विश्वास पत्रिया की कविता ...दरवाज़ा - अपनी माटी

नवीनतम रचना

सोमवार, जनवरी 16, 2012

विश्वास पत्रिया की कविता ...दरवाज़ा

एक दरवाज़ा था ,
मेरे आँगन में,
छोटा सा,
बहुत पुराना,
पर सुन्दर,
जैसे सब जानता हो,
जैसे कोई बुज़ुर्ग,
किसी कहानीकर की भाँती,
पूरी कथा , व्यथा,
सुनाता हुआ, रुलाता
हंसाता हुआ, सबको,
वो दरवाज़ा खुलता था,
दोनों तरफ,
चाहे इधर से
चाहे उधर से,
उसी के पीछे,
एक खूँटी गडी थी,
एक पुराना छाता,
टंगा रहता था उस पर,
और मैं उछलता कूदता,
कभी इधर , कभी उधर,
छुपान छुपाई खेलता था,
अब वो घर नहीं है,
वो दरवाज़ा भी बदला जा चूका है,
पर मैं आज भी छुपान छुपाई,
खेल ही रहा हूँ, कभी इधर से...कभी उधर से.......


लेखक .... 'प्रेम'
माध्यम .... 'विश्वास'

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


विश्वास पत्रिया
(18 वर्षों से अध्ययनरत रंगमंच की दुनिया बतौर विद्यार्थी अपने आप को गढ़ रहे हैं.भंवर पत्रिया,गोपाल आचार्य जैसे मंजे हुए गुरुओं से सीखना जारी है.इनकी रूचियों में रंगमंच, नाटक, कविता, शायरी, संगीत, मूर्तिकला, एवं भारतीय संस्कृति आदि शामिल हैं.)

पता- रंगोली, बी 315 , शास्त्री नगर, भीलवाडा, (राज.)
संपर्क - 98291 -72899 , 94685 -44555

SocialTwist Tell-a-Friend

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here