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मोहन श्रोत्रिय की संस्मरणपरक कविता 'माँ'

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, जनवरी 14, 2012 | शनिवार, जनवरी 14, 2012

(कौन कहता है कि कविता छंदोबद्ध ही अच्छी लगती है.बंदिगत से निकल कर जब कविता अपने मन का विचरण करती हुई मंझिल तक पहुंचती  है तो पाठक की आँखों को कायनात कुछ अलग नज़र आती है.-सम्पादक )

मूल शीर्षक :तिरेसठ बरस पहले की बात है यह

बात चौंसठ साल पुरानी है
मां जब छोड़ गई उससे एक
साल पहले की.

मुझे अचरज होता है कि
कितनी पक्की है दर्ज़
मेरी स्मृति में. चार बरस से कम का मैं
और यह दृश्य शायद पिछले
इतने सारे सालों में रोज़ाना
जीया है मैंने. अतिशयोक्ति न समझें इसे
चौबीस घंटों में कभी भी
एक बार तो गुज़रता ही रहा है यह
मुसलसल बिला नागा.
और लगता है जैसे कल ही हुआ था.

वह ज़माना था जब ससुर से
बोल नहीं सकती थी बहुएं
फिर भी मां हाथ पकड़ कर
ले गईं मुझे अपने
काका ससुर के पास
मेरे दूसरे हाथ में थी चमचमाती पट्टी
जिस पर सुंदर से अक्षरों में
लिख दिया था मैंने
वह सब
जो मां ने बोला था.

पट्टी को घोटे से चमकाया था मां ने
नरसल की छोटी सी कलम भी छीली थी
उसने ही. स्याही की दवात में
कलम भी उसने ही डाल कर रखी थी.

वह जैसे बहुत जल्दी में थी
कोई पन्द्रह दिन के भीतर ही
संयुक्ताक्षर लिखने सिखा दिए थे
उसने मुझे
संयुक्ताक्षर उसकी ज़रूरत हों जैसे
सबसे बड़ी ज़रूरत.

पट्टी पर लिखा था उस दिन
जो कुछ भी मैंने
वह आज तक हर दिन
वैसा ही कौंधता रहा है : "मैं
मां को बहुत प्यार करता हूं
दुनिया में सब से ज़्यादा
मां ने बताये हैं अपने सपने
और मैं उन्हें पूरे करूंगा
जब मां नहीं रहेगी."

ज़ाहिर है इस सबका मतलब नहीं
समझा था मैं तब
जब मैं लिख रहा था यह सब.
एक-एक शब्द ज़ोर देकर धीरे-धीरे
बोला था मां ने. जी हां, ज़्यादा
और ज़ाहिर में नुक़ता
लगाना भी सिखाया था
मां ने ही.

सीढियां चढ़कर ऊपर पहुंचते ही
अपने काका ससुर के सामने
रख दी थी पट्टी.
वह कुछ समझ नहीं पाए.
हां, लिखे हुए को पढ़कर जैसे ही
उनका चेहरा ऊपर उठा
अपने खनखनाते दर्प भरे स्वर में
बोली मां, 'यह लिखा है मेरे बेटे ने.'

मेरे छोटे दादा अवाक्
हां, यह इसने लिखा है
इसने ही लिखा है यह सब
अपने छोटे-से हाथों से
बोलो यह मेरा सपना पूरा
करेगा या नहीं
मदद करोगे न आप ?
कहते ही इतना सब
धड-धड करती वह उतर गई सीढ़ी.

दादा ने खींच कर मुझे
सीने से लगा लिया
लगभग भींचते हुए
अपने आपसे बतियाते हुए जैसे

वह चकित थे कि दस
दिन की उनकी गैर हाज़िरी में
कैसे मैं छोटा-सा बच्चा
उतना सब लिख पाया
बार-बार यह पूछते रहे हों खुद से ही जैसे
यह क्या हो गया है लक्ष्मी को?
ऐसी आवाज़ तो अब तक सुनी नहीं
किसी ने और यह भाग कैसे गई
धड-धड करती. और यह
'जब मां नहीं रहेगी' का मतलब क्या?

मैं क्या समझ सकता था
और
समझा सकता था क्या
उन्हें जो
सुबह ही लौटे थे लाहौर से
और उस "लिखे" के मतलब
मैं भी कहां समझता था
समझ गया होता तो लिख कैसे पाता?

दादा की सरपरस्ती में
पढ़ने के क्या मतलब थे मैं
समझा नहीं सकता आपको
किसी को भी. बस मैं जानता हूं
और यह 'गूंगे-के-गुड' जैसा है.

मां दिन भर में सबसे ज़्यादा उत्साहित
होती थी उस समय
जब मैं कोई नई इबारत
लिख कर दिखा देता था
फुदक-फुदक कर चलती थी वह
और मैं इसका मतलब समझने के
लिहाज़ से बहुत छोटा था तब.

