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पिछले कुछ दशकों में व्यक्तिवादी सोच बढ़ा है -डॉ. सदाशिव श्रोत्रिय

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, जनवरी 20, 2012 | शुक्रवार, जनवरी 20, 2012

निबंध 
कुछ समय पूर्व अख़बारों में एक ख़बर छपी थी कि किसी आदिवासी क्षेत्र के दौरे पर गए एक मंत्रीजी ने निरक्षरता निवारण कार्यक्रम में उस क्षेत्र के एक लोकप्रिय सामाजिक कार्यकर्ता  के नाम का एक नारे में उपयोग किए जाने पर आपत्ति की थी और साथ ही यह सुझाव दिया था कि नारे में किसी नाम का उपयोग यदि आवश्यक हो तो एक अन्य राजनेता का नाम प्रयोग किया जाए। स्पष्ट है कि मंत्रीजी का ध्यान आपत्ति करते समय निरक्षरता निवारण कार्यक्रम की सफलता से अधिक इस बात पर था कि उसका श्रेय अंततः किसे मिलता है। 

लगता है हमारे यहां काम से अधिक काम द्वारा कमाए जा सकने वाले नाम फ़िक्र की इस प्रवृत्ति में निरन्तर वृद्धि हो रही है। स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान अनेक ऐसे लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी जिनका नाम आज शायद किसी को मालूम नहीं। किसी बड़े उद्देश्य के लिए अब तक अनेक लोगों  ने गुमनाम रह कर काम किया, राष्ट्र निर्माण के कार्य में अनेक अज्ञात लोग नींव के पत्थर बन गए, बड़े-बड़े आयोजनों की सफलता के लिए अनेक लोगों ने स्वेच्छा से पर्दे के पीछे रहना स्वीकार किया, अपने परिवार या समाज की बेहतरी और तरक्की के लिए कइयों ने अपना समूचा जीवन उत्सर्ग कर दिया और किसी से यह शिकायत नहीं की कि उनका नाम कहीं दर्ज़ नहीं किया गया। उन लोगों के लिए यही सोच पर्याप्त था कि किसी बड़ी इकाई की सफलता में उनका भी योगदान रहा। जिस मोर्चे पर उन्हें नियुक्त किया गया वहीं रह कर उन्होंने निष्ठापूर्वक अपने कर्त्तव्य का पालन किया और इस बात का कोई शिकवा नहीं किया कि उनका जीवन गुमनामी में ही बीत गया।

   पर लगता है आत्मोत्सर्ग की उस प्रवृत्ति में अब जबरदस्त परिवर्तन आ गया है। पिछले कुछ दशकों में व्यक्तिवादी सोच बढ़ा है और किसी व्यापक उद्देश्य या बड़ी संस्था के लिए अपनी वैयक्तिकता को भुला देने की वृत्ति का क्षरण हुआ है। सौंपे हुए काम को निष्ठापूर्वक करने और एक समूचे तंत्र की सफलता में अपनी आंशिक भूमिका के उत्तरदायित्वपूर्ण निर्वाह में आत्मसंतोष अनुभव करने के बजाय व्यक्ति अब पहले यह  प्रश्न करता है कि उस काम को करने से व्यक्तिगत रूप से उसे क्या लाभ मिलेगा। उनके काम से एक समूचे तंत्र के पुष्ट होने तथा उस तंत्र के स्वस्थ व सक्षम रहने की बात अब सामान्यतः लोगों की समझ में ही नहीं आती। अपने तमाम क्रियाकलापों व प्रयत्नों का लाभ राष्ट्र, समाज या संस्था जैसी किसी सामूहिक इकाई को देने के बजाय व्यक्ति अब उनका लक्ष्य स्वयं को ही बनाना चाहता है। 

