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इर्द-गिर्द घूमते हैं वे सपने:अच्छा जॉब,पढ़ी लिखी बीवी,मोटा पैकेज,सुसज्जित घर

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शनिवार, जनवरी 28, 2012 | शनिवार, जनवरी 28, 2012


 कल दो मित्र मिलने-चर्चा करने आए. दोनों, नौजवान. वर्तमान से असंतुष्ट, हमारे-जैसे बहुतों की तरह. पर फिर भी काफ़ी अलग. इस मायने में कि वे सिर्फ़ हालात के कारणों और उनके विश्लेषण से संतुष्ट नहीं. ऐसा नहीं कि वे इस काम को गैर-ज़रूरी मानते हों. क़तई नहीं. हां, वे इसे नाकाफ़ी मानते हैं. एक बड़े दार्शनिक पहले ही कह चुके हैं इस बात को, तो वे कोई मौलिकता का दावा करते हुए अपना आग्रह सामने नहीं रख रहे थे. वे महज़ अपने पक्ष को पूरी तरह रखने के लिहाज़ से इस बात को रेखांकित कर रहे थे. नौजवानों के मुंह से यह सुनना बहुत प्रीतिकर लगा कि ज़रूरत तो हालात को बदलने की है, ख़ासकर इसलिए भी कि आजकल इस बात पर नौजवानों का कोई ख़ास ज़ोर दिखाई नहीं पड़ता. इस आयु-समूह के लोग चीज़ों को बदलने के सपने तो देखते हैं पर उस "देखने" का ताल्लुक अधिकांशतः दूसरी किस्म के "सपनों" से होता है. सपने जिनका संबंध पूरे समाज से होकर सिर्फ़ खुद की जीवनशैली के बेहतर बन जाने के साथ होता है : बेहतर जॉब, मोटा पैकेज, खुद का अधिक सुविधाओं से सुसज्जित घर, पढ़ी-लिखी अच्छा जॉब करती बीवी -- इनके इर्द-गिर्द घूमते हैं वे सपने. ज़्यादातर. सो इन नौजवानों से मिलना मुझे ताज़ा हवा के "मन-खुश-कर देने-वाले झोंके" की तरह लगा. यों तो नई पीढ़ी के और भी लोग आते रहते हैं, मेरे पास, पर उनका मक़सद अपने निजी हितों से इतर कुछ नहीं होता.


इनमें से एक अनुवादक हैं, और दूसरे पत्रकार. अच्छा लगा जानकर कि इन दोनों ने पढ़-लिख खूब रखा है. सफल जीवन के लिहाज़ से चाहे नहीं, पर निस्संदेह बहुत कुछ ऐसा जो जीवन को सार्थक बना सकता है, उसे मायने-मतलब दे सकता है. अर्थपूर्ण बना सकता है. "अर्थपूर्ण" पैसे-धेले के अर्थ में नहीं, बल्कि बड़े-व्यापक अर्थों में.

बातचीत एकदम औपचारिक तरीक़े से शुरू हुई : "क्या लिख-पढ़ रहे हो" की तर्ज़ पर. पांच-सात वाक्यों के आदान-प्रदान के बाद अपनेआप ही चर्चा अनौपचारिक रूप अख्तियार करती चली गई. और यहीं से चर्चा में रस-संचार होने लगा. यह बड़ा शहर है, और यहां पढ़े-लिखे "ज्ञानी" लोगों की कोई कमी नहीं है. फिर भी बाहर से आकर बसने वाले को जो सबसे ज़्यादा हतोत्साहित करने वाली चीज़ यहां आते ही अखरने लगती है वह है "बौद्धिक ऊर्जा" का निपट अभाव. ऐसा नहीं कि लोग आपस में मिलते-जुलते नहीं, पर उस सबके चलते भी जो विशिष्टता (यदि उसे विशिष्टता कह सकते हों तो) यहां की साफ़ दिख जाती है, वह है एक तरह का "सतहीपन". दिलचस्पियों का, संवाद का, रिश्तों का भी - ऐसा कि पहली बार तो धोखा दे जाए, पर उसके बाद किसी तरह के भरम को असंभव बना दे जो. ये दोनों मित्र  दुनियाभर के कम्युनिस्ट आंदोलनों के इतिहास का सघन अध्ययन कर चुके हैं.

