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''अपने लिखे को छपने-छपाने की अज़ीब बेकली है।''-अवनीश सिंह चौहान

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, जनवरी 21, 2012 | शनिवार, जनवरी 21, 2012



''तमाम गीतकारों में समय और सत्य को ठीक-ठीक समझे बगैर ही अपने लिखे को छपने-छपाने की बेकली है।'' वरिष्ठ नवगीतकार श्री दिनेश सिंह की यह बात बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि कोई भी साहित्यिक रचना तभी प्रासंगिक एवं प्रभावशाली बन सकती है जब उसका कथ्य अपने समय और समाज को प्रतिबिंबित करता हो। आज कई गीतकार अपने समय और सत्य को समझे बिना ऐसा ताना-बाना बुन रहे हैं कि उनके गीत पाठकों को या तो अतीत के खण्डहर में ले जाते हैं या भविष्य की अंधेरी सुरंग में भटकने के लिए छोड़ देते हैं। ऐसे गीतों का कथ्य परीलोक की कथाओं, तोता-मैना के संवादों, वैयक्तिक अवसाद-रागनियों, दूसरे ग्रहों की अबूझ पहेलियों आदि को समोये हुए प्रतीत होता है। तभी उनमें वर्तमान जीवन-जगत का कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता-  न सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ, न मानसिक प्रवृत्तियॉ और न ही देश-दुनिया की कोई अन्य बात। वहॉ, बस शब्दों का एक जाल रहता है, जिसमें गीत के शिल्प की शर्तों का निर्वहन हुआ तो हुआ, वरना वह भी नहीं। 

कई बार गीत का कथ्य अस्पष्ट, उलझा और जटिल होने से ऐसा बिम्ब बनता है कि उसको समझने के लिए एक अलग आलोचना शास्त्र रचे जाने की आवश्यकता महसूस होने लगती है; वहीं कुछ गीतों का आरंभ एवं समापन लघुकथा की शैली में देखा जा सकता है, जिसको पढ़कर कोई पाठक 'हुंकारी' क्यों लगाना चाहेगा? कभी-कभी तो कथ्य में एकरूपता न होने से गीत न तो गीत ही रह पाता है और न ही वह नई कविता की श्रेणी में रखे जाने की स्थिति में होता है क्योंकि गीत का शिल्प नई कविता के शिल्प से भिन्न होता है। और जो गीतकार शिल्प की भी समझ नही रखते हैं उनके लिए यह संकट दोहरा हो जाता है; क्योंकि छंद का सही ज्ञान न होने पर तुकान्त तो मिलाये जा सकते हैं, किन्तु छन्दानुशासन और प्रवाहमयी भाषा का अभाव होने से गीत में लयात्मकता नहीं आ पाती। इस सन्दर्भ में वरिष्ठ गीतकार श्री वीरेन्द्र 'आस्तिक' कहते हैं -  ''एक तरफ गीत की विरासत का भार, दूसरी तरफ यथार्थग्रही कथ्य की चिन्ता और उसके बाद कविता से विशिष्ट हो पाने की दमतोड़ मेहनत- इन तीन शक्तियों की कदमताल में उसका स्वयं संयमित-अर्जित निखार कभी खुलकर नहीं हँस सका। वह इन्हीं चुनौतियों का सामना करने में सशक्त, अशक्त होता रहा है।''

कुछ गीतों में अखबारी पंक्तियों को 'सैट' कर गीत का 'लुक' दिया जाता है किन्तु उसका कथ्य अधपचा होने से पाठक को वैसी अर्थध्वनि और मिठास महसूस नहीं होती, जिसकी वह अपेक्षा करता है। कई गीत ऐसे भी देखने को मिल जायेंगे, जिनकी सर्जना किसी लोकप्रिय गीत का मुहावरा या धुन चोरी कर की गई हो; और ऐसे गीतों का रचनाकार यह भ्रम पाले रहता है कि पाठक उसकी इस हरकत को समझ नहीं पायेंगे क्योंकि उसके द्वारा की गई शब्दों की हेराफेरी से उसका यह सृजन मौलिक हो गया है। ऐसे गीतों का जब भी मूल्यांकन होता है तो उन पर प्रश्न-चिन्ह लग जाना स्वाभाविक है। 

