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''बेहतर संवाद स्थानीय, आसान व परिचित भाषा में ही संभव है''-गंगा सहाय मीणा

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, जनवरी 11, 2012 | बुधवार, जनवरी 11, 2012

(पाठक हित में भाषा के लिहाज़ से ये आलेख यहाँ दैनिक भास्कर से  साभार प्रकाशित किया जा रहा है.-सम्पादक )

बेहतर संवाद स्थानीय, आसान व परिचित भाषा में ही संभव है, इस निष्कर्ष की ओर ले जाने वाली कुछ घटनाएं पिछले कुछ दिनों में घटी हैं। हिंदी-विरोधी राज ठाकरे उत्तर भारतीय मतदाताओं के पास जाकर हिंदी में वोट मांग रहे हैं। मराठी अस्मिता के लिए शोर मचाने वाले राज ठाकरे को हिंदीभाषियों से संवाद के लिए हिंदी का सहारा लेना पड़ा, यह तथ्य स्वयं बहुत कुछ कह देता है। राजभाषा विभाग के बाद ट्राई (भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण) ने भाषा आसान करने का आदेश निकाला है। ट्राई ने मोबाइल सेवा देने वाली ऑपरेटर कंपनियों से अपने ग्राहक सेवा केंद्र की भाषा आसान करने को कहा है। प्राधिकरण ने ऑपरेटरों से जानकारी देने के लिए हिंदी और एक स्थानीय भाषा में भी सेवा मुहैया कराने के लिए कहा है। प्राधिकरण ने यह कदम लोगों की इस आशय की शिकायतों के बाद उठाया है कि उन्हें ग्राहक सेवा केंद्र की भाषा पूरी तरह समझ में नहीं आती। 


नया वर्ष शुरू होते ही एक और खबर ने लोगों का ध्यान खींचा था- जब गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा कि ‘हिंदी गुजरातियों के लिए विदेशी भाषा समान है।’ मामला भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की 2006 में प्रकाशित भूमि अधिग्रहण संबंधी एक अधिसूचना से संबंधित है जो केवल हिंदी और अंग्रेजी में प्रकाशित कराई गई। जूनागढ़ के किसानों ने इसका विरोध करते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। किसानों का आरोप है कि कुछ खास लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए प्राधिकरण ने जान-बूझकर यह अधिसूचना हिंदी में प्रकाशित की जबकि उस क्षेत्र के लोग केवल गुजराती समझते हैं। अपना निर्णय सुनाते वक्त गुजरात उच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि ‘गुजरातियों के लिए हिंदी एक विदेशी भाषा समान है। यहां के विद्यालयों में गुजराती माध्यम में पढ़ाई होती है, इसके बावजूद प्राधिकरण द्वारा स्थानीय भाषा गुजराती की उपेक्षा की गई।’ यह टिप्पणी गहरे अर्थ रखती है। सत्ता की एक भाषा होती है और सामान्यतौर पर यह जनता की भाषा से अलग होती है। भारत में संस्कृत, फारसी, अंगे्रजी आदि ऐसी भाषाएं हैं, जो जन-बोलचाल की भाषाएं कभी नहीं रहीं, लेकिन राजकाज की भाषाएं लंबे समय तक रही हैं। जनभाषा से अलग भाषा को राजकाज की भाषा बनाने का लक्ष्य होता है- जनता को सत्ता-तंत्र से दूर रखना। अगर आम जनता की भाषा राजभाषा बनेगी तो जनता व्यवस्था की असलियत को पहचानेगी और सवाल करेगी। 19वीं सदी तक राजकाज की भाषा से तात्पर्य प्रधानत: कचहरियों की भाषा से होता था। उस जमाने में कचहरियों की भाषा फारसी हुआ करती थी। देश की कचहरियां फारसी से तो मुक्त हो गईं, लेकिन अंग्रेजी ने फारसी की जगह ले ली। देसी भाषाओं को राजकाज में जगह नहीं मिल पा रही।
भारतीय संदर्भ में सत्ता की भाषाएं अंग्रेजी और हिंदी हैं। संविधान में इनको केंद्र की राजभाषा घोषित किया गया है। जिस तरह हिंदी को अंग्रेजी से खतरा है, वैसे ही हिंदी ने देश की अन्य भाषाओं के लिए खतरे की स्थिति पैदा कर दी है। यह काफी दिलचस्प है कि हिंदी समर्थक गैर-हिंदी क्षेत्रों के लोगों से अपेक्षा करते हैं कि वे हिंदी सीखें, लेकिन वे स्वयं उन क्षेत्रों की भाषा सीखने की जहमत नहीं उठाते। इसी वजह से हिंदी के वर्चस्व को चुनौती दी जाती रही है। किसी भी भाषा की स्वीकारोक्ति के लिए उस भाषा के बोलने वालों का लक्ष्य समूह और उसकी भाषा से संवाद व सौहार्दपूर्ण संबंध जरूरी है। 

