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सलमान रुश्दी के भारत नहीं आने के मायने :कौशल किशोर

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, जनवरी 18, 2012 | बुधवार, जनवरी 18, 2012

सलमान रुश्दी 
सलमान रुश्दी जयपुर साहित्य उत्सव 2012 में भाग नहीं लेंगे। जयपुर साहित्य उत्सव के वेबसाइट पर 20 से 24 जनवरी तक चलने वाले इस समारोह का जो कार्यक्रम जारी किया गया है, उसमें सलमान रुश्दी का नाम नहीं है। साहित्य उत्सव द्वारा इस आयोजन को विविध कलाओं के प्रदर्शन, बहसों व विचार.विमर्श का मंच बनाने की जो कोशिश की जा रही थी, उसे रुश्दी के न आने से झटका लगा है क्योंकि इसकी वजह से आयोजन खासा चर्चा में था। रुश्दी को आमंत्रित कर उत्सव के आयोजकों ने जिस साहस का परिचय दिया था, राजस्थान की सरकार ने उस पर तुषारापात कर दिया है।

जब से सलमान रुश्दी के जयपुर साहित्य उत्सव 2012 में भाग लेने की खबर आई, तब से इसका विरोध हो रहा था। जबकि रुश्दी भारतीय मूल के लेखक हैं और उन पर इस तरह की कोई पाबंदी नहीं लगाई जा सकती है। रुश्दी का कार्यक्रम में शामिल होना या न होना आयोजकों व स्वयं रुश्दी पर निर्भर करता है .उल्लेखनीय है कि सलमान रुश्दी 2007 के जयपुर साहित्य उत्सव में भी आये थे। 

1947 में मुंबई में जन्मे सलमान रुश्दी अपने दूसरे उपन्यास ‘मिड नाइट्स चिल्ड्रेन’ से पश्चिम के साहित्य जगत में चर्चा में आये। 1981 में इसे बुकर सम्मान मिला। बाद में 1993 में इस उन्यास को ‘बुकर ऑफ बुकर्स’ का सम्मान भी मिला। 1988 में उनका चर्चित व विवादास्पद उपन्यास ‘द सेटेनिक वर्सेस’ आया। मुस्लिम बाहुल्य देशों में इस उपन्यास का भारी विरोध हुआ। हिंसात्मक प्रदर्शन हुए। इस उपन्यास को रखने वाले किताब घरों को आग के हवाले किया गया। इसकी प्रतियों की होली जलाई गई। भारत उन देशों में अग्रणी रहा जहां इस उपन्यास को प्रतिबंधित किया गया। ईरान के तत्कालीन नेता आयतुल्ला खुमेनी द्वारा 14 फरवरी 1989 को रुश्दी के खिलाफ ‘तौहीन.ए.इस्लाम’ का आरोप लगाकर जान से मार देने का फतवा जारी किया गया। इसकी वजह से रुश्दी को कई साल तक भूमिगत भी रहना पड़ा। बाद में ईरान की सरकार ने उस फतवे पर रोक लगा दिया था।

किसी की भी सलमान रुश्दी के विचारों, उनके उपन्यास के विषय.वस्तु व दृष्टिकोण से असहमति हो सकती है। उनका विरोध हो सकता है। सवाल है कि ऐसे विरोध का तरीका क्या हो ? लेखक को बोलने न दिया जाय। उसे अपने विचारों को प्रकट न करने दिया जाय। उस पर शारीरिक हमले किये जाय। उसे जीने के अधिकार से वंचित कर दिया जाय। कहा जाता है कि  इन लेखकों के विचारों से समुदाय विशेष की भावना व आस्था पर चोट पड़ती है। ऐसा देखा जाता है कि जहाँ सोचने.समझने की शक्ति भावना व आस्था तक सीमित हो जाती है, वहाँ तर्क, विवेक, ज्ञान व बुद्धि के किवाड़ बंद हो जाते हैं। सवाल है कि क्या कोई लोकतांत्रिक समाज अपने को आस्था व भावना तक सीमित करके लोकतांत्रिक बना रह सकता है ?

यदि चुनाव का होना व सार्विक मताधिकार लोकतंत्र के लिए जरूरी है, वहीं आधुनिक विचार, अवधारणा व संस्कृति इसकी आत्मा है। इसी अर्थ में लोकतंत्र एक आधुनिक व्यवस्था है। यहां ‘गणेशजी की पत्थर की मूर्ति दूध पी जाती है’ या ‘सोये सोये आदमी पत्थर हो जाता है’ जैसे अंधविश्वासों को मीडिया व अन्य माध्यमों द्वारा प्रचारित किया जाता है।

ज़रूरी लिंक जयपुर साहित्य उत्सव की मूल वेबसाईट 

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-



कौशल किशोर,जन संस्कृति मंच,लखनऊ के संयोजक हैं.लखनऊ-कवि,लेखक  के होने साथ ही जाने माने संस्कर्तिकर्मी हैं.
एफ - 3144, राजाजीपुरम,
लखनऊ - 226017
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