''जब नाटक सिर्फ पैसे के बल पर नहीं, बल्कि दोस्ती और आत्मीयता के बीच किया जाता था। ''-अरूण पाण्डे - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

नवीनतम रचना

''जब नाटक सिर्फ पैसे के बल पर नहीं, बल्कि दोस्ती और आत्मीयता के बीच किया जाता था। ''-अरूण पाण्डे




इप्टा रायगढ़ का अठारहवाँ राष्ट्रीय 
नाट्य समारोह सम्पन्न

रंगकर्मी अरूण पाण्डेय को शरदचन्द्र वैरागकर सम्मान

   



इप्टा रायगढ़ द्वारा दि. 11 से 15 जनवरी 2012 तक अठारहवाँ राष्ट्रीय नाट्य समारोह आयोजित किया गया। समारोह का उद्घाटन करते हुए मुख्य अतिथि डॉ. सत्यदेव त्रिपाठी ने अरूण पाण्डे को इप्टा रायगढ़ द्वारा प्रदत्त तृतीय शरदचन्द्र वैरागकर स्मृति सम्मान प्रदान किया। इस सम्मान कार्यक्रम में नाटककार, नाट्य समीक्षक एवं कथाकार श्री हृषिकेश सुलभ तथा इप्टा रायगढ़ के संरक्षक श्री मुमताज भारती भी उपस्थित थे।

 इस अवसर पर विवेचना रंगमंडल, जबलपुर के निर्देशक अरूण पाण्डे ने कहा कि रायगढ़ मेरे लिए दूसरा घर है। यहाँ मैं सन् 94 से आता रहा हूँ और आगे भी जब भी मुझे बुलाया जाएगा, तब ज़रूर आऊँगा। रंगमंच करना वैसे भी कठिन रहा है और मैं रंगमंच में उस समय का आदमी हूँ, जब नाटक सिर्फ पैसे के बल पर नहीं, बल्कि दोस्ती और आत्मीयता के बीच किया जाता था। मुख्य अतिथि श्री सत्यदेव त्रिपाठी ने श्री अरूण पाण्डे को सम्मान पत्र एवं सम्मान राशि प्रदान करते हुए कहा कि अरूण पाण्डे खाँटी रंगकर्मी है। वे अपने जीवन में अधिकतर समय और महत्व रंगकर्म को ही देते हैं। इन्होंने जितना और जिसतरह का ज़मीनी काम किया है, उस हिसाब से उन्हें बहुत देर से पहचान और सम्मान मिला। उनमें अद्भुत क्षमता है कि वे किसी भी साहित्यिक कृति में नाटकीय तत्व ढूँढ़कर उसे मंच पर साकार कर देते हैं। उनका समूचा काम किसी भी सम्मान से परे है। उद्घाटन कार्यक्रम के संचालक विनोद बोहिदार ने श्री अरूण पाण्डे के बहुआयामी व्यक्तित्व का परिचय देते हुए उनके रंगमंच, साहित्य, पत्रकारिता, फिल्म, टेलिविजन एवं सामाजिक कार्यों का परिचय दिया।


 उद्घाटन के बाद नाट्य समारोह की प्रथम प्रस्तुति ‘‘ओह ओह ये है इंडिया’’ का मंचन इप्टा रायगढ़ द्वारा किया गया। सन् 1947 के बाद से आज तक देश के आम आदमी की समस्याएँ हल होने की बजाय विकराल रूप धारण कर चुकी हैं। इसके लिए जिम्मेदार न केवल राजनेता है, बल्कि देश का बुद्धिजीवी वर्ग और समूची जनता है, जो विकास के इस मॉडल पर सवाल उठाने की बजाय गैरज़रूरी बहसों में फँसी रहती है। सन् 1990 के बाद विकसित हुए वैश्वीकरण और नई आर्थिक नीतियों ने किसानों की आत्महत्या, साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, दलित एवं स्त्री शोषण के नए रास्ते खोले हैं। श्री प्रवीण गुंजन के  निर्देशन में प्रतिभागियों की इन विषयों पर केन्द्रित समूह चर्चा के दौरान यह नाटक विकसित हुआ है, जिसका गीत-संगीत सामूहिक तौर पर रचा गया। कला निर्देशन रहा था एन. कुमार दास का।


