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मंचन रिपोर्ट:'हिन्द स्वराज' महज़ एक किताब भर नहीं हो सकती है


लखनऊ 
गांधी जी ने स्वराज का सपना देखा था। कैसा होगा यह स्वराज, किन मूल्यों व आदर्शों से पर यह देश चलेगा, गांधीजी ने इसकी वैचारिकी प्रस्तुत की थी। परन्तु आजादी के बाद इस सपने की लगातार हत्या की गई। आजाद हिन्दुस्तान में उनके उत्तराधिकारियों द्वारा उनके विचारों की छुट्टी कर दी गई। अपने राजनीतिक मकसद के लिए गांधी का खूब इस्तेमाल हुआ। उन्हें लेकर राजनीतिक दावेदारी जताई गई। पर उनके विचारों को फैलाने तथा नई पीढ़ी को उससे रू.ब.रू कराने का काम नहीं हुआ। हालत यह है कि गांधीवादियों को आज इस सत्ता और व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ रहा है। उन्हें भी उसी तरह के दमन का सामना करना पड़ रहा है जिस तरह के दमन का मुकाबला गांधी को करना पड़ा था।  

‘हिन्द स्वराज’ गांधीजी की मशहूर कृति है। अभी हाल में इसके सौ साल पूरे हुए। वैसे गांधी का अर्थ ही है ‘हिन्द स्वराज’। यह पाठक व संपादक के बीच संवाद के माध्यम से लिखी विचार प्रधान गद्य रचना है। इसे गांधीजी ने 1909 में इंग्लैंड से दक्षिण अफ्रीका की पानी के जहाज से की गई अपनी यात्रा के दौरान लिखी थी। समुद्र की लहरों पर हिचकोले लेते हुए उनके दिल दिमाग में जो विचार उमड़ घुमड़ रहे थे, उसे इन्होंने इस पुस्तक में व्यक्त किया है। यह मूलरूप में गुजराती में लिखी गई थी। बाद में इसका अनुवाद अंग्रेजी व अन्य भाषाओं में हुआ। इस पुस्तक के प्रकाशन के तत्काल बाद अंग्रेज सरकार द्वारा इसे प्रतिबंधित कर दिया गया था। बाद में अंग्रेज सरकार ने ही 1938 में इस पुस्तक पर से प्रतिबंध समाप्त कर दिया था। यह पुस्तक गांधीजी के ‘स्वराज’ की अवधारणा को सामने लाती है। हमें इसमें गांधी के विचारों का बीज रूप मिलता है। गांधी उस वक्त के सवालों को संबोधित करते हैं जिनमें स्वराज, पार्लयामेण्ट, सम्यता, हिन्दुस्तान के हालात, न्याय व्यवस्था, हिंसा.अहिंसा, मशीन, सत्याग्रह आदि विषयों पर अपने विचार रखते हैं।

गांधी के जीवन पर तथा उनके जीवन से जुड़ी घटनाओं पर फिल्में बनी हैं, नाटक हुए हैं तथा बड़ी संख्या में कहानी, कविता आदि की रचना हुई है। लेकिन उनकी किसी वैचारिक कृति पर आधारित नाटक लिखने का काम नहीं हुआ है। राजेश कुमार विचार प्रधान नाटकों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने हिन्द स्वराज’ का नाट्य रूपान्तर किया है। इसका मंचन उन्हीं के निर्देशन में गांधीजी की पुण्य तिथि 30 जनवरी के दिन  वाल्मीकि रंगशाला, संगीत नाटक अकादमी, लखनऊ में हुआ। 

नाटक में दो पात्र हैं। एक तो स्वयं गांधी है और दूसरा पात्र जिज्ञासू है। दोनों के बीच संवाद होता है। गांधी कहते हैं कि पहले मनुष्य जंगलो में रहता था, आज उसके पास मकान है, कल वह अपना तन जानवरों की खाल से ढ़क लेता था पर आज उसके पास वस्त्र है। तो क्या यह सभ्यता विकास है ? जो सभ्यता मनुष्य के प्रति नफरत फैलाए, उसे शैतानी सभ्यता ही कहेंगे। जिज्ञासू के मन में ब्रिटिश पार्लयामेण्ट के प्रति आदर है। इस बात से उसे गहरी चोट पहुँचती है जब गांधी ब्रिटिश पार्लयामेण्ट को बांझ और वेश्या कहते हैं। गांधी का तर्क है कि यह उसी के लिए काम करती है जो इसे अपने पास रखे। इसी तरह के वाद विवाद शिक्षा, न्याय व्यवस्था, मशीन, रेल, धर्म को लेकर चलता है। गांधी उस शिक्षा व्यवस्था, न्याय प्रणाली, धर्म तथा मशीनीकरण के विरोधी हैं जो मानव जाति के लिए अहितकारी है, जो मात्र लोभ व लाभ के उद्देश्य से संचालित है। स्वराज आजादी को मतलब ऐसी व्यवस्था है जिसका उद्देश्य मानव भलाई हो। धार द्वारा मंचित ‘हिन्द स्वराज’ में गांधी की भूमिका नितिन शर्मा ने निभाई, वहीं जिज्ञासू की भूमिका में आलोक यादव थे।


