त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कुण्डलियाँ - अपनी माटी

नवीनतम रचना

मंगलवार, जनवरी 03, 2012

त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कुण्डलियाँ


चलते चलते एक दिन , तट पर लगती नाव।
मिल जाता है सब उसे , हो जिसके मन चाव।।
हो जिसके मन चाव, कोशिश सफल करातीं।।
लगे रहो अनवरत, सभी निधि दौड़ी आतीं।।
‘ठकुरेला’ कवि कहें , आलसी निज कर मलते।।
पा लेते गंतव्य, सुधीजन चलते चलते।।

मिलते हैं हर एक को, अवसर सौ सौ बार।
चाहे उन्हें भुनाइये, या कर दो बेकार।।
या कर दो बेकार, समय को देखो जाते।।
पर ऐसा कर लोग, फिरें फिर फिर पछताते।।
‘ठकुरेला’ कवि कहें, फूल मेहनत के खिलते।।
जीवन मे बहु बार, सभी को अवसर मिलते।।

दुविधा में जीवन कटे, पास न हों यदि दाम।
रूपया पैसे से जुटें, घर की चीज तमाम।।
घर की चीज तमाम, दाम ही सब कुछ भैया।।
मेला सूना लगे, न हों यदि पास रूपैया।।
‘ठकुरेला’ कवि कहें, दाम से मिलती सुविधा।।
मीत, दाम के बिना, जगत मे सौ सौ दुविधा।।

रोना कभी न हो सका, बाधा का उपचार।
जो साहस से काम ले, वही उतरता पार।।
वही उतरता पार , करो मजबूत इरादा।।
लगे रहो अनवरत, जतन यह सीधा सादा।।
‘ठकुरेला’ कवि कहें, न कुछ भी यूं ही होना।।
लगो काम में यार, छोड़कर पल पल रोना।।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-



त्रिलोक सिंह ठकुरेला
(अभी तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में, कविता, दोहे, गीत, नवगीत, हाइकु, कुण्डलिया, बालगीत,  लघुकथा एवं कहानी प्रकाशित हो चुके हैं.प्रकाशित कृतियों में राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर से 'नया सवेरा बालगीत संग्रह)' शामिल है.)

बंगला संख्या - एल-99, रेलवे चिकित्सालय के सामने, आबू रोड - 307026 (राजस्थान) मो.- 09460714267,trilokthakurela@gmail.com
SocialTwist Tell-a-Friend

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें

ज्यादा जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें

Responsive Ads Here