स्वार्थपरता इस कदर बढ़ रही है कि व्यक्ति अब अपने लिए संस्था, समूह, समाज या राष्ट्र को बेचने, उसके साथ विश्वासघात करने या उसे हानि पहुंचाने में भी नहीं हिचकिचाता। सार्वजनिक सुन्दरता पर भी अब व्यक्ति निजी स्वामित्व कायम कर लेने की इच्छा रखता है। सार्वजनिक उद्यान को उजड़ने के लिए छोड़कर वह अपने निजी उद्यान को हरा-भरा रखने की कोशिश करता है, संग्रहालयों से मूर्तियां चुराकर उन्हें अपने ड्राइंगरूम में सजा लेने को इच्छुक रहता है, नगर के सार्वजनिक चिकित्सा या शिक्षा तंत्र को स्वस्थ व सक्षम बनाए रखने के बजाय वह केवल अपने व अपने लघु परिवार के लिए सर्वोत्कृष्ट इलाज व शिक्षा के साधन जुटा लेना चाहता है। आए दिन हम देखते हैं कि हमारे यहां हर समर्थ व्यक्ति अपने बच्चों को विशिष्ट शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाता है। शिक्षा के व्यापक राष्ट्रीय तंत्र में अपने आपको भी हिस्सेदार मानने के बजाय अब न केवल ग़ैर सरकारी बल्कि सरकारी शिक्षण संस्थाएं भी अपनी निजी शैक्षणिक उपलब्धियों को बढ़ा चढ़ाकर दिखाने की चेष्टा करती हैं।

व्यक्ति कभी भी संस्था, समाज या राष्ट्र का पर्याय नहीं हो सकता। अपने आपको किसी सामूहिक इकाई जितना विराट व महत्त्वपूर्ण दिखलाने की चेष्टा करने वाला व्यक्ति केवल छल या कुटिलता द्वारा ही वैसा कर सकता है। हमें इस कथा की सांकेतिकता पर विचार करना चाहिए कि फाउस्ट ने जब अति मानवीय शक्ति हासिल करना चाहा तो वह अपनी आत्मा को शैतान के हाथों बेचकर ही वैसा कर सका था। केवल नाम की चिन्ता करने वाला व्यक्ति अक्सर औरों की उपलब्धियों को भी अपने ही खाते में डलवाने की चेष्टा करता है और वास्तविक कार्यकर्ताओं को उनके हिस्से के पुरस्कारों व प्रशंसाओं से वंचित करता है। जिन संस्थाओं की उसे गहरी समझ नहीं होती उनका अध्यक्ष और जिन समारोहों से उसका कोई सम्बन्ध नहीं होता उनका मुख्य अतिथि बन कर उनमें हास्यास्पद या दूसरों के लिखे भाषण पढ़ने में भी उसे कोई शर्म महसूस नहीं होती। ऐसा व्यक्ति जब उच्च पद पर आसीन हो जाता है तो कई चालाक लोग उसे काम के बजाय नाम से ही ख़ुश करना शुरू कर देते हैं। अखबारों में आजकल हम आए दिन कितने लोगों के अभिनन्दन विज्ञापन देखते हैं। मीडिया वाले उच्च पदासीन ऐसे व्यक्ति को बराबर सुखिऱ्यों में रखते हैं और यह व्यक्ति भी उन्हीं कामों को प्राथमिकता देता है जिनमें सुखिऱ्यों का विषय बनने की क्षमता हो।

महत्त्वपूर्ण किन्तु लम्बी साधना द्वारा चुपचाप किए जाने वाले कामों के बजाय धमाकेदार और तुरन्त ध्यान खींचने वाले काम ऐसे लोगों को अधिक प्रिय होते हैं। उनके लिए काम की गुणवत्ता के बजाय आंकड़ों की विपुलता अधिक मायने रखती है। हम देखते हैं कि आजकल कई युवाओं की रुचि ज्ञान से अधिक डिग्री में होती है और उनमें से अधिकांश व्यक्तियों का ध्यान उनके द्वारा किए जाने वाले काम की उत्कृष्टता के बजाय प्रमाण पत्रों या फोटुओं आदि पर होता है। 

