''भारतीय शिक्षा संस्थाओं की निष्क्रियता और लालफीताशाही के कारण हमें विदेशी शिक्षा संस्थानों की सहायता लेनी पड़ती है। ''-मदन कश्यप - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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''भारतीय शिक्षा संस्थाओं की निष्क्रियता और लालफीताशाही के कारण हमें विदेशी शिक्षा संस्थानों की सहायता लेनी पड़ती है। ''-मदन कश्यप


उर्दू-हिन्दी वीडियो पत्रिका 'साझाके पहले अंक का लोकार्पण


नयी पीढ़ी के रचनात्मक प्रयासों को देखकर पुरानी पीढी को जो खुशी मिलती है, उसे अभी नयी पीढी अभी अनुभव नहीं कर सकती, लेकिन नयी पीढी के हौंसलों को देखकर लगता है कि भारत अभी स्वप्नहीन नहीं हुआ है।’ यह बात 09 जनवरी2012 को गुलमोहर हॉलइंडिया हैबिटेट सेंटरनई दिल्ली में उर्दू-हिन्दी की वीडियो पत्रिका 'साझाके पहले अंक का लोकार्पण करते हुए हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक और साहित्यकार विश्वनाथ त्रिपाठी ने कही। समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. असगर वजाहत ने और संचालन संवेद-संपादक किशन कालजयी ने किया। उर्दू-हिन्दी वीडियो पत्रिका 'साझा' जर्मनी के ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय के'कर्मेंदु शिशिर शोधागर' द्वारा निर्मित की गई है। साझा के पहले अंक का निर्देशन संजय जोशी ने और उसका संपादन किशन कालजयी ने किया है। संपादक किशन कालजयी ने बताया कि उर्दू और हिंदी की यह छ:माही साझी वीडियो पत्रिका दोनों भाषाओं के दर्शकों से रूबरू होगी।

युवा आलोचक विभास कुमार ने 'साझावीडियो पत्रिका की पृष्ठभूमि व ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालयजर्मनी द्वारा स्थापित 'कर्मेंदु शिशिर शोधागर' का परिचय दते हुए बताया कि यह शोधागार मूलतः कर्मेंदु शिशिर द्वारा ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय को उपलब्ध करवाई गई अत्यंत ही दुर्लभ और ऐतिहासिक लघु पत्रिकाओं के संकलन और उनके डिजीटलीकरण की विजनरी योजना का परिणाम है। इस संदर्भ में आने वाले समय में यह शोधागार हिन्दी साहित्य के शोधार्थियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित होगा। इसकी स्थापना में आलोचक कर्मेंदु शिशिर की सक्रिय भूमिका रही है। कर्मेंदु शिशिर के इस अमूल्य योगदान का प्रतिदान करने के लिए जर्मनी के ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय ने अपने इस शोधागार का नाम कर्मेंदु शिशिर के नाम पर रखने का निश्चय किया, जो कि अपने आप में एक सराहनीय कदम है। कर्मेंदु शिशिर शोधागार के माध्यम से हिंदी की लघु पत्रिकाओं को डिजिटल रूप में तब्दील करके उन्हें संरक्षित करने और इंटरनेट के माध्यम से दुनिया भर के हिन्दी प्रेमियों को सुलभ कराने की अत्यंत महत्ती परियाजना को अमलीजामा पहनाया जा रहा है।

कर्मेंदु शिशिर के सहायक और कवि मित्र मदन कश्यप ने अपने संस्मरण सुनाते हुए बताया कि कर्मेन्दु शिशिर ने दिन-रात एक करके हिन्दी की लघु पत्रिकाओं के अंक एकत्रित किए थे और हिन्दी के शोधार्थियों के लिए इनकी उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए जर्मनी के ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय के साथ मिलकर इनके संरक्षण की योजना बनाई। इस संदर्भ में उन्होंने संस्कृत के विकास में जर्मन विद्वानों के योगदान को रेखांकित करते हुए कहा कि भारतीय शिक्षा संस्थाओं की निष्क्रियता और लालफीताशाही के कारण हमें विदेशी शिक्षा संस्थानों की सहायता लेनी पड़ती है। उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति संवेदनशीलता के लिए जर्मनी के ट्‌यूबिंगन विश्वविद्यालय की सराहना की और बताया कि यह कितना विडंबनापूर्ण है कि हमें अपनी भाषाओं और अपनी विरासत के संरक्षण के लिए विदेशों की ओर देखना पड़ता है।

उर्दू-हिन्दी वीडियो पत्रिका 'साझा' के लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार असगर वजाहत ने कहा कि वे ऐसे प्रयासों को उम्मीद की एक ऐसी किरण के रूप में देखते हैं जो भविष्य को रोशनी देगी। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि आजादी के बाद हमारी भाषा और संस्कृति की जो दुर्गति हुई है, उसके लिए सबसे ज्यादा हमारी सरकारी संस्थाएं जिम्मेदार हैं। आजादी मिलने से हमारे नागरिक समाज में अपनी भाषा और संस्कृति को लेकर एक प्रकार की शिथिलता सी आ गई थी। हमने खुद कुछ करने की बजाए सरकारी प्रयासों पर जरूरत से ज्यादा विश्वास किया और सरकारों ने हमें निराश किया है लेकिन ऐसे प्रयास उम्मीद जगाते है। समारोह में लेखकों और साहित्य प्रेमियों के साथ-साथ कर्मेंदु शिशिर की बेटी भी उपस्थित थी।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
प्रमोद मीणा,
हिंदी विभाग,सहायक प्रोफेसर,
पांडिचेरी विश्वविद्यालय,कालापेट,पुडुच्चेरी–605014.
मोबाइल – 09344008481, ईमेल– pramod.du.raj@gmail.com)
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