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शैलेन्द्र चौहान का आलेख;भाषा और बोलियाँ

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on मंगलवार, जनवरी 31, 2012 | मंगलवार, जनवरी 31, 2012


लोगों के बीच संवाद की खातिर भाषा या भाषाओं की जरूरत होती है, इस जरूरत के आधार पर भाषाएँ बनती हैं और वे हमारी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा बन जाती हैं। जब जरूरतें बदलती हैं या नहीं रह जाती हैं, तो भाषाएँ मर जाती हैं। आज के आधुनिक समाज में ऐसी मौत को एक नुकसान के रूप में देखा जाता है, परन्तु आधुनिक समाज में भाषाओं के मरने की प्रक्रिया  तेज हो गई है।

भाषाओं के सिलसिले में भारत और यूरोपीय संघ के बीच तुलना की जा सकती है। दोनों के मामले में निश्चित भौगोलिक दायरे में प्रतिष्ठित भाषाएँ हैं, हालाँकि भारत में राष्ट्रीय एकता, और यूरोप में यूरोपीय संघ की एकता के बावजूद भाषाई-सांस्कृतिक बहुलताओं को भी बनाए रखने की नीति पर चला जा रहा है, लेकिन इन अलग-अलग भाषाई इलाकों या देशों में मुख्य भाषाओं के अलावा तथाकथित गौण या हाशिए की भाषाएँ भी हैं, जिनके अस्तित्व या विकास की समस्या रह ही जाती है।

भाषा के अलावा स्थानीय बोलियाँ या डायलेक्ट हैं, जिन्हें आधुनिक संदर्भ में अक्सर उपभाषाओं का नाम दिया गया है। जर्मनी में हर क्षेत्र की अपनी स्थानीय बोली है, और उनमें से कुछ एक को,मसलन देश के उत्तर में बोली जाने वाली प्लाट डॉएच को किसी हद तक एक अलग भाषा भी कहा जा सकता है। भारत में भोजपुरी की तरह जर्मनी में प्लाट डॉएच का इस्तेमाल भी बोलचाल के लिए किया जाता है- कम से कम आंशिक रूप से, और उसमें साहित्य भी रचा जाता है। भोजपुरी की तरह यह भाषा भी किसी भी स्तर पर कामकाज की भाषा नहीं बन पाई है।

हाशिए की भाषाओं का इस्तेमाल या तो कुछ बुद्धिजीवी और साहित्यकार करते हैं, या फिर हाशिए पर रहने वाले वर्ग। जैसे-जैसे ये वर्ग तथाकथित मुख्य धारा में शामिल होते रहते हैं, उसी हद तक वे इन भाषाओं का इस्तेमाल छोड़ने लगते हैं। शहरीकरण की प्रक्रिया के साथ-साथ भी स्थानीय बोलियाँ विलुप्त होती हैं, हालाँकि जर्मनी में मिसाल के तौर पर बर्लिन या कोलोन की स्थानीय बोलियाँ पूरी तरह से शहरकेंद्रिक हैं, और इस वजह से सिर्फ टिकी हुई हैं, बल्कि आधुनिक युग में भी पहचान को ढोने वाली बोलियाँ बनी हुई हैं। भारत में भी कोलकाता जैसे शहरों के मामले में शहरकेंद्रिक स्थानीय बोली की मिसाल देखी जा सकती है।

हिन्दी भाषा का इतिहास
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में मानी जाती है। इसकी प्राचीनता का एक प्रमाण यहाँ की भाषाएँ भी है। भाषाओँ की द्रष्टि से काल खंड का विभाजन निम्नानुसार किया जाता है :
  •  
  • वैदिक संस्कृत
  • लौकिक संस्कृत
  • पाली
  • प्राकृत
  • अपभ्रंश तथा अव्ह्त्त
  • हिंदी का आदिकाल
  • हिंदी का मध्यकाल
  • हिंदी का आधुनिक काल


हिंदी शब्द की उत्पति "सिन्धु" से जुडी है। "सिन्धु" "सिंध" नदी को कहते है। सिन्धु नदी के आस-पास का क्षेत्र सिन्धु प्रदेश कहलाता है। संस्कृत शब्द "सिन्धु" ईरानियों के सम्पर्क में आकर हिन्दू या हिंद हो गया। ईरानियों द्वारा फारसी भाषा में उच्चारित किया गए इस हिंद शब्द में ईरानी भाषा का "एक" प्रत्यय लगने से "हिन्दीक शब्द बना है जिसका अर्थ है "हिंद का" यूनानी शब्द "इंडिका" या अंग्रेजी शब्द "इण्डिया" इसी "हिन्दीक " के ही विकसित रूप है।