पर मुझे मां का इस तरह खुश रहना
बहुत अच्छा लगता था
और मैं हर दम यही चाहता
रहता कि मां ऐसे ही खुश रहे हर दम.
रही भी, जितने दिन बचे थे उसके
पर ज़्यादा कहां थे ये दिन ?

'मरने' का मतलब
मैं क़तई नहीं जानता था तब
तब भी नहीं जाना जब
सुबह-सवेरे घर में कोहराम मच गया
पूरी हवेली जैसे हिल गई हो
लाल चादर में ढंका कोई शरीर था
या शरीर-जैसा कुछ जिसे
कंधों पर उठाकर ले चले थे
घर के - मोहल्ले के लोग
सब तरफ़ से लोग आकर
चलने लगे साथ-साथ.
और ठट्ठ के ठट्ठ लोग जुड़ते गए
कहां जा रहे हैं ये सब?
और लाल चादर में क्या है?
ये कौतूहल का विषय था मेरे लिए.

मैं एक से दूसरी और तीसरी गोदी
में लिया जाता रहा
याद है अभी तक मैं निकल
भागना चाहता था क़ैद से

कैसी तो गर्मी थी और
कैसी तेज़ धूप
मेरे पैरों में जूते नहीं थे
इसीलिए शायद गोदी की क़ैद
में रखा जा रहा था मुझे.

तभी एक ततैये ने काट
लिया था मुझे गाल पर
आग सी लग गई थी पूरे
बदन में. और मैं चीख पड़ा ज़ोर से
सबने समझा मैं लाल चादर के
मायने समझ गया हूं शायद
और इसीलिए हो सकता है
दादा बोले तेरी मां को रामजी ने
बुला लिया है
मैं रामजी को नहीं जानता था
तुतलाते पूछा मैंने रामजी के बारे में
और लाल चादर के बारे में
जो बदलते कंधों पर
चल रही थी. किसको फ़ुर्सत थी
मेरे सवालों के जवाब देने की. या
शायद ज़रूरत भी नहीं थी. बच्चों के
सवाल वैसे भी खिझाते ही हैं
'बड़ों' को.

'चिता' कहां समझता था मैं?
पर जब लिटाया जा रहा था
लकड़ियों पर
लाल चादर को तो मैं चुपके से
दो लोगों की आड़ से देखकर
झलक पा गया अपनी मां के चेहरे की
सुर्ख लाल बिंदी
मोटी-सी बिंदी की
और बिना कुछ समझे हुए
रो पड़ा दहाड़ मार कर, ऐसे
जैसे फिर कभी नहीं रोया.
कोई भी गया, कभी नहीं.
वह दहाड़ मारकर रोना तो
आखिरी ही था. कोई एक काम
जो चार बरस की उम्र में ही
'आखिरी बार' हो गया !
चिता को अग्नि देने के लिए
हाथ लगवाया गया मेरा और
तुरत ही वहां से हटा भी
दिया गया मुझे.

मुझे याद नहीं कितनी देर तक
मेरी रोती हुई आँखों में
मेरी मां की सुर्ख लाल बिंदी तैरती रही.
सच मानें वह बिंदी मेरे बाल-मन पर
ऐसी अंकित हुई, कि अब भी मैं जब चाहूं
आंखें मूंदते ही उसे देख सकता हूं
उसी रंग और आकार में
जैसी दिपदिपाती थी मेरी मां के माथे पर
नज़र हटती भी नहीं थी,
और अब जब वैसी बिंदी किसी के
माथे पर दिख जाए तो
पहुंच जाता हूं आज से चौंसठ साल पहले
यादों की अंधेरी कोठरियां खुलने लगती हैं.

अंधेरी कोठरियों का भी अजब हाल है
खुलती हैं तो चीज़ें बेतरतीब
सामने आती हैं
हर बार अलग क्रम में.
मां का न रहना मेरे लिए
न जाने क्या-क्या खो जाने का
मिला-जुला रूप था. मेरे लिए
कुछ भी अब वैसा
ही नहीं रह गया था.
आप सोच सकते हैं कि
भरे-पूरे परिवार में भी
मां के जाते ही
एक छोटा-सा निरीह-सा बच्चा
'अनाथ' समझने लगे अपने आपको
बिना 'अनाथ' का मतलब समझे?