हिन्द स्वराज का मंचन रंगमंच व नाटक के क्षेत्र में एक नये प्रयोग की तरह है। आमतौर पर रंगमंच पर इस तरह के मंचन हमें देखने को नहीं मिलते। इसलिए हिन्द स्वराज के मंचन को लेकर हमारे अन्दर उत्सुकता थी। इस संदर्भ में हमने नाटककार राजेश कुमार से बात की। उनका कहना था कि आमतौर हम यह मानकर चलते हैं कि विचार का क्षेत्र बड़ा शुष्क व स्थूल है। पर वास्तविकता यह नहीं है। विचार  में भी गति व आवेग होता है। वह किसी कथानक से ज्यादा सुनने वालों को रोमांचित कर सकता है। हमने देखा है कि वैचारिक भाषण हो या व्याख्यान श्रोता पूरे मनोयोग से उसे सुनते हैं, उससे संवेदित होते हैं। फिर ऐसी वैचारिकी को यदि पात्रों  के माध्यम से रंगमंच पर पेश किया जाय तो उसकी संप्रेषणीयता बढ़ जाती है। ‘हिन्द स्वराज’ में तो संपादक और पाठक के रूप में दो पात्र हैं। इन पात्रों के माध्यम से हमने गांधीजी के विचारों को उभारने का प्रयास किया है।

‘हिन्द स्वराज’ पिछली शताब्दी के पहले दशक में लिखी गई थी। इन सौ सालों में देश.दुनिया में बड़े बदलाव आये हैं। ऐसे में हिन्द स्वराज आज के समय में कितना प्रासंगिक हो सकता है ?  इस बारे में राजेश कुमार मानते हैं कि यह ऐसा दौर है जब सबसे ज्यादा संकट विचार के क्षेत्र में आया है। हमारे राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिद्श्य से विचार को गायब किया जा रहा है। उसे महत्वहीन बनाया जा रहा है। आधुनिक रंगमंच में विचारों का संकट साफ देखा जा सकता है। गांधी जी ने ब्रिटिश पार्लयामेण्ट को बांझ व ‘बेसवा’ बताया था। उन्होंने ब्रिटिश सामा्रज्यवादियों द्वारा थोपी जा रही आधुनिक सभ्यता को शैतानी सभ्यता कहा था। उनकी नजर में मैकाले की शिक्षा गुलामी की नींव पर खड़ी थी। क्या आज हालत इससे बदतर नहीं हैं ? भूमंडलीकरण ने जिस तरह हमें अपनी हर जरूरत और सपने के लिए यूरोप और अमेरिका की तरफ देखने के लिए मजबूर किया है, योजनाबद्ध ढंग से कुसंस्कारित किया जा रहा है, विकास के नाम पर जल-जमीन-खनिज को लूटने में लगे हैं, इन सवालों से रंगकर्मी, कलाकार मुँह नहीं मोड़ सकता। जब रंगमंच पर धार्मिक कथाओं के मंचन की प्रवृति बढ़ी है और इसके द्वारा अतीत के पतनशील मूल्यों को प्रतिष्ठित किया जा रहा है, ऐसे में गांधी के ‘हिन्द स्वराज’ हमें वर्तमान को समझने और इसे बदलने की वैचारिक ऊर्जा देता है। वैश्वीकरण के बाजार में खड़ा होकर उसके प्रेतों को ललकारता है, पशुबल के खिलाफ टक्कर लेने के लिए हमारे आत्मबल को जाग्रत करता है। इस अर्थ में हिन्द स्वराज हमारे लिए आज भी प्रासंगिक है।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


जसम की लखनऊ शाखा के जाने माने संयोजक जो बतौर कवि,लेखक लोकप्रिय है.उनका सम्पर्क पता एफ - 3144,राजाजीपुरम,लखनऊ - 226017 है.
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मुलाक़ात विद माणिक


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