौरभ अनंत, एकता गोस्वामी, सोनाली भारद्वाज, नीरज कुन्देर तथा कवि मोहन सगोरिया, बसंत सकरगाए और हेमंत देवलेकर ने भारतीजी की विविधवर्णी कविताओं का पाठ किया।


कार्यक्रम के पूर्वरंग की शुरुआत करते हुए विनय उपाध्याय ने धर्मवीर भारती के बहुआयामी रचना संसार पर संक्षेप में प्रकाश डाला। उन्होंने भारतीजी का आशावादी गीत ’नए-नए विहान में...’ और संघर्षशील मनुष्य की जिजीविषा भरी कविता ’चल रहा मनुष्य है...’ का वाचन किया। कवि वसंत सकरगाए ने भारतीजी द्वारा कवि गुरू रवींद्रनाथ ठाकुर के जन्मशती वर्ष पर लिखी गई कविता ’कभी नहीं थी कोई नौका सोने की...’ सुनाई। युवा रंगकर्मी सौरभ अनंत ने ’प्रार्थना की कड़ी’ और ’उत्तर नहीं हूँ’ का गंभीर स्वर में पाठ किया। युवा रंगकर्मी एकता गोस्वामी ने भारतीजी की बहुचर्चित कविता ’सपना अभी भी’ की भावपूर्ण पाठ प्रस्तुति की। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा नई दिल्ली में अध्ययनरत शहर की एक और युवा रंगकर्मी सोनाली भारद्वाज ने ’तुम्हारे चरण’ कविता का भावपक्ष निभाते हुए वाचन किया। कवि मोहन सगोरिया ने ’साबुत आइने’ और हेमंत देवलेकर ने ’फागुन की शाम’ तथा ’आद्यंत’ कविताओं को स्वर-अभिनय द्वारा प्रस्तुत किया। सीधी से पधारे रंगकर्मी नीरज कुंदेर ने भारत की गुलाम मानसिकता पर कटाक्ष करती कविता ’गुलाब मत यहाँ बिखर’ का पाठ किया।


रचना स्मृति प्रसंग के इस पूर्ववरंग के पश्चात् संगीत सभा हुई। अपने पूर्वज रचनाकार के प्रति आदर और श्रद्धा से गमकते इस आयोजन में भारतीजी की लंबी कविता ’कनुप्रिया’ की तीन रचनाओं की संगीतमय प्रस्तुति शब्द और स्वर का अनोखा रोमांच समेट लाई। भोपाल के उदीयमान संगीतकार संजय द्विवेदी ने प्रेम, स्वप्न, संघर्ष और उम्मीद के बीच कृष्ण और राधा के भावनात्मक आरोह-अवरोह को मर्मस्पर्शी धुनों के साथ मुखर अभिव्यक्ति प्रदान की। ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों भारत भवन (भोपाल) में मंचित हुए ’कनुप्रिया’ के नाट्य् प्रयोग को संजय द्विवेदी ने ही रंग संगीत से सजाया-सँवारा था। सुमधुर गायन के साथ हारमोनियम की कुशल संगत भी स्वयं संजय ने की। तबले पर बखूबी साथ निभा रहे थे युवा संगीत साधक नितेश मांगरोले। इस अवसर पर अन्य साहित्यप्रेमी जन भी उपस्थित थे। क्रिसमस की यह शाम भारतीजी की कविताओं से गुज़रते हुए अविस्मरणीय बन गई।

वनमाली सृजन पीठ द्वारा जारी

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

विनय उपाध्याय
('कला समय' जैसी गहरी जड़ों वाली कलावादी पत्रिका के साथ ही हालिया प्रकाशन से पाठकों के बीच सार्थक संवाद करती हुई रंगमंच की पड़ताल करती पत्रिका ' रंग संवाद' के सम्पादक हैं.भोपाल में रहते हुए देशभर में कला समीक्षक और जानकार उदघोषक के रूप में जाने जाते हैं.)

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