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‘जंगीराम की हवेली’:नाटक बिल्कुल समसामयिक लगा

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, जनवरी 10, 2012 | मंगलवार, जनवरी 10, 2012

पटना 
पटना में हिरावल द्वारा जंगीराम की हवेली का मंचन

एक बड़ी-सी हवेली है, जिसमें कई कमरे हैं, जिसका मालिक मर जाता है, तो जनता उसकी वारिस मान ली जाती है। उसके बाद चुनावों के जरिए मुखिया का चुनाव होता है। लेकिन इसके बावजूद जनता की जिंदगी में  कोई बदलाव नहीं आता, उनकी बुनियादी समस्याएं पहले जैसी ही बनी रहती हैं। अभाव, बेरोजगारी, महंगाई, बीमारी, भ्रष्टाचार उनकी जिंदगी का हिस्सा बने रहते हैं, विरोध करने या हक के लिए आवाज उठाने पर हमेशा मुखिया और उनके अमले कानून और संविधान का उनके खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं। लोग परेशान हैं और मुखिया वर्ग मजे से कुंभकर्णी नींद में डूबे डूबा रहता है। जब असंतोष बढ़ता है, तो बीमारी की वजह की तलाश होती है। आखिर में बीमारी की जड़ में चूहे मिलते हैं। 

सूत्रधार एक चूहे को टांगे हुए मंच पर आता है और बोलता है- 
इनके बिल हवेली के फर्श में हैं। 
लोग बोलते हैं- हम हवेली के फर्श को खोद कर फेंक देंगे।
सूत्रधार- इनके बील हवेली की छत में है।
लोग- हम इस हवेली की छत को तोड़ देंगे।
सूत्रधार-इनके बील हवेली की दीवारों में हैं।
लोग- हम ये दीवारें ढाह देंगे। 

लोगों के इस तेवर को देखकर मुखिया वर्ग उस हवेली की प्राचीनता, उसकी महान सभ्यता संस्कृति का हवाला देता है, उसकी एक-एक ईंट के साथ विभिन्न धर्मा और महापुरुषों का संबंध जोड़ता है। मगर लोगों का सवाल है- क्या इन ईंटों को लेकर चाटें?सूत्रधार लोगों को ललकारता है- भुरती हुई दीवारों को ढाह दो। लोग इसे दुहराते हुए हवेली को ढाहने को आगे बढ़ते हैं। मुखिया चालाकी से सवाल उछालता है- ढाह दोगे तो रहोगे कहां? लोगों का कहना है- जो हाथ विध्वंस कर सकते हैं वे नया निर्माण भी कर सकते हैं। और आखिर में हंसिया, हथौड़ा और दूसरे पंरपरागत श्रम के औजारों के साथ लोग मुखिया को घेर लेते हैं। पृष्ठभूमि (साइक्लारामा) में मौजूद लाल रंग इसे स्पष्ट राजनीतिक अर्थ प्रदान कर देता है। 

यह है प्रख्यात जन नाट्यकर्मी गुरशरण सिंह का मशहूर नाटक ‘जंगीराम की हवेली’, 9 जनवरी को जिसका मंचन जसम की गीत-नाट्य इकाई ‘हिरावल’ ने कालिदास रंगालय, पटना में किया। जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा, प्रेरणा की ओर से रंगकर्मी सफदर हाशमी की स्मृति में हो रहे आयोजन में इसी नाटक से मंचीय प्रस्तुति की शुरुआत हुई। भ्रष्टाचार के खिलाफ सांस्कृतिक प्रतिरोध इस आयोजन का थीम है। ‘जंगीराम की हवेली’ इस लिहाज से काफी मौजूं नाटक है। 

गुरशरण सिंह द्वारा लिखे गए इस नाटक में हवेली हमारे देश का प्रतीक लगा और इस हवेली के तीन रंग देश के तिरंगे ध्वज का अहसास करा रहे थे, चूहे भी प्रतीक हैं तंत्र पर हावी उस भ्रष्ट वर्ग का, जो अपने स्वार्थ में इसको लगातार कमजोर कर रहे हैं, जो मुखिया है वे विभिन्न शासकवर्गीय पार्टियों के प्रतीक हैं। राम कुमार द्वारा निर्देशित इस नाटक में मुखिया वर्ग की भूमिका निभा रहे लोग अपने-अपने माथे पर अलग-अलग रंगों के साफे बांधे हुए थे, यह भी नाटक को प्रासंगिक बना रहा था। दरअसल नाटक के प्रतीक तो इसे प्रासंगिक बनाते ही हैं, इसमें निरंतर आम आदमी के जीवन के जो यथार्थपरक प्रसंग आते रहते हैं, वे भी गुजरे वक्त के नहीं लगते। नाटक बिल्कुल समसामयिक लगा। भ्रष्टाचार और जनलोकपाल का संदर्भ भी इससे सहजता से जुड़ गया। गुरशरण सिंह जन संस्कृति मंच के संस्थापक अध्यक्ष थे। जसम, बिहार के सचिव रंगकर्मी संतोष झा ने नाटक के मंचन के बाद कहा कि हिरावल की यह प्रस्तुति उनके प्रति हमारी श्रद्धांजलि है।

