हुसैन,तस्लीमा और अब सलमान रुश्दी - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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हुसैन,तस्लीमा और अब सलमान रुश्दी


कला संस्कृति का महाकुंभ ‘जयपुर साहित्य महोत्सव’ आज से शुरू हो चुका है। अगले पाच दिनों तक चलने वाले इस समारोह में कई देशों तथा कई भाषाओं के लेखक, चिंतक, कलाकार, विद्वान आदि भाग लेंगे। वे कला, साहित्य, सिनेमा, पर्यावरण, समाज आदि से जुड़े विविध विषयों पर वर्कशाप, संवाद, विमर्श व चर्चा करेंगे। इस समारोह में भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी को भी आना था। सत्रों में उन्हें भी अपना विचार रखना था। अपनी औपन्यासिक कृति ‘द सैटेनिक वर्सेस’ की वजह से रुश्दी चर्चित और विवादास्पद रहे हैं। इस महोत्सव में उनका आना और उनको सुनना एक अनुभव होता। पर उनको लेकर जिस तरह का विवाद चुनाव के मद्देनजर पैदा किया गया, इससे उनका जयपुर महोत्सव में भाग लेना संदिग्ध है। रुश्दी के भारत आने को लेकर कट्टरपंथियों की ओर से काफी विरोध रहा है। 

यह पहली बार नहीं हुआ है . प्रसिद्ध चित्रकार एम एफ हुसैन के साथ भी यही कहानी दोहराई गई थी। उनके जिन चित्रों को निशाना बनाया गया, वे चित्र बहुत पुराने थे। वे जब बनाये गये . उन पर शारीरिक हमले हुए। उनके चित्रों की होली जलाई गई। उनके खिलाफ सैकड़ों की संख्या में मुकदमें दायर किये गये। उन्हें मजबूर कर दिया गया कि वे देश छोड़कर चले जायें। हुसैन को उम्र के अन्तिम पड़ाव पर कतर की नागरिकता लेनी पड़ी। कुछ लोग ने इसके लिए हुसैन की आलोचना भी की। लेकिन क्या हुसैन की पीड़ा को समझने, उनके मन में झाँकने की कोशिश की गई ? हुसैन कहते  रहे कि भले मैं हिन्दुस्तान के लिए प्रवासी हो गया हूँ लेकिन मेरी यही पहचान रहेगी कि मैं हिन्दुस्तान का पेन्टर हूँ, यहाँ जन्मा कलाकार हूँ। अर्थात हुसैन के कलाकार की जड़े यहीं है और अपने जड़ो से कटने का जो दर्द होता है, वह यहाँ भी है। अपने इस दर्द के साथ हुसैन इस दुनिया से चले गये।

इसी दर्द का विस्तार तस्लीमा नसरीन तक है। वह ‘अपने सुन्दर सलोने संसार’ में लौटना चाहती हैं, ‘कोलकाता के घर’ और उन्हें मिलता है ‘नजरबंदी’ या ‘बंदी’ का जीवन। बांग्ला देश से निष्कासन के बाद तस्लीमा कोलकता में रहना चाहती थीं। वहां का सांस्कृतिक माहौल उनके ज्यादा माकूल था। । उनका जीवन पिंजड़े में बन्द चिड़िया की तरह है। सार्वजनिक जीवन से अलग एक कमरे में वे कैद हैं। कोई उनसे मिल नहीं सकता। उन्हें इस देश में रहने के लिए जो वीजा दिया गया है, वह भी सीमित अवधि के लिए है।

कलाकार स्वतंत्रता चाहता है। वह प्रतिबन्धों, असुरक्षा में नहीं जीना चाहता है। पर व्यवस्था ऐसी है जो कलाकार को न्यूनतम सुरक्षा की गारण्टी नहीं दे सकती। यहाँ लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता है। नागरिकों को अपना पसंदीदा धर्म व पंथ अपनाने की स्वतंत्रता है। अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता का दावा किया जाता है।  हम ‘वसुधैव ही कुटुम्बकम’ को भारतीय संस्कृति बताते हुए थकते नहीं। इस पर गर्व किया जाता है। लेकिन इन बड़ी.बड़ी बातों के बीच अक्सरहाँ छोटी बातों को नजरअन्दाज कर दिया जाता है कि यहाँ हुसैन, तसलीमा......जैसे कलाकारों या ऐसे अनगिनत लोगों के लिए इतनी भी जगह क्यों नहीं जहाँ वे स्वतंत्रता से जी सके, रह सकें। सलमान रुश्दी का जयपुर साहित्य महोत्सव में नहीं आना उसी कहानी को दोहराता है। आखिरकार यह कैसी व्यवस्था है जहां असहमति व विरोध की जगहें सिकुड़ती जा रही है ? रुश्दी को भारत आने को लेकर जिस तरह का विवाद पैदा किया गया है, उसने सोचने.विचारने के लिए ऐसे कई सवाल छोड़ गये हैं।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
जसम की लखनऊ शाखा के जाने माने संयोजक जो बतौर कवि,लेखक लोकप्रिय है.उनका सम्पर्क पता एफ - 3144, राजाजीपुरम,लखनऊ - 226017 है.
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