हिंदी प्राकृत  साहित्य 1000  ईसवी से प्राप्त होता है। इसके  बाद  प्राप्त साहित्य अपभ्रंश में है इसे हिंदी की पूर्व पीठिका माना जा सकता है। आधुनिक भाषाओँ का जन्म अपभ्रंश के विभिन्न रूपों से इस प्रकार हुआ है :

  • अपभ्रंश - आधुनिक भाषाएँ
  • शोर्सेनी - पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, पहाड़ी , गुजराती
  • पैशाची - लहंदा, पंजाबी
  • ब्राच्द - सिंधी
  • महाराष्ट्री मराठी
  • मगधी  - बिहारी, बंगला, उडिया, असमिया


1पश्चिमी हिंदी - खडी बोली या कौरवी २। ब्रिज ३। हरयाणवी ४। बुन्देली ५।कन्नौजी
२। पूर्वी हिंदी - १। अवधी २। बघेली ३। छत्तीसगढ़ी
३। राजस्थानी - १। पश्चिमी राजस्थानी (मारवाड़ी ) .पूर्वी राजस्थानी (ढूँढाड़ी, हाड़ोती)
४। पहाड़ी - १। पश्चिमी पहाड़ी २। मध्यवर्ती पहाड़ी (कुमौनी - गढ़वाली)
५। बिहारी - १। भोजपुरी २। मागधी ३। मैथिली

आदिकाल - (1000---1500)
अपने प्रारंभिक दौर में हिंदी  प्राकृत  के बहुत निकट थी इसी प्राकृत-अपभ्रंश से हिंदी का जन्म हुआ है। आदि अपभ्रंश में , , , , , , केवल यही आठ स्वर थे। t , , स्वर इसी अवधि में हिंदी में जुड़े   इसका व्याकरण भी अपभ्रंश के सामान काम कर रहा था। धीरे -धीरे परिवर्तन होते हुए और 1500 . आते-आते हिंदी स्वतंत्र रूप से खडी हुई। 1460 के आस-पास देश भाषा में साहित्य सर्जन प्रारंभ हो चुका था। इस अवधि में दोहा,चौपाई ,छप्पय दोहा , गाथा आदि छंदों में रचनाएं हुई है। इस समय के प्रमुख रचनाकार गोरखनाथ, विद्यापति,नरपति नालह, चंदवरदाई आदि है।

मध्यकाल 1500-----1800 तक
इस अवधि में हिंदी में बहुत परिवर्तन हुए। देश पर मुगलों का शासन होने के कारण फारसी  भाषा का प्रभाव हिंदी पर पड़ा। परिणाम यह हुआ की फारसी के लगभग 3500 शब्द, अरबी के 2500 शब्द, पश्तो से 50 शब्द, तुर्की के 125 शब्द हिंदी की शब्दावली में शामिल हो गए। मुगलों की सैनिक छावनियों के करीब सामन के लेन देन के लिए हिन्दवी या हिन्दुस्तानी का जन्म जो कालांतर में हिंदी और उर्दू दो भाषाओँ के रूप में विकसित हुई   खड़ी बोली हिंदी में  अमीर खुसरो ने साहित्य सृजन किया मुगलों के आधिपत्य का प्रभाव भाषा पर दिखाई पड़ने लगा था। मुग़ल दरबार में फारसी पड़े -लिखे विद्वानों को नौकरियां मिली थी परिणामस्वरूप पढ़े -लिखे लोग हिंदी की वाक्य रचना फारसी की तरह करने लगे। हिंदी में , , , , , ये पाच नयी ध्वनियाँ, जिनके उच्चारण प्रायः फारसी पड़े-लिखे लोग ही करते  थे। यूरोप के साथ व्यापार  आदि से सम्पर्क बढ़ रहा था। परिणाम स्वरुप पुर्तगाली, स्पेनी, फ्रांसीसी और अंग्रजी के शब्दों का समावेश हिंदी में हुआ।  इस अवधि में हिंदी का स्वर्णिम साहित्य सिरजा गया। 