            दूसरे दिन विवेचना रंगमंडल जबलपुर द्वारा ‘‘निठल्ले की डायरी’’ नाटक का मंचन किया गया। हिंदी के प्रसिद्ध व्यंग्यकार एवं विवेचना जबलपुर के संस्थापक हरिशंकर परसाई की समस्त व्यंग्य रचनाओं में से कुछ रचनाओं का चुनाव कर कक्का और निठल्ला नामक दो केन्द्रीय पात्रों की दिलचस्प बातचीत के द्वारा अपने पासपड़ोस के लोगों, उनकी छोटी-मोटी समस्याओं के साथ देश-विदेश की अनेक घटनाओं की विसंगतियों पर लगातार रोचक टिप्पणी की गई है और उसी के साथ अनेक दृश्य भी प्रस्तुत होते हैं। मनभावन गीत-संगीत-नृत्य के साथ चुटीले संवाद और उनको अपनी आंगिक-वाचिक गतियों से साकार करते विवेचना रंगमंडल के कलाकारों ने दर्शकों को बांधे रखा। परसाई जी के गहरी वैचारिकता से लैस चुटीले व्यंग्यबाणों का सार्थक सम्प्रेषण दर्शकों को हो रहा था, दर्शकों की हँसी व तालियाँ इसका प्रमाण प्रस्तुत कर रही थीं। समूचा नाटक मंच पर ‘खेल’ की तरह प्रस्तुत किया जाना इसकी एक विशेषता है, जो व्यंग्य के उद्देश्य को सार्थकता प्रदान करता है। हँसते-हँसते गंभीर बात का मर्म दर्शक के हृदय के भीतर तक उतरता चलता है। नाटक का संगीत पक्ष भी प्रभावशाली है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अरूण पाण्डे की इप्टा रायगढ़ के नाट्य समारोह में आठ-नौ साल के अंतराल के बाद की प्रस्तुति उनके निर्देशन के उच्चतम प्रतिमानों को प्रमाणित करने वाली थी। इप्टा रायगढ़ को इस नाट्य प्रस्तुति के निर्देशक अरूण पाण्डे को वर्ष 2012 का तृतीय शरदचन्द्र वैरागकर स्मृति रंगकर्मी पुरस्कार प्रदान करना सार्थक सिद्ध हुआ।



                इप्टा रायगढ़ के नाट्य समारोह के तीसरे दिन ऑल्टरनेटिव लिविंग थियेटर, कोलकाता का नाटक ‘बिषादकाल’’ का मंचन हुआ। प्रबीर गुहा की एकदम पृथक रंगशैली का प्रदर्शन रायगढ़ के रंगमंच पर पहली बार हुआ। बादल सरकार के ‘फिजिकल थियेटर’ का बिलकुल नया प्रवाह प्रबीर गुहा की रंगशैली में दिखाई देता है। बंगाल के पारम्परिक रंगमंच की अनेक युक्तियों को उनके गहन अध्ययन के उपरांत ग्रहण करने वाले प्रवीर गुहा ‘आलाप’ के बिल्कुल नए सांगीतिक उपयोग से नाटक में अभिव्यक्त कथ्य को शब्दों से परे जाकर भी सम्प्रेषित करते हैं। उनके सारे अभिनेता अपने शरीर की एक-एक माँसपेशी का उपयोग करते हुए शरीर भाषा के माध्यम से भावों को सम्प्रेषित करते हैं। इसलिए उनके नाटक बंगला, अंग्रेजी और हिंदी भाषा के मिश्रित प्रयोग के बावजूद आसानी से सम्प्रेषित होते हैं।‘‘बिषादकाल’’ रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानी ‘विसर्जन’ पर आधारित है। इसमें एक छोटी सी कथा को रूपक की तरह रचकर प्रेम और हिंसा का अंतर्द्वन्द्व प्रस्तुत किया गया है, इसमें शेक्सपियर के हैमलेट की ऑफिलिया से अपर्णा के दर्द का साम्य देखा जा सकता है।   