केवल नाम का इस तरह का लोभ किसी भी तरह के काम को ठोस अंतर्वस्तु से शून्य कर देता है। ऐसे कामों की योजनाएं या तो मात्र औपचारिकताएं बन कर रह जाती हैं या फिर उनकी केवल सनसनीखेज शुरूआतें होती हैं किन्तु उन पर सतत व गम्भीर अमल नहीं होता। इन कामों द्वारा होने वाली प्रगति आंकड़ों में अधिक होती है, वास्तविकता में कम। ज्ञान या हुनर के क्षेत्र में इस तरह का काम करने वाले लोगों के पास डिग्रियां व तमगे तो होते हैं पर वास्तविक ज्ञान या कौशल नहीं होता। ऐसे काम करने वाले लोग अख़बारों या दूरदर्शन पर चर्चा से, बधाइयों और पुरस्कारों से संतुष्ट हो जाते हैं किन्तु वे अपने काम के वास्तविक उद्देश्यों और लक्ष्यों को ठीक से देख नहीं पाते। वे नवीनतम आविष्कारों व चौंकाने वाली ख़बरों को महत्त्व देते हैं, जीवन की धारक प्रक्रियाओं व शाश्वत सत्यों को कम महत्त्वपूर्ण मान उनकी उपेक्षा कर देते हैं।

   नाम को महत्त्व देने वाले लोग अक्सर काम से पहले इस बात का भी हिसाब लगाते हैं कि उनका किया हुआ काम किसके खाते में जाएगा। इसके बाद वे कई बार इस बात की गणना करने की भी कोशिश करते हैं कि जिसके खाते में वह जाएगा वह उनके कितना करीब या उनसे कितना दूर है। जिसके खाते में उस काम का श्रेय जाएगा उसका नाम यदि उनके मित्रों या निकटवर्तियों की सूची में न हुआ तो वे उस काम में सहयोग के लिए कतई तैयार नहीं होते फिर चाहे वह काम सर्वसाधारण के लिए कितना ही महत्त्वपूर्ण या कल्याणकारी क्यों न हो। काम को अपने ही खाते में डालने की यह प्रवृत्ति समानधर्मा लोगों में भी आपसी सहयोग केे स्थान पर प्रतिद्वंद्विता उत्पन्न कर देती है। इस प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित व्यक्ति अपने ही जैसा कार्य करने वाले को अपने से कम महत्त्वपूर्ण साबित करने की चेष्टा करने लगता है। साहित्य व राजनीति में इस तरह की प्रतिद्वंद्विता खेमेबाजी या दलबाजी में बदलने लगती है, जिससे लोग उनके चरम लक्ष्यों को नज़रअंदाज़ करके केवल अपने-अपने मार्गों को सही साबित करने की चेष्टा में अपनी शक्तियों का अपव्यय करने लगते हैं। साहित्य साधना द्वारा या सामाजिक प्रतिबद्धता से संयुक्त राजनीति द्वारा मानव कल्याण की चेष्टा के बजाय उनमें केवल इस बात को लेकर परस्पर युद्ध छिड़ जाता है कि उनके बताए गए मार्ग को ही सही मार्ग माना जाए। 