भक्ति आन्दोलन ने देश की जनता की मनोभावना को प्रभावित किया। भक्त कवियों में अनेक विद्वान थे जो तत्सम मुक्त भाषा का प्रयोग कर रहे थे।  कृष्ण जन्म  स्थान की ब्रज भाषा में काव्य रचना की, जो इस काल के साहित्य की मुख्यधारा मानी जाती हैं। इसी अवधि में दखिनी हिंदी का रूप सामने आया। पिंगल, मैथली और खड़ी बोली में भी रचनायें लिखी जा रही थी। इस काल के मुख्य कवियों में महाकवि तुलसीदास, संत सूरदास, संत मीराबाई, मालिक मोहम्मद जायसी, कबीर, रसखान, रविदास  केशव दास,बिहारी और  भूषण है। इसी कालखंड में रचा गया रामचरितमानस विश्व भर में विख्यात हुआ जो अवधि में  लिखा गया था इस काल के भक्त निर्गुण और सगुन उपासक थे। कवियों का रामाश्रयी और कृष्णाश्रयी शाखाओं में बांटा गया। इसके पश्चात  रीतिकालीन काव्य लिखा  जाने लगा जिसके प्रमुख कवि बिहारी, मतिराम आदि हुए

भाषा और शैली की दृष्टि से शौरसेनी या पश्चिमी अपभ्रंश का एक व्यापक क्षेत्र था। ब्रजभाषा को एक प्रकार से इसी व्यापक क्षेत्र की सीमाएँ विरासत में मिली थीं। ब्रजभाषा का शैली- रुप भाषा- क्षेत्र से कहीं अधिक विस्तृत सीमाओं का स्पर्श करता है। कुछ लेखकों ने ब्रजभाषा नाम से उसके क्षेत्र- विस्तार का कथन किया है।वंश भास्करके रचयिता सूरजमल ने ब्रजभाषा प्रदेश दिल्ली और ग्वालियर के बीच माना है।तुहफतुल हिंदके रचयिता मिर्जा खाँ ने ब्रजभाषा के क्षेत्र का उल्लेख इस प्रकार किया हैभाषाब्रज तथा उसके पास- पड़ोस में बोली जाती है। ग्वालियर तथा चंदवार भी उसमें सम्मिलित हैं। गंगा- यमुना का दोआब भी ब्रजभाषा का क्षेत्र है। लल्लूजीलाल के अनुसार ब्रजभाषा का क्षेत्रब्रजभाषा वह भाषा है, जो ब्रज, जिला ग्वालियर, भरतपुर बटेश्वर, भदावर, अंतर्वेद तथा बुंदेलखंड में बोली जाती है। इसमें ( ब्रज ) शब्द मथुरा क्षेत्र का वाचक है।लल्लूजीलाल ने यह भी लिखा है कि ब्रज और ग्वालियर की ब्रजभाषा शुद्ध एवं परिनिष्ठित है।

ग्रियर्सन ने ब्रजभाषा- सीमाएँ इस प्रकार लिखी हैं।मथुरा केंद्र है। दक्षिण में आगरे तक, भरतपुर,धौलपुर और करौली तक ब्रजभाषा बोली जाती है। ग्वालियर के पश्चिमी भागों तथा जयपुर के पूर्वी भाग तक भी यही प्रचलित है। उत्तर में इसकी सीमा गुड़गाँव के पूर्वी भाग तक पहुँचती है। उत्तर- पूर्व में इसकी सीमाएँ दोआब तक हैं। बुलंदशहर, अलीगढ़, एटा तथा गंगापार के बदाँयू, बरेली तथा नैनीताल के तराई परगने भी इसी क्षेत्र में है। मध्यवर्ती दोआब की भाषा को अंतर्वेदी नाम दिया गया है। अंतर्वेदी क्षेत्र में आगरा, एटा, मैनपुरी, फर्रूखाबाद तथा इटावा जिले आते हैं, किंतु इटावा और फर्रूखाबाद की भाषा इनके अनुसार कन्नौजी हैं, शेष समस्त भाग ब्रजभाषी है।

केलाग ने लिखा है कि राजपूताना की बोलियों के उत्तर- पूर्व, पूरे अपर दोआब तथा गंगा- यमुना की घाटियों में ब्रजभाषा बोली जाती है।