एक 'ट्रेन्ड' और भी है। वरिष्ठ गीतकार श्री गुलाब सिंह के शब्दों में कहूँ- ''तुम मुझेकहो महान/ मैं तुम्हें कहूँ महान/ चश्मा दो अंगुल का/ अंतहीन आसमान।'' आशय यह कि जो गीत गीत नही है उसे गीत मान लिया जाये और जो गीतकार गीतकार नही है उसे गीतकार मान लिया जाये। या कहें कि एक दूसरे की पीठ थपथपाने की जो परम्परा देखने को मिल रही है उससे भी गीत की आलोचना में अड़चने आ रही हैं। ऐसे में गीतकार एक दूसरे पर 'अच्छा-अच्छा' लिखकर आलोचनाकर्म कर लेते हैं या फिर किसी आलोचक को पकड़कर ठेके पर अपने रचनाकर्म की समालोचना करवा लेते हैं। तब झूठ का ऐसा आवरण निर्मित कर दिया जाता है जिससे पाठक उसमें उलझकर रह जाये। किन्तु झूठ का यह आवरण बहुत दिन तक नहीं रहता। पाठक किसी न किसी दिन सच जान ही लेते हैं। इसलिए मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि ऐसे गीतकार अपनी चलाकियों/फितरतों से बाज  आयें और यदि वे स्वयं ऐसा नहीं कर पाते हैं तो सजग गीतकारों/ आलोचकों का यह दायित्व बनता है कि वे उनको सही रास्ता दिखाएं, बिना  किसी भय और आशंका के। 

इधर गीत को लेकर तमाम फ़तवे भी जारी हुए हैं- 'गीत ब्रह्म है/ गीत महेश/ यही चण्डिका/ यही गणेश' और 'गीत गगन है/ गीत धरा है/ इन्द्रलोक की/ अप्सरा है' आदि। लेकिन सच यह है कि गीत-नवगीत के नाम पर आज जो कुछ परोसा जा रहा है वह कई बार जीवन के वास्तविक धरातल से छिटका हुआ दिखाई पड़ता है। और जहॉ तक शिव एवं ब्रह्म जैसी उपमाओं का प्रश्न है तो यह इस वैज्ञानिक युग में कितना सही है- सोचना पड़ेगा। एक बात और, जन-मन की लय गीत की लय से मिल सकती है, मिलती भी है; वर्तमान में कितनी मिल पा रही है- यह बात भी विचारणीय है। 

गीतकारों की कृतियॉ प्रकाशित होती रहती हैं- हम सभी जानते हैं। लेकिन यह भी सुनने को मिल जाता है कि अभी ऐसी कृति की प्रतीक्षा है जो 'वंशी और मादल' की तरह जनता में हलचल पैदा कर सके। आखिर क्यों? शायद इसलिए कि कम ही ऐसे गीतकार हैं जिनकी कृतियों के दो-तीन से अधिक संस्करण निकल पाये हो। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि गीतकार कितना भ्रम मे जी रहा है और कितना यथार्थ के धरातल पर, जनता तक अपनी पहुँच के सन्दर्भ में । हालांकि यहॉ पर कहा जा सकता है कि हिन्दी साहित्य, विशेषकर हिन्दी गीत-कविता को अभी बाज़ार नही मिला है ''क्योंकि बाजारवाद जहॉ से आ रहा है, वहीं से संस्कृति का आयात हो रहा है, परिणामस्वरूप हमारे जीवन पर आज पश्चिमी संस्कृति ने अपना शिकंजा कस लिया है'' (प्रभाकर श्रोत्रिय जी)। और यह पश्चिमी संस्कृति आयी है पश्चिमी साहित्य के माध्यम से, जोकि ज्यादातर अंग्रेजी भाषा में है इसलिए जब पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव हमारे ऊपर पड़ा, तब अंग्रेजी भाषा को बाज़ार मिलना तय था। यही हुआ भी। अंग्रेजी का बाज़ार बढ़ा, हिन्दी का बाज़ार घटा। परिणामस्वरूप, हिन्दी का कवि-गीतकार जिन्दगीभर खटता रहता है और लुटता रहता है उसका समय, श्रम और सम्पत्ति, जाने-अनजाने।