काम से बढ़कर नाम को महत्त्व देने की इस प्रवृत्ति में वृद्धि के कारणों का सतही विश्लेषण करने पर हमें लग सकता है कि बढ़ती हुई जनसंख्या व उपलब्ध साधनों में कमी की वजह से ही व्यक्ति आज सबके लिए समृद्धि व कल्याण की बात सोचने के बजाय स्वार्थी बनकर केवल अपनी उन्नति चाहने लगता है। मानव मात्र के लिए सुख व सुन्दरता को असम्भव मान लेने से ही वह सम्भवतः केवल अपनी स्वयं की दुनिया को आरामदेह व सुन्दर बना लेना चाहता है। पर हम थोड़ा और गहराई से इस प्रवृत्ति का विश्लेषण करें तो हम देखेंगे कि एक भौतिकवादी सभ्यता के विकास के साथ-साथ जनमानस में अनेक अमूर्त किन्तु व्यापक अवधारणाओं का भी निरन्तर ह्रास होता गया है। पहले लोग अपने परिवार, सम्बन्धियों, संस्था, समाज, भाषा, राष्ट्र आदि के साथ जिस तरह का भावनात्मक लगाव अनुभव करते थे उस तरह का लगाव अब उनके दिलों से गायब होता जा रहा है। उदाहरणार्थ ‘एल्मा मेटर‘ या मातृ संस्था का जो भाव छात्र पहले अपनी शिक्षण संस्था  के प्रति अनुभव करता था वह जैसे अब तिरोहित ही हो गया है। मानवीय करुणा के व्यापक भाव से विच्छिन्न हो जाने के कारण अधिकांश लोग आज अधिकाधिक हिंसा के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। जो भावनात्मक आवेग व्यक्ति कई व्यापक सामूहिक अवधारणाओं के लिए अनुभव करता था वह अब कई भौतिक वस्तुओं के प्रति स्थानांतरित हो गया है। अपने द्वारा क्रय की गई मशीनों की पूजा या वाहनों के बारे में कई प्रकार के रागात्मक विशेषणों का प्रयोग इस बात का प्रमाण है कि कई लोग अब सजीव की तुलना में निर्जीव वस्तुओं को अधिक महत्त्व देने लगे हैं। जो अमूर्त है उसके महत्त्वपूर्ण और मूल्यवान होने के बावजूद उसे अनुभव कर पाने की क्षमता में अब कमी आती जा रही है। 

सामूहिक, बड़ी व व्यापक किन्तु अमूर्त अवधारणाओं के प्रति भावनात्मक लगाव की इस  अनुपस्थिति एवं अपेक्षाकृत छोटी, निजी व भौतिक वस्तुओं के प्रति इस प्रकार के लगाव से हमारे राष्ट्रीय, सामाजिक व पारिवारिक सोच के स्तर में भी गिरावट आ गई है। अब हम खंडित व आत्मकेन्द्रित ढंग से उपलब्धियों की कल्पना करते हैं किन्तु एक पूरे समूह की प्रगति के संबंध में नहीं सोच पाते। लोग अब देश से पहले राज्य, नगर से पहले घर और परिवार से पहले अपनी व्यक्तिगत खुशहाली के बारे में सोचते हैं। विश्वबन्धुत्व या मानवमात्र के कल्याण की हमारी एक प्रमुख सांस्कृतिक परम्परा से हम अब जैसे कटने लगे हैं। 