सच्चाई यह है कि भारत में सभी भाषाओं में आपसी संवाद की कमी है। एक तरफ गैर-हिंदी भाषाओं का हिंदी से संवाद नहीं है, वहीं दूसरी तरफ स्वयं सरकारी हिंदी व बुद्धिजीवियों की हिंदी ने स्वयं को अपने क्षेत्र की लोकभाषाओं से काट लिया है। इस वजह से उसकी समृद्धि रुक गई है। ज्ञान की भाषा के रूप में भी भारतीय भाषाओं में संवाद की काफी कमी है। अंग्रेजी की सामान्य पुस्तकें हिंदी में अनुदित हो जाती हैं लेकिन तमिल, मलयालम, गुजराती आदि की कई कालजयी रचनाओं का हिंदी अनुवाद अभी तक नहीं हो पाया है। यही स्थिति कला, संस्कृति, फिल्म आदि क्षेत्रों की है। हिंदी तथा अन्य भाषाएं सीधे अंग्रेजी से संवाद स्थापित करने की जुगत में हैं। भारतीय भाषाओं से संवाद में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। यह स्थिति बड़ी भारतीय भाषाओं की है। यह अनोखा तथ्य है कि छोटी भाषाओं और बोलियों का स्थान अंग्रेजी नहीं, भारत की ही बड़ी भाषाएं ले रही हैं। इसलिए हमें दो स्तरों पर लड़ाई लडऩी है- बड़ी भारतीय भाषाओं द्वारा छोटी भारतीय भाषाओं और बोलियों को बचाना है और भारतीय भाषाओं में आपसी संवाद को बढ़ाना है। हिंदी समर्थक तमिल, बांग्ला, गुजराती और पूर्वोत्तर की भाषाएं सीखेंगे तो इन भाषाओं के बोलने वालों के मन में हिंदी के प्रति सद्भाव बढ़ेगा। 

पिछले वर्ष सितंबर में सरकार ने एक आदेश निकालकर इस बात को स्वीकार किया कि राजभाषा हिंदी का वर्तमान स्वरूप आमजन के अनुकूल नहीं है इसलिए इसमें संशोधन की जरूरत है। आदेश में हिंदी भाषा में प्रचलित शब्दों को जोड़कर उसे आसान बनाने की वकालत की गई है। अगर इस आदेश को अमल में लाया जा सका तो यह सरकारी हिंदी के विकास के लिए संजीवनी साबित होगा। अन्य भारतीय भाषाओं के शब्द हिंदी में आएंगे तो हिंदी का शब्दभंडार तो समृद्ध होगा ही, साथ ही उन भाषाओं के बोलने वालों के मन में हिंदी के प्रति दुर्भावना कम होगी।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

(शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय,हिन्दी विभाग, पांडिचेरी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहने के बाद अब जे.एन.यूं. में हिंदी के प्राध्यापक के रूप में जाने जाते हैं.साथ युवा लेखक और विचारवान साथी के रूप में भी एक पहचान है.दिल्ली में रहते हुए सभी बड़े नामचीन राष्ट्रीय 
अखबारों के सम्पादकीय पेज पर छपते रहे हैं..)


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