डा. धीरेंद्र वर्मा ने ग्रियर्सन द्वारा निर्दिष्ट कन्नौजी क्षेत्र को ब्रजी के क्षेत्र से अलग नहीं माना है। अपने सर्वेक्षण के आधार पर उन्होंने कानपुर तक, ब्रजभाषी क्षेत्र ही कहा है। उनके अनुसार उत्तर- प्रदेश के मथुरा, अलीगढ़, आगरा, बुलंदशहर, एटा, मैनपुरी, बदायूं तथा बरेली के जिलेपंजाब और गुड़गावां जिले का पूर्वी भागराजस्थान में भरतपुर, धौलपुर, करौली तथा जयपुर का पूर्वी भागमध्यभारत में ग्वालियर का पश्चिमी भाग ब्रजी के क्षेत्र में आते हैं। चूँकि ग्रियर्सन साहब का यह मत लेखक को मान्य नहीं कि कन्नौजी स्वतंत्र बोली है, इसलिए उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, शाहजहाँपुर,फर्रूखाबाद, हरदोई, इटावा और कानपुर के जिले भी ब्रजभाषा क्षेत्र में सम्मिलित कर लिए हैं। इस प्रकार बोली जाने वाली ब्रजभाषा का क्षेत्र अत्यंत विस्तृत ठहरता है। एक प्रकार से प्राचीन मध्यदेश का अधिकांश भाग इसमें सम्मिलित हो जाता है।

ब्रज शैली क्षेत्र

ब्रजभाषा काव्यभाषा के रुप में प्रतिष्ठित हो गई। कई शताब्दियों तक इसमें काव्य- रचना होती रही। सामान्य ब्रजभाषा- क्षेत्र की सीमाओं का उल्लंघन करके ब्रजभाषा- शैली का एक वृहत्तर क्षेत्र बना। इस बात का अनुमान रीतिकाल के कवि आचार्य भिखारीदासजी ने किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ब्रजभाषा का परिचय ब्रज से बाहर रहने वाले कवियों से भी मिल सकता है। यह नहीं समझना चाहिए कि ब्रजभाषा मधुर- सुंदर है। इसके साथ संस्कृत और फारसी ही नहीं, अन्य भाषाओं का भी पुट रहता है। फिर भी ब्रजभाषा शैली का वैशिष्ट्य प्रकट रहता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि ब्रजभाषा शैली अनेक भाषाओं से समन्वित थी। वास्तव में १६ वीं शती के मध्य तक ब्रजभाषा की मिश्रित शैली सारे मध्यदेश की काव्य- भाषा बन गई थी।

ब्रजभाषा शैली के क्षेत्र- विस्तार में भक्ति आंदोलन का भी हाथ रहा। कृष्ण- भक्ति की रचनाओं में एक प्रकार से यह शैली रुढ़ हो गई थी। पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने अनेक प्रदेशों के ब्रज भाषा भक्त- कवियों की भौगोलिक स्थिति इस प्रकार प्रकट की है — “ब्रज की वंशी- ध्वनि के साथ अपने पदों की अनुपम झंकार मिलाकर नाचने वाली मीरा राजस्थान की थीं, नामदेव महाराष्ट्र के थे, नरसी गुजरात के थे, भारतेंदु हरिश्चंद्र भोजपुरी भाषा क्षेत्र के थे।बिहार में भोजपुरी, मगही और मैथिली भाषा क्षेत्रों में भी ब्रजभाषा के कई प्रतिभाशाली कवि हुए हैं। पूर्व में बंगाल के कवियों ने भी ब्रजभाषा में कविता लिखी।

पश्चिम में राजस्थान तो ब्रजभाषा शैलियों का प्रयोग प्रचुर मात्रा में करता ही रहा और भी पश्चिम में गुजरात और कच्छ तक ब्रजभाषा शैली समादृत थी। कच्छ के महाराव लखपत बड़े विद्याप्रेमी थे। ब्रजभाषा के प्रचार और प्रशिक्षण के लिए इन्होंने एक विद्यालय भी खोला था।

इस प्रकार मध्यकाल में ब्रजभाषा का प्रसार ब्रज एवं उसके आसपास के प्रदेशों में ही नहीं, पूर्ववर्ती प्रदेशों में भी रहा। बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात, काठियावाड़ एवं कच्छ आदि में भी ब्रजभाषा की रचनाएँ हुई।