व्यापक अवधारणाओं की कल्पना व उनके प्रति भावनात्मक लगाव का अभाव व्यक्ति को स्वार्थी बनाने के साथ-साथ एक तरह से अल्पजीवी भी बनाता है। जो केवल अपने ही लिए जीता है वह अपनी मृत्यु को जगप्रलय के रूप में देखता है जबकि किसी बड़ी इकाई या व्यापक उद्देश्य के लिए आत्मोत्सर्ग करने वाला व्यक्ति अपने जीवन को एक बड़ी शृंखला में एक कड़ी मात्र समझता है। यदि आज़ादी की एक विशिष्ट भावनात्मक अवधारणा हमारे यहां विकसित न हुई होती तो शायद इस देश के अनेक सपूत उसके लिए अपने आपको बलिदान ही नहीं कर पाते और हम आज भी ग़ुलाम ही होते। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अनेक कारणों से व्यक्तिगत उत्सर्ग के भाव का धीरे-धीरे लुप्त हो जाना न केवल हमारी अनेक वर्तमान समस्याओं के लिए ज़िम्मेदार है बल्कि इस देश के भविष्य के लिए भी अत्यन्त घातक है। उदाहरणार्थ यदि हम राष्ट्र भाषा की  समस्या को ही लें तो हम देखेंगे कि गांधी के नेतृत्व में किए जा रहे स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान इस समूचे देश के लोग अपनी प्रान्तीय समस्याओं के भेद को भुलाकर हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में विकसित करने  के लिए गहरी रुचि व उत्साह प्रदर्शित करने लगे थे। किन्तु बाद में राष्ट्र भाषा के प्रति इस अनुराग को धीरे-धीरे लोप होता गया और लोग अपनी प्रांतीय उपभाषाओं तक के लिए विशिष्ट स्थान की मांग करने लगे। यह इसी संकुचित दृष्टि व व्यापक उद्देश्य के अभाव का परिणाम है कि हम इतने वर्षों में भी अपने लिए एक समर्थ राष्ट्रभाषा का समुचित विकास नहीं कर पाए हैं और अंग्रेज़ी इस देश में अपना वर्चस्व यथावत् बनाए हुए है। 

   जनसंख्या वृद्धि के कारण भविष्य में समूचे देश के सम्मुख आ सकने वाले संकट की तथा उससे उत्पन्न विकराल परिस्थितियों की समुचित कल्पना न कर पाने के कारण ही हम आज भी अपने पारिवारिक जीवन को उसी पुराने ढर्रे से देखने के आदी हैं जिस पर वह आज से एक शताब्दी पूर्व चल रहा था। जनतंत्र के प्रति लोगों के मन में किसी गहरे सम्मान का अभाव हमारी समूची चुनाव प्रक्रिया को एक शत्रुतापूर्ण युद्ध में तब्दील करता जा रहा है जिसमें हिंसा, अनुशासनहीनता व अनाचार को रोकने के लिए चुनाव आयोग द्वारा अनेकानेक कानूनी परिवर्तन आवश्यक होते जा रहे हैं। जिन उपलब्धियों के लिए लम्बी साधना, तपस्या व त्याग की आवश्यकता होती  है उनके प्रति लोगों की रुचि में निरन्तर कमी आती जा रही है और परिणामस्वरूप कई मूल्यवान मानवीय अनुभव अधिकांश लोगों की समझ से बाहर होते जा रहे हैं। आज कई डॉक्टर उस भारी फीस की कल्पना तो कर पाते हैं जो उन्हें अपने मरीज़ों से मिल सकती है और जिसकी एवज़ में वे किसी नई कार या आलीशान मकान जैसी कोई भौतिक वस्तु खरीद सकते हैं किन्तु वे उस आत्मसन्तोष की कल्पना नहीं कर पाते जो उन्हें किसी कष्ट पा रहे रोगी को राहत दिलवाकर उसके मन से निकलने वाली  दुआ  या उसके कृतज्ञता भाव द्वारा प्राप्त हो सकता है। इसी तरह जो अध्यापक छात्रों से केवल ट्यूशन की अधिकाधिक फीस वसूल करने के चक्कर में पड़ा रहता है वह उनकी आंखों में दिखाई पड़ सकने वाली ज्ञान व श्रद्धा की चमक से सदैव वंचित रहता है। पूरे राष्ट्र को एक ही सूत्र में पिरोकर कई लोगों की बौद्धिक ऊर्जा और ज्ञान को समूचे राष्ट्र की उन्नति में लगा सकने में समर्थ एक भाषा की कल्पना राष्ट्र और राष्ट्रभाषा के प्रति लगाव से शून्य लोग नहीं कर सकते। ज्ञान की गहनता से, उसमें गहरी पैठ से, शास्त्रीय संगीत से, गूढ़ काव्य, दार्शनिक चिन्तन और गंभीर साहित्य से हासिल हो सकने वाले विशिष्ट आनंद की अनुभूति से वे लोग वंचित होते जा रहे हैं जो उपलब्धि का अर्थ केवल धन-व्यय की सामर्थ्य अथवा सत्ता का अधिक इस्तेमाल समझते हैं। 