नाटक की प्रस्तुति काफी कसी हुई थी।दृश्यों का संयोजन और उनकी संबद्धता कमाल की थी। दर्शक शुरू से अंत तक नाटक से बंधे रहे। अचानक जब नाटक समाप्त हुआ तब बगल में बैठे कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार बरबस बोल पड़े- ‘या नाटक समाप्त हो गया!’ जाहिर था 35 मिनट की इस चुस्त-दुरुस्त और तेज गति की प्रस्तुति से दर्शकों का जी नहीं भरा। वे चाहते थे कि नाटक अभी और जारी रहता। इसकी एक वजह इस नाटक का थीम भी है, जहां खुद दर्शक ही मानो मंच के बीचो बीच यानी जंगीराम की हवेली में हैं, जहां मुखिया का खेल लंबे समय से चल रहा है, बेशक जिसका अंत वे चाहते हैं। स्थानीय भाषाओं का इस्तेमाल, जीवन के परिचित और सहज नाटकीय संदर्भ, आमफहम बहसें, व्यंग्य और प्रतिक्रियाएं तो इस नाटक को प्रभावशाली बनाने में मददगार रही हीं, अभिनेताओं के शानदार अभिनय और मंच परिकल्पना ने भी नाटक को असरदार बनाया। एक खास बात यह भी थी कि विक्रांत चैहान, मुरारी सिंह, आशुतोष सिंह राजपूत, गोपाल पांडेय, संजय कुमार, सद्दाम और संजीव रंगकर्म की दुनिया में बिल्कुल नए हैं, ज्यादातर लोगों का यह पहला नाटक था, लेकिन उनके अभिनय को देखते हुए कतई नहीं लगा कि वे पहली बार मंच पर उतरे हैं।

दिव्या जो नाटक में नेतृत्वकारी भूमिका में थीं, उनका भी पहला नाटक था, लेकिन उन्होंने विभिन्न चरित्रों की भूमिकाओं और प्रसंगों में जितना वैविध्यपूर्ण और सधा हुआ अभिनय किया, वह लाजवाब था। उनकी संवाद अदायगी भी काबिल-ए-तारीफ थी। हिरावल ही नहीं, बल्कि बिहार के रंगमंच, और खासकर महिला रंगकर्म में इसे एक नई संभावना के उदय की तरह देखा जाना चाहिए। अभिनव ने मुखिया की भूमिका में अत्यंत सहज अभिनय किया, चरित्र के अनुरूप लाजवाब इंप्रोवाइजेशन और नाटकीयता के कारण उनको दर्शकों ने बेहद पसंद किया। उनकी अभिनय प्रतिभा भी इस नाटक में खुलकर सामने आई। सूत्रधार की भूमिका में राजन और जनता की कई भूमिकाओं समता राय ने हमेशा की तरह बढि़या अभिनय किया और नाटक को प्रभावी बनाने में अपनी-अपनी भूमिका निभाई। एक फरियादी किसान की छोटी-सी भूमिका में संतोष झा भी अपना प्रभाव छोड़ गए। नाटक का संगीत राजन कुमार ने दिया था। प्रकाश परिकल्पना सुमन कुमार की थी। वस्त्र-विन्यास समता और दिव्या ने तय किया था। 

जनता के संस्कृतिकर्म को लिहाज से देखें तो सत्ता द्वारा बौद्धिकों और संस्कृतिकर्मियांे को येन-केन-प्रकारेण खरीद लेने और अपना चाकर बना लेने की तमाम कोशिशों और प्रपंचों के इस दौर में गुरशरण सिंह की विरासत सच्चे जनसंस्कृतिकर्मियों के लिए आज भी बेहद काम की है, इसे इस नाटक की सफल प्रस्तुति ने साबित किया।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-



सुधीर सुमन
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 
s.suman1971@gmail.com

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