धरती जैसे कीली पर से उतर गई थी
चकराया-सा मैं जैसे एकदम गूंगा
हो गया था अदृश्य भी. किसी को
कोई परेशानी नहीं थी मेरे न दिखने से
गूंगे हो जाने से

हलवाई बैठा दिए गए थे मिठाइयां और
तरह-तरह के पकवान बन रहे थे
मां की 'शांति' के लिए
पर मुझे याद आता
मां को तो कभी पसंद नहीं थे
ये भांति-भांति के पकवान
और मैं समझ नहीं पाता इनका क्या रिश्ता
हो सकता था शांति से. 'शांति'
जो नाम था मेरी मां का इस घर में आने से पहले
यहां आकर वह 'शांति' से 'लक्ष्मी' बन गई
क्योंकि शांति यहां पहले से क़ायम थी
बुआ के रूप में. नाम बदल सकता था सिर्फ़ उसी का
जो ब्याहता होकर यहां आई थी पराये घर से.
जिस दिन वह चीत्कार मचा था
घर में उससे पहली रात ही
तो पता चला था
कि आया है घर में मेरा
छोटा-सा प्यारा-सा भैया
फिर खुसर-पुसर सुनाई दी कि
वह तो चला गया, और फिर
बहुत बाद में आया समझ में
कि जाते-जाते ले गया मेरी मां को भी.
यह तब की बात है जब लाल चादर का
'रहस्य' रहस्य नहीं रह गया था. तो
उस दिन से वह
'न-देखा' भैया मुझे दुश्मन लगने लगा.

और पिता?
वह तो जैसे अदृश्य हो गए
भूमिगत जैसे. वाद्य यंत्रों का संग
चुन लिया उन्होंने.
अरसे तक यह सिर्फ़ सुना मैंने
देखा नहीं.
बहुत बाद में समझ आया कि
क़ुरबानी की थी पिता ने
अपने सुखों की मेरे लिए
पर यह उदासीनता भी तो अंकित
हो ही चुकी थी बहुत गहरे मेरे मन पर,
और सच कहूं, तर्क-विवेक अपनी जगह
मैं कभी सहज नहीं हो पाया.
कितने ही कोड़े लगाए हों मैंने
बचपन से बनी ग्रंथि को, पर बात
वहीं जमी रही, और बावजूद तमाम खुलेपन के
बर्फ़ पिघल ही नहीं पाई.
वह जीवन भर स्वीकार न कर पाए
मां के चले जाने के अर्थों को और
मैं भुला नहीं पाया कभी भी
कि वह मौत सबसे ज़्यादा वंचित और शापित
बना गई थी मुझे ही.

'मां' कोई साधारण शब्द नहीं है
यह तो पूरा संसार है
कौन सिखाए
कौन हंसाए
कौन उंडेले दुनिया भर का प्यार
कौन बनाए रखे संतुलित
जीवन की पतवार?

मेरी दुखती रग को पहचाना
जब मैं बड़ा हो गया मेरे
मित्रों की मांओं ने
मेरे अपने घर की बड़ी स्त्रियों से
कहीं कहीं ज़्यादा. उनमें से कोई भी नहीं लगाती थी
वैसी सुर्ख लाल मोटी-सी बिंदी
पर शायद वे समझ पाईं
कि खोज रहा था
जो कुछ खो चुका था उसकी परछाई
वैसी तो न थीं पर ये परछाइयां
न मिली होतीं तो मैं मैं नहीं होता
वह नहीं होता जो सपने में देखा था मां ने.

फिर भी अनेक अवसरों पर
कसक रही कि मां होती
उपलब्धियों से खुश तो वह ही
हो सकती थी पुरस्कारों
सोने के मेडल में उसका सपना
ही तो दिख सकता था उसे
जिनसे भी साझा की मैंने
विषाद मिश्रित खुशी
हर बार मैं खोजने लगता
वह चमक चेहरे पर जो उस सुर्ख
लाल बिंदी वाले चेहरे पर होती.

किसी मां को नहीं मर जाना चाहिए इस तरह
जैसे मर गई थी मेरी मां
एक दिन अचानक
सुबह-सवेरे
मुझे इस क़दर अकेला छोड़ कर
अपने सपनों की भारी गठरी
मेरे सिर पर छोड़ कर.
यह कोई तरीक़ा नहीं है प्यार
जताने का और जो प्रिय है उसका
जीना दुश्वार बना देने का !!!


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

मोहन श्रोत्रिय
(जे.एन.यूं. में पढ़े,कोलेज शिक्षा से सेवानिवृति,प्रखर वक्ता और लेखक ,चर्चित त्रैमासिक 'क्‍यों' का संपादन - स्‍वयंप्रकाश के साथ किया,राजस्‍थान एवं अखिल भारतीय शिक्षक आंदोलन में अग्रणी भूमिका रही,लगभग 18 किताबों का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद.


लगभग 40 किताबों के अनुवाद का संपादन.जल एवं वन संरक्षण पर 6 पुस्तिकाएं हिंदी में/2 अंग्रेज़ी में. अनेक कविताओं, कुछ कहानियों तथा लेखों के अनुवाद पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित.)


Contact:- 
G-001, PEARL GREEN ACRES


Shri Gopalnagar,Gopalpura

Bypass,Jaipur, India 302019,

Cell-9783928351,
E-mail:-mshrotriya1944@gmail.com
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1 टिप्पणी:

'अपनी माटी' का 'किसान विशेषांक'


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