परिवर्तन को अब अधिकांश लोग शाश्वत सत्य के रूप में स्वीकार करने लगे हैं और दूसरों के लिए, अगली पीढ़ी के लिए कुछ छोड़ जाने की उस इच्छा में, जो कि मानव सभ्यता के विकास के सदैव मूल में रही है, लगातार कमी आती जा रही है। क्या इसका अर्थ यह नहीं कि मानव अब अपने आपको अपने उस विराट स्वरूप की कल्पना से विच्छिन्न पाता है जो केवल सामूहिकता भाव द्वारा संभव है। अपनी शाश्वतता और दीर्घायु की कल्पना तो मानव उस विराट पुरुष के एक अंग के रूप में ही कर सकता है जिसका वर्णन हमें पुरुष-सूक्त जैसे वैदिक काव्य में मिलता है। उस व्यापक कल्पना से शून्य होना मानव जीवन की सम्पन्नता में कमी का ही द्योतक हो सकता है। मानव का वैसा करना उसे प्राणियों में विशिष्ट बनाने के बजाय पुनः एक साधारण जीव की श्रेणी में ला खड़ा करने की चेष्टा जैसा है। 

आत्मकेन्द्रिता में वृद्धि के साथ-साथ हमारे यहां सार्वजनिक कल्याण, सबके लिए समान शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, सबकी समृद्धि, सबके सुख जैसी व्यापक अवधारणाओं को केवल आदर्शवादी समझकर व्यावहारिक स्तर पर नकारा जाने लगा है। हर व्यक्ति अब अपने आपको किसी बड़े युद्ध में मोर्चे पर डटा एक साधारण  सिपाही समझनेे के बजाय सारी दुनिया के केन्द्र के रूप में देखता है। किसी बड़े तंत्र के मुताबिक अपने आपको ढालने की चेष्टा करने के बजाय आज वह उस समूचे तंत्र को ही अपनी इच्छा व  ज़रूरत के मुताबिक ढाल लेना चाहता है। चूंकि व्यक्ति व तंत्र की प्रकृति मूलतः भिन्न है, उसकी इस प्रकार की चेष्टा तंत्र को केवल विकृत, छोटा और कमज़ोर बनाती है। 

अनेक आत्मकेन्द्रित व्यक्तियों के समूह से हम कभी भी किसी बड़ी उपलब्धि की आशा नहीं कर सकते क्योंकि शक्तिशाली तो केवल कोई राष्ट्र पुरुष ही हो सकता है। किसी अकेले व्यक्ति की उपलब्धि किसी राष्ट्र की सामूहिक उपलब्धि जितनी महान् नहीं हो सकती। व्यक्ति सर्वज्ञ या सर्वशक्तिमान होने का केवल ढोंग कर सकता है, वास्तविकता में वह कदापि वैसा नहीं हो सकता। संस्था अथवा राष्ट्र तभी प्रगति कर सकते हैं जबकि व्यक्ति को उनके एक साधारण किन्तु आवश्यक पुर्जे़ के रूप में देखा जाए। तंत्र के प्रति समर्पित होकर ही व्यक्ति उसे सशक्त बनाने के साथ-साथ स्वयं भी अधिक शक्तिशाली बनता है। अपनी निजी शक्ति किसी सामाजिक इकाई को देकर ही व्यक्ति किसी सामूहिक इकाई की शक्ति में हिस्सेदार बन सकता है।

