पढ़ने औए साझा करने लायक कविताओं के जनक अनुज लुगुन - अपनी माटी

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रविवार, जनवरी 15, 2012

पढ़ने औए साझा करने लायक कविताओं के जनक अनुज लुगुन

अनुज लुगुन नए ज़माने की पौध है.कविता के बने-बनाए सांचे से कुछ विलग करने का माद्दा रखते हैं अनुज.बहुत दूर तक अपने इलाके के उस दर्द(यथार्थ) को लिखने और फिर ज़माने को अपनी उसी बात/विचार पर केन्द्रीत करने की ताकत रखते हैं.उनके आगे के जीवन के हित हमारी शुभकामनाएं-सम्पादक 


शहर के दोस्त के नाम पत्र

हमारे जंगल में लोहे के फूल खिले हैं
बॉक्साईट के गुलदस्ते सजे हैं
अभ्रक और कोयला तो
थोक और खुदरा दोनों भावों से
मण्डियों में रोज सजाए जाते हैं
यहाँ बड़े-बड़े बांध भी
फूल की तरह खिलते हैं
इन्हें बेचने के लिये
सैनिकों के स्कूल खुले हैं,
शहर के मेरे दोस्त
ये बेमौसम के फूल हैं
इनसे मेरी प्रियतमा नहीं बना सकती
अपने जूड़े के लिये गजरे
मेरी माँ नहीं बना सकती
मेरे लिये सुकटी या दाल
हमारे यहां इससे कोई त्योहार नहीं मनाया जाता,
यहां खुले स्कूल
बारह खड़ी की जगह
बारहों तरीकों के गुरिल्ला युद्ध सिखाते हैं
बाजार भी बहुत बड़ा हो गया है
मगर कोई अपना सगा दिखाई नहीं देता
यहां से सबका रुख शहर की ओर कर दिया गया है
कल एक पहाड़ को ट्रक पर जाते हुए देखा
उससे पहले नदी गयी
अब खबर फ़ैल रही है कि
मेरा गाँव भी यहाँ से जाने वाला है ,
शहर में मेरे लोग तुमसे मिलें
तो उनका ख्याल ज़रूर रखना
यहाँ से जाते हुए उनकी आँखों में
मैंने नमी देखी थी
और हाँ !
उन्हें शहर का रीति -रिवाज़ भी तो नहीं आता,
मेरे दोस्त
उनसे यहीं मिलने की शपथ लेते हुए
अब मैं तुमसे विदा लेता हूँ.

उनकी अन्य कवितायेँ 

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


(भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार-२०११ से सम्मानित


 इस युवा रचनाकार से उनके फेसबुक पेज के जारी 


संपर्क साधा जा सकता है )


martialartanuj@gmail.com
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