ब्रजभाषा शैली के क्षेत्र विस्तार की दो स्थितियाँ रहीं। प्रथम स्थिति भाषा वैज्ञानिक इतिहास के क्रम से उत्पन्न हुई। जब पश्चिमी या मध्यदेशीय भाषा अनेक कारणों से अपनी भौगोलिक सीमाओं का उल्लंघन करने लगी, तब स्थानीय रुपों से समन्वित होकर, वह एक विशिष्ठ भाषा शैली का रुप ग्रहण करने लगी। जिन क्षेत्रों में यह कथ्य भाषा होकर केवल साहित्य में प्रयुक्त कृत्रिम, मिश्रित और विशिष्ट रुप में ढ़ल गई और विशिष्ट अवसरों, संदर्भों या काव्य रुपों में रुढ़ हो गई, उन क्षेत्रों को शैली क्षेत्र माना जाएगा। शैली- क्षेत्र पूर्वयुगीन भाषा- विस्तार या शैली- विस्तार के सहारे बढ़ता है। पश्चिमी या मध्यदेशी अपभ्रंश के उत्तरकालीन रुपों की विस्तृति इसी प्रकार हुई। दूसरी स्थिति तब उपस्थित हुई जब पूर्व- परंपरा की भाषा- शैली की क्षेत्रीय विस्तृति तो पृष्ठभूमि बनी और शैलीगत क्षेत्र- विस्तार के ऐतिहासिक ( भक्ति- आंदोलन ) और वस्तुगत (कृष्णवार्ता ) कारण भी उपस्थित हो गए।

आधुनिक काल ( 1800 से अब तक )

हिंदी का आधुनिक काल देश में हुए अनेक परिवर्तनों  का साक्षी है। परतंत्र रहते हुए देशवासी इसके विरुद्ध खड़े होने का उपक्रम कर रहे थे। अंग्रेजी का प्रभाव देश की भाषा और संस्कृति पर दिखाई पड़ने लगा। अंग्रेजी शब्दों का प्रचलन हिंदी के साथ बढ़ा मुगलकालीन व्यवस्था समाप्त होने से अरबी, फारसी के शब्दों के प्रचालन में गिरावट आई , , ध्वनियाँ , , में बदल गयी। इस पूरे कालखंड को 1800से 1850 तक और  फिर  1850 से 1900 तक और 1950 से  2000 तक विभाजित किया जा सकता हैं।

संवत 1830 में जन्मे मुंशी सदासुख लाल नियाज ने हिंदी खड़ी बोली को प्रयोग में लिया खड़ी बोली उस समय भी अस्तित्व में थी खड़ी बोली या कौरवी का उद्भव शौरसेनी प्राकृत-अपभ्रंश के उत्तरी रूप से हुआ है इसका क्षेत्र देहरादून का मैदानी भाग, सहारनपुर, मुज्जफरनगरमेरठ, दिल्ली बिजनौर, रामपुर, मुरादाबाद है इस बोली में पर्याप्त लोक गीत और लोक कथाएं मौजूद हैं खड़ी बोली पर ही उर्दू , हिन्दुस्तानी और दक्खनी हिंदी निर्भर करती है मुंशी सदा सुखलाल नियाज के आलावा इंशा अल्लाह खान इसी अवधि के लेखक है इनकी रानी केतकी की कहानी पुस्तक प्रसिद्ध है लल्लूलाल , इस काल खंड के एक और प्रसिद्ध  लेखक हैं इनका जन्म, संवत 1820 में हुआ था कोलकाता  के फोर्ट विलियम कॉलेज के अध्यापक जॉन गिल्ल्क्रिस्ट के अनुरोध पर लल्लूलाल जी ने पुस्तक प्रेम सागर खड़ी बोली में लिखी थी  

प्रेम सागर के आलावा सिंघासन बत्तीसी, बेताल पचीसी, शकुंतला नाटक, मधोनल भी इनकी पुस्तकें हैं जो खड़ी बोली में, ब्रज और उर्दू के मिश्रित रूप में हैं इसी कालखंड के एक और लेखक सदल मिश्र हैं इनकी नचिकेतोपाख्यान पुस्तक प्रसिद्ध  है खड़ी बोली में लिखी गयी इस पुस्तक में संस्कृत के शब्द अधिक हैं संबत १८६० से १९१४  के बीच के समय में कालजई कृतियाँ प्रायः  नहीं मिलती 1860  के आस -पास तक हिंदी गद्य अपना निश्चित स्वरुप ग्रहण कर चुका था भारतेन्दु  बाबू  हरिश्चंद  आधुनिक हिंदी गद्य के प्रणेता माने जाते हैं   अब तक 1857का पहला स्वतंत्रता युद्ध लड़ा चुका था। भारतेंदुबाबू हरेश्चंद्र ने हिंदी नव जागरण की नीव रखी उन्होंने अपनें नाटकों , कविताओं , कहावतों और किस्सा गोई के माध्यम से हिंदी भाषा और जातीय के उठान के लिय खूब काम किया