    किसी वृहत्तर इकाई के अंग के रूप में अपनी कल्पना से शून्य व्यक्ति हर समय उसके शीर्ष स्थान पर रहने को लालायित रहता है। यह प्रवृत्ति अक्सर ‘तू भी रानी मैं भी रानी, कौन भरेगा पानी‘ वाली मानसिकता व स्थिति को जन्म देकर काम की प्रगति में रुकावट उत्पन्न करती है। समष्टि के  लिए व्यष्टि के उत्सर्ग भाव का अभाव कामों को  छोटे-बड़े या महत्त्वपूर्ण-अमहत्त्वपूर्ण समझनेे की प्रवृत्ति का जन्मदाता है जबकि बड़ी उपलब्धियों के संदर्भ में वस्तुतः कोई भी काम छोटा या कम महत्त्वपूर्ण नहीं कहा जा सकता। नाम या प्रसिद्धि को मिल्टन ने एक जगह श्रेष्ठ जनों की अंतिम कमज़ोरी कहा है क्योंकि अन्य उपलब्धियों का लाभ छोड़ने वाले कई अच्छे लोग भी नाम का लोभ नहीं छोड़ पाते। किन्तु वास्तविकता यह है कि काम को प्रमुख मानकर उसकी सफलता के लिए निरन्तर प्रयासरत रहने वालों का ही अंततः नाम  होता है। प्रगति तभी संभव है जबकि हम जनमानस में काम की तुलना में नाम को कम महत्त्वपूर्ण मानने की प्रवृत्ति उत्पन्न करें। जब लोग केवल काम को लक्ष्य बनाकर इस बात की परवाह करना छोड़ेंगे कि नाम किसका होता है तभी हमारा देश सर्वांगीण प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होगा। हमारी आज़ादी के बाद गांधीजी ने उसकी लड़ाई में भाग लेने वाले लोगों को सत्ता व नाम से दूर रह कर काम करने की जो सलाह दी थी उसकी उपेक्षा के कारण उनकी रचनात्मकता में धीरे-धीरे कमी आ गई। वे इस मूल सत्य को नज़रअंदाज़ कर गए कि बीज के लोप से ही वृक्ष का उगना संभव होता है। 

समानता, जनकल्याण या प्रगति जैसी अमूर्त अवधारणाओं तथा राष्ट्र या समाज जैसी बड़ी इकाइयों की कल्पना कर उनके लिए स्वयं को उत्सर्ग करके ही हम अपने देश को आगे ले जा सकेंगे। हम जब तक जनतंत्र के व्यापक आदर्श की कल्पना द्वारा अपने चुनावों को मैत्रीपूर्ण न बना लें तब तक हम कभी जनतंत्र के सच्चे अधिकारी नहीं हो सकेंगे। विराट की जो कल्पना सामूहिकता में की जा सकती है उसका व्यक्तिवादी सोच के दायरे में समा पाना असंभव है। राष्ट्रोन्नति जैसे बड़े स्वप्न को साकार करने के लिए हमें लोगों को उनके व्यक्तिवादी सोच के दायरे से बाहर लाना होगा। यह लक्ष्य उनमें कुछ लेने के बजाय कुछ देने की तथा भोग के बजाय आत्मोत्सर्ग की प्रवृत्ति उत्पन्न करके एवं उन्हें उच्चतर व सूक्ष्मतर मानवीय संवेदनाओं के अनुभव में समर्थ बनाकर ही प्राप्त किया जा सकता है।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

डॉ.सदाशिव श्रोत्रिय
नई हवेली,नाथद्वारा,राजस्थान,मो.08290479063,ई-मेल
(स्पिक मैके,राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहे डॉ. श्रोत्रिय हिंदी और अंग्रेजी में सामान रूप से लिखने वाले लेखक हैं.ये निबंध उनके हालिया प्रकाशित  निबंध संग्रह 'मूल्य संक्रमण के दौर में' से साभार लिया गया किया है,जो मूल रूप से      रचनाकाल: जुलाई, 1998   में प्रकाशित हुआ था. ये संग्रह प्राप्त करने हेतु बोधि प्रकाशन से यहाँ mayamrig@gmail.com संपर्क कर सकते हैं. )
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