समूह के भीतर अभी भी अध्ययन से अर्जित निष्कर्षों पर चर्चा करते रहते हैं. यह समूह-चर्चा वाला पक्ष मुझे गुज़रे ज़माने के उजले पक्षों की याद दिला जाता है, जब स्टडी सर्किल हुआ करते थे, जहां पढ़ने के साथ-साथ पढ़े हुए को औरों के साथ बांटने पर ज़ोर हुआ करता था. "पढ़े हुए" को कितना समझ लिया गया इसकी पहचान हो जाती थी, साथ ही इस बात भी कि आप "पढ़े और समझे हुए" को कितना संप्रेषित कर पाते हैं औरों को. यह वो ज़माना था जब किताबें इतनी इफ़रात में उपलब्ध नहीं हुआ करती थीं. विडंबना देखिए जब किताबें जम के उपलब्ध होने लगीं तो "पढ़ना" एकदम निजी और एकांतिक क्रिया बनती चली गई. तो मुझे जानकर बहुत अच्छा लगा कि चाहे सिर्फ़ मुट्ठी भर लोग हों, पर हैं अभी भी जो पढ़कर, "पढ़े हुए" पर चर्चा को पढ़ने की क्रिया का ही एक अनुपूरक हिस्सा मानते हैं. यहां अचानक खयाल आया कि अरबी भाषा में एक शब्द है "मश्शाईन" जिसका अर्थ है विद्वानों का वह संप्रदाय जो एक दूसरे के पास जाकर पठन-पाठन में संलग्न होते थे, इसके बरखिलाफ़ "इशाक़ीन" थे जो निजी स्तर पर पठन-पाठन कर्म में संलग्न होते थे. कहना ना होगा कि "मश्शाईन" पठन-पाठन को एक अधिक अर्थपूर्ण सामूहिक क्रिया में तब्दील कर देते थे.

मुझे एक बात जो ख़ास लगी इन मित्रों में वह थी इनकी अति संवेदनशीलता और साथ ही इनकी सजग बौद्धिकता. बिना संवेदनशील हुए कोई भी उन प्रश्नों में सिर नहीं खपाता जो इन्हें मथ रहे हैं, और बिना सजग बौद्धिकता के कोई उस तरह तर्क नहीं कर पाता, जिस तरह ये कर रहे थे. पूरा ध्यान केंद्रित हो जैसे उन दरारों पर जहां से बात को आगे बढ़ाने के सूत्र पकड़े जा सकते हैं. इनका मक़सद सुनना भर नहीं था, सुनाना भी था और साथ भी यह आकलन करना भी कि इनकी जो समझ बनी है, पढ़कर और यहां-वहां जन संघर्षों से जुड़ कर वह कितने दूर तक इन्हें ले जा सकती है, सही रास्ते पर. बिना भटकाए. ज़ाहिर है, तो रास्ता साफ़ है, मंज़िल क़रीब, पर वो जज़्बा है जो झाड़-झंकाड़ को विचलन अथवा हताशा का सबब नहीं बनने देता. यह आश्वस्तिकारक है, बुरे वक़्त में, ख़ास तौर पर.

सफलता के पीछे भागने वालों की तुलना में ऐसे लोग यदि मुझे अधिक आकृष्ट करते हैं तो इसके पीछे कहीं यह तथ्य भी होगा ही कि ज़िंदगी के श्रेष्ठतम चालीस से अधिक वर्ष मैंने भी एक सपने के पीछे भागने में लगाए थे, विभिन्न पेशों से जुड़े अनेक लोगों को उस सपने को साझा सपना समझने के किए प्रेरित-शिक्षित-प्रशिक्षित करने का काम हाथ में लिया था. यह अलग बात है कि तेज़ी से बदलते समय, वैश्विक यथार्थ और साझे सपने को निजी सपने द्वारा विस्थापित कर दिए जाने के घटनाक्रम ने इन प्रयत्नों को तगड़ा झटका दिया. तात्कालिक विफलता आपके मार्ग-दिशा-चयन को ग़लत साबित नहीं कर देती, यह याद रखने और अपनी ज़िद पर क़ायम रहने की ज़रूरत भी बनी रहनी चाहिए. इन मित्रों से मिलकर लगा कि कहीं तो आग बची हुई है, राख की परतों के नीचे. यही ख़ास बात है.


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


मोहन श्रोत्रिय
(जे.एन.यूं. में पढ़े,कोलेज शिक्षा से सेवानिवृति,प्रखर वक्ता और लेखक ,चर्चित त्रैमासिक 'क्‍यों' का संपादन - स्‍वयंप्रकाश के साथ किया,राजस्‍थान एवं अखिल भारतीय शिक्षक आंदोलन में अग्रणी भूमिका रही,लगभग 18 किताबों का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद. लगभग 40 किताबों के अनुवाद का संपादन.जल एवं वन संरक्षण पर 6 पुस्तिकाएं हिंदी में/2 अंग्रेज़ी में. अनेक कविताओं, कुछ कहानियों तथा लेखों के अनुवाद पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित.)


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