कविवचनसुधा के माध्यम से हिंदी का प्रचार -प्रसार किया गद्य में सदल मिश्र , सदासुखलाल,लल्लू लाल आदि लेखकों ने हिंदी खड़ीबोली को स्थापित करने का काम किया भारतेंदु बाबू हरेश्चंद्र ने कविता को जीवन के यथार्थ से जोड़ा सन 1866 देश में बहुत बड़ा अकाल पड़ा जनता मरती रही और प्रशासक रंगरेलियां मनाते रहे देश में दस से बीस लाख लोग मौत के शिकार हुए ऐसे समय में भार्तेंदुबबू हरेश्चन्द्र ने आवाज दी " निज भाषा उन्नत अहै सब उन्नत को मूल , बिनु निज भाषा ज्ञान के मिटे हिय को शूल " अंग्रेजों के अत्याचारों और सब तरह के शोषणों  से दुखी जनता अपने देश के स्वतन्त्रता  अभियान की ओर झुकी इसी अवधि के लेखकों में पंडित बदरी नारायण चौधरी , पंडित प्रताप नारायण मिश्र, बाबू तोता राम, ठाकुर जग मोहन सिंह  आदि हुए पंडित बाल कृष्ण  भट्ट, पंडित केशवदास भट्ट ,पंडित अम्बिकादत्त व्यास, पंडित राधारमण गोस्वामी आदि हैं हिंदी भाषा और साहित्य को परमार्जित करने एवं राष्ट्रीय जागरण के उद्देश्य से इस काल खंड में अनेक पत्र - पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ हुआ, इनमें हरिश्चंद्र चन्द्रिका, बालाबोधिनी, नवोदिता हरिश्चंद्र,हिन्दी बंगभाषी, आर्यावर्त, उचितवक्ता, भारत मित्र, सरस्वती, दिनकर प्रकाश आदि हैं। 1900 वीं  सदी का प्रारम्भ  हिंदी  भाषा के विकास की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण   है इसी समय में देश में स्वतंत्रता आन्दोलन प्रारंभ हुआ था

राष्ट्र में कई तरह के आन्दोलन चल रहे थे इनमें  कुछ गुप्त और कुछ प्रकट थे पर इनका माध्यम हिंदी ही थी अब हिंदी केवल उत्तर भारत तक ही सीमित रह गई थी हिंदी अब   पूरे भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन की भाषा बन चुकी थी साहित्य की दृष्टि  से बंगला, मराठी हिंदी से आगे थीं परन्तु बोलने बालों की दृष्टि से हिंदी सबसे आगे थी इसी लिए हिंदी को राजभाषा बनाने की पहल गाँधी जी समेत देश के कई अन्य नेता भी कर रहे थे सन 1918 में हिंदी साहित्य सम्मलेन की अध्यक्षता करते हुए गाँधी जी ने कहा था की हिंदी ही देश की राष्ट्रभाषा  होनी चाहिए सन १९०० से लेकर 1950 अक हिंदी के अनेक रचनाकारों ने इसके विकास में योग दान दिया इनमे मुंशी प्रेमचंद ,जय शंकर प्रसाद , दादा माखनलाल चतुर्वेदी , मैथिलीशरण गुप्त,सुभद्राकुमारी चौहान, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, सूर्य कान्त त्रिपाटी निराला, सुमित्रा नंदन पन्त, महादेवी वर्मा, यशपालआदि प्रमुख हैं


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-



शैलेन्द्र चौहान

आलोचक और वरिष्ठ कवि है जिनका हाल ही में    नया  संस्मरणात्मक  उपन्यास कथा रिपोर्ताज पाँव ज़मीन पर बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित हुआ है.उनके बारे में विस्तार से जानने के लियाना यहाँ क्लिक कारीगा.

संपर्क ३४/242 प्रतापनगर,सेक्टर.3 जयपुर.303033 ;राजस्थान
ई-मेल shailendrachauhan@hotmail.com, फोन  9419173960
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