                 समारोह के चौथे दिन इप्टा डोंगरगढ़ की प्रस्तुति ‘‘बापू मुझे बचा लो’’ का मंचन हुआ। आज के समय में किसतरह बेशर्मी के साथ गांधी के नाम पर तमाम गांधीविरोधी काम होते हैं, इसका स्थूल चित्रण इस नाटक में दिखाई दिया। एक गाँव का सरपंच अपने तमाम जुगाड़ों का उपयोग कर एक भ्रष्टविज्ञान प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना के लिए मंत्रालय से अनुदान प्राप्त कर लेता है। उसकी पहली किश्त से ही भ्रष्टाचार एवं कमीशनखोरी का सिलसिला शुरु होता है। हर एक व्यक्ति इस भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाना चाहता है। अंत में गांधी के पुतले के स्थान पर खड़े किए गए गरीब व्यक्ति की चप्पल, डंडा, घड़ी, धोती सब सरेआम छिन जाती है और वह बापू से बचाने की गुहार लगाता है। नुक्कड़ नाटक शैली का यह नाटक अपनी स्थूलता के बावजूद चुटीले और समसामयिक विसंगतियों पर व्यंग्य कसने के कारण दर्शकों को आकर्षित करता रहा। नाट्यालेख था दिनेश चौधरी का और निर्देशन था राधेश्याम तराने का। नाटक के अंत में सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और दुष्यंत कुमार की कविताओं के साथ गांधी के विचार और वर्तमान परिदृश्य के अंतर्विरोध पर दृश्य-श्रव्य प्रयोग कविता पोस्टर की तरह महसूस हुआ।


अंतिम दिन दि फैक्ट आर्ट एण्ड कल्चरल सोसायटी बेगुसराय के नाटक ‘‘समझौता’’ का मंचन हुआ। हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार गजानन माधव मुक्तिबोध की कहानी पर आधारित सुमन कुमार के नाट्यालेख एवं प्रवीण कुमार गुंजन के निर्देशन में प्रस्तुत इस नाटक में एकल अभिनय कर रहे थे मानवेन्द्र त्रिपाठी। सर्कस के तंबू को प्रतीकायित करते रस्सी के घेरे के अभिनय क्षेत्र के पीछे बैठी संगीत मंडली मानवेन्द्र के अभिनय के साथ एकाकार होकर हरेक ध्वनि, गीत-संगीत एवं गति को आधार दे रही थी। मुक्तिबोध की इस कहानी में एक बेरोजगार युवक से साक्षात्कार है, जो अनेक स्थानों पर धक्के खाने के बाद सर्कस में नौकरी की तलाश में पहुँचता है। वहाँ उसे रीछ बनने को मजबूर किया जाता है, जो सर्कस में शेर के साथ लड़ता है। भय, आतंक, तनाव एवं दबाव में जब वह शेर के सामने पड़ता है, तो उसे पता चलता है कि शेर की खाल में भी उसके समान अन्य मजबूर व्यक्ति है और वे आपस में समझौता कर लेते हैं पशु बनकर प्रस्तुत होने का। मानवेन्द्र ने अपनी समर्थ देहभाषा और सधी हुई लचीली आवाज के माध्यम से एक ऐसे आदमी को समग्रता के साथ प्रस्तुत किया है, जो अपने मनुष्य की तरह जीने के न्यूनतम अधिकारों से भी वंचित किया जाता है और उसे सिर्फ जीवित रहने के लिए अनेक समझौते करने के लिए बाध्य किया जाता है। ध्वनि परिकल्पना अंजलि पाटील की थी और संगीत परिकल्पना संजय उपाध्याय की।


     इस समारोह की यह भी विशेषता रही कि इसमें प्रतिदिन नाट्य मंचन से पूर्व फिल्म एण्ड टेलिविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे की लघु फिल्मों - खरा करोडपति, स्पंदन और निनाद के अलावा म्युज़िक वीडियो ‘अमेरिका अमेरिका’ का प्रदर्शन किया गया।अठारहवाँ राष्ट्रीय नाट्य समारोह ‘प्रतिरोध का रंगमंच’ की अवधारणा को समर्पित रहा। इस समारोह में मंचित सभी नाटक वर्तमान व्यवस्था की विसंगतियों पर विभिन्न तरीके से प्रतिरोध व्यक्त कर रहे थे। समारोह को सफलता प्रदान की संस्कृति विभाग, भारत सरकार, संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली, जिंदल स्टील एंड पावर लिमि., रायगढ़, जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन, नगर पालिक निगम, रवि इलेक्ट्रिकल, शर्मा टैंट हाउस, पंडित भोजनालय एवं रायगढ़ के समस्त दानदाताओं और दर्शकों ने, जिनके प्रति आभार व्यक्त किया गया।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
उषा वैरागकर आठले 
SocialTwist Tell-a-Friend

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here