साथ ही, इंटरनेट पर भी साहित्य पहुंचा। यहॉ विश्वभर में कोई भी, कहीं भी, कभी भी और किसी भी भाषा में साहित्य पढ -लिख सकता है एवं अपनी प्रतिक्रियाएं दे सकता है। इससे साहित्य को व्यापक प्रचार-प्रसार मिला। हिन्दी साहित्य का भी विस्तार हुआ। अनुभूति, अभिव्यक्ति, सृजनगाथा, कविताकोश, रचनाकार, नव्या, खबर इंडिया, साहित्य शिल्पी, हिंद-युग्म, अपनी माटी, पूर्वाभास, गीत-पहल, नवगीत की पाठशाला, नवगीत, आखर कलश,  साखी जैसी तमाम 'वेबसाइट्‌स' और सैकड़ों 'ब्लॉग्स' के माध्यम से हिन्दी साहित्य की पताका विश्वभर में फहरी और बिना किसी शुल्क के यह सुविधा पाठकों को मिली। लेकिन इससे भी गीतकार/ साहित्यकार का अभी तक कोई लाभ नही हुआ। बल्कि पुस्तक की जो प्रतियॉ पहले थोड़ा-बहुत बिक भी जाती थीं और जिसका लाभ अधिकांशतः प्रकाशक को ही मिलता था, उस पर भी प्रभाव पड़ा। इंटरनेट को संचालित करने वाली सॉफ्टवेयर कंपनियों ने भी लाभ उठाया। यानी की जो लाभ पहले केवल प्रकाशक का होता था, उसमें कुछ हिस्सा अब इन कंपनियों को भी मिलने लगा है। 'यूजर्स' (प्रयोक्ताओ) के बढ़ाने से । किन्तु चिन्तनीय यह है कि ये कंपनियॉ साहित्य सेवा में लगे लोगों को अपने लाभ से ढेलाभर भी देने की इच्छुक नहीं लगतीं।

इंटरनेट पर आसानी से छपने की सुविधा होने से तमाम साहित्यकार वहॉ अपना 'स्पेस' बनाने लगे हैं। (प्रिंट मीडिया की कई पत्र-पत्रिकाओं में भी छपने-छपाने की ऐसी सुविधा है, बशर्ते रचनाकार पत्र-पत्रिका की वार्षिक/ आजीवन सदस्यता ले ले और संपादक मण्डल से दोस्ती गांठ ले)। गीत के क्षेत्र में भी यह देखा जा सकता है। इंटरनेट पर अपने अच्छे साहित्य के दम पर कई गीतकवि अपना 'स्पेस' बना भी चुके हैं और कई ऐसे भी है जो तुकबन्दी से आगे की राह नही पकड़ पाये हैं- कथ्य और शिल्प दोनों स्तर पर। हॉ, एक काम जरूर हुआ है- ऐसे तथाकथित रचनाकारों ने गुटबन्दी कर एक दूसरे की रचनाओं पर 'बहुत सुन्दर, बधाई!', 'वाह! भाई, बहुत अच्छा है' जैसे प्रशंसात्मक 'कमेंट्‌स' करने की एक 'स्टाइल' इजाद कर ली है; वही 'स्टाइल' जिसे गुलाब सिंह जी 'चश्मा दो अंगुल का' के रूप में देखते हैं। ऐसे गीतकारों की किसी से तुलना करना तो कठिन है, लेकिन वास्तविक जीवन-जगत से दूर 'ड्राइंग रूम' या 'कैफे' लेखन से जुड़े हुए साहित्यकारों की अगर श्रेणियॉ बनाई जाएं तो उनमें से किसी एक श्रेणी में इन्हें भी रखा जा सकता है। और इनके लिए गुलाब सिंह जी की यह बात भी कही जा सकती है- ''आज के उलझे हुए कठिन और थका देने वाले जीवन का चित्रण चन्दन के पालने पर बैठकर मोरपंख की लेखनी का प्रयोग करने वालों से संभव नहीं है।''

'ड्राइंग रूम' या 'कैफे' लेखन की एक बात और भी है। इस लेखन परम्परा के तमाम साहित्यकारों के पास प्रत्यक्ष अनुभव कम होने के कारण उनका संवेदन-तन्त्र कथ्य के श्रोत से उस गहराई से नहीं जुड़ पाता, जिस गहराई से जनता के बीच रहने वाला साहित्यकार/ गीतकार अपने को जोड़े रखकर कलम चलाता है। इससे पाठक को लग सकता है कि यह सिर्फ शब्दों की जादूगरी है और जादूगर तो अपना हुनर दिखाता है, बदले में 'वाह-वाही' पाता है, श्रोत और श्रोता/ दर्शक से उसे कोई लेना-देना नहीं होता। कविसम्मेलनी मंच से भी जुड़े तमाम श्रोता यही फलसफा मानकर चलते है। यहॉ पर वरिष्ठ गीतकवि श्री सत्यनारायण जी याद आते हैं- ''दिन गए/ वासर गए, बीते महीने/ बरस गुजरे/ ये अंधेरे/ और होते रहे गहरे/ उजालों का भरम/ देते रहे/ सारे टिमटिमाते दिए।'' इस भरम की भनक गीतकार को तो है ही, जनता को भी है। जनता मानकर चलती है- ''ढोल/ ढॉपे पोल बाजे/ बाजने दे'' (दिनेश सिंह जी) - एक तो उपर्युक्त कारण से और दूसरा इसलिए कि अब कई रचनाकारों का आचरण काफी बदल गया है। 

