विश्वास पत्रिया की कविता ...दरवाज़ा - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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विश्वास पत्रिया की कविता ...दरवाज़ा

एक दरवाज़ा था ,
मेरे आँगन में,
छोटा सा,
बहुत पुराना,
पर सुन्दर,
जैसे सब जानता हो,
जैसे कोई बुज़ुर्ग,
किसी कहानीकर की भाँती,
पूरी कथा , व्यथा,
सुनाता हुआ, रुलाता
हंसाता हुआ, सबको,
वो दरवाज़ा खुलता था,
दोनों तरफ,
चाहे इधर से
चाहे उधर से,
उसी के पीछे,
एक खूँटी गडी थी,
एक पुराना छाता,
टंगा रहता था उस पर,
और मैं उछलता कूदता,
कभी इधर , कभी उधर,
छुपान छुपाई खेलता था,
अब वो घर नहीं है,
वो दरवाज़ा भी बदला जा चूका है,
पर मैं आज भी छुपान छुपाई,
खेल ही रहा हूँ, कभी इधर से...कभी उधर से.......


लेखक .... 'प्रेम'
माध्यम .... 'विश्वास'

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


विश्वास पत्रिया
(18 वर्षों से अध्ययनरत रंगमंच की दुनिया बतौर विद्यार्थी अपने आप को गढ़ रहे हैं.भंवर पत्रिया,गोपाल आचार्य जैसे मंजे हुए गुरुओं से सीखना जारी है.इनकी रूचियों में रंगमंच, नाटक, कविता, शायरी, संगीत, मूर्तिकला, एवं भारतीय संस्कृति आदि शामिल हैं.)

पता- रंगोली, बी 315 , शास्त्री नगर, भीलवाडा, (राज.)
संपर्क - 98291 -72899 , 94685 -44555

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