वे आदर्शो/ मूल्यों की बात जिस लय और गति के साथ करते हैं, अब उस तरह का उनका जीवन नही रहा है। यानी वे कहते कुछ हैं, करते कुछ हैं और दूसरों से अपेक्षाएं कुछ और रखते हैं। वरिष्ठ गीतकार डा० शिवबहादुर सिंह भदौरिया भी कहते हैं- ''अब किसको/ किससे नापेंगे/ तोड़ चुके पैमाने लोग।'' ऐसी विडंबनात्मक स्थिति जन-मन में अविश्वास जगाती है और जब किसी के मन मे अविश्वास जाग जाता है तो उसे 'कनविन्स' कर पाना बहुत कठिन होता है। इसलिए सबसे पहले रचनाकार को स्वयं बदलना होगा- ''हम बदलेंगे, जग बदलेगा'' (आचार्य श्रीराम शर्मा) और तब उसकी मधुर सीख का कोई असर जन-मन पर पड़ने की उम्मीद की जा सकती है। इसके लिए कोशिश तो करनी ही होगी- ''खुले नहीं दरवाजा/ तब तक बैठे रहो भगत'' (स्व० नीलम श्रीवास्तव)। 

यहॉ पर सिनेमाई गीतों की चर्चा करना भी समीचीन लगता है। वर्तमान में फिल्मी गीतों में जहॉ कथ्य में हल्कापन, दोअर्थी शब्दों का प्रयोग, सपाटबयानी और संगीत की संगति एवं देह प्रदर्शन के साथ प्रस्तुति से जनता में हलचल पैदा करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन ऐसे गीत लम्बे समय तक टिक नही पाते। पुराने अच्छे फिल्मी गीत (कथ्य और शिल्प के स्तर पर सशक्त) आज भी गाये-गुनगुनाये जाते हैं, जबकि आज के तमाम गीत कुछ समय बाद ही जन-मन और बाज़ार से गायब हो जाते है। और जो गीत टिकाऊ नही होते, बस कुछ समय के लिए बिकाऊ होते हैं, उनसे साहित्य और समाज का भला होता दिखाई नहीं पड़ता। इस फिल्मी फार्मूले को कविसम्मेलनी मंच पर भी आजमाया जा रहा है। इससे साहित्यिक गीत वर्तमान में अपनी ग्राह्‌यता और प्रचार-प्रसार दोनों में पिछड़ रहा है। और यह बात गीतकार भी जानते हैं- 

१.    सुनो! / पत्ते खड़खड़ाये  
    ऑधियॉ आने को हैं। - निर्मल शुक्ल जी
२.    आज तो/ज्वालामुखी पर 
    थरथराते हुए घर हैं। - माहेश्वर तिवारी जी
३.    ऊपर नीचे आग / बीच में
    एक चना है/ उछल रहा। - मधुकर अष्ठाना जी

दिनेश सिंह जी गीत को रागवेशित आवेग की केन्द्रीय अनुगूंज मानते हैं। शायद इससे उनका अभिप्राय रागात्मकता के साथ कथ्य की एकरूपता से है जिसमें छन्द और टेक का आवर्तन नियमों के तहत हुआ हो। कई बार देखने में आता है कि गीत में छन्दानुशासन एवं लयात्मकता तो रहती है किन्तु काव्यत्व का अभाव होता है और यह अभाव गीत को रसहीन बना देता है। ऐसे में शिल्प के साथ कथ्य पर भी ध्यान देना होगा। जहॉ तक छंद की बात है तो वह अलग-अलग रचनाओं में नये-नये फार्म में ढलकर आता रहता है। 

कुल मिलाकर, गीत सही मायने में गीत तभी कहलायेगा जब उसमें छन्दानुशासन, अंर्तवस्तु की एकरूपता, भावप्रवणता, गेयता, एवं सहजता के साथ समकालीनता, वैचारिक पुष्टता और यथार्थ को समावेशित किया गया हो, संतुलन बनाये रखकर। साथ ही, विश्व समाज को ध्यान में रखकर अपने परिवेश और अस्तित्व के प्रति सजग रहते हुए गीतकार को अपनी समझ तो विकसित करनी ही होगी, उसे अपने आचरण को शुद्ध और उद्‌देश्यों को स्पष्ट भी करना होगा, ताकि समाज में वांछित चेतना और परिवर्तन लाया जा सके। और तभी उसके गीत सूचना साहित्य की चौहद्‌दी से आगे जाकर शक्ति (ऊर्जा प्रदायी) साहित्य की सीमा में प्रवेश कर सकेंगे। 
योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


अवनीश सिंह चौहान 

सम्पादक: पूर्वाभास 



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