ज्योतिस्वरूप:कला की इसी ओछी राजनीति के शिकार - अपनी माटी ई-पत्रिका

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका('ISSN 2322-0724 Apni Maati')

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ज्योतिस्वरूप:कला की इसी ओछी राजनीति के शिकार


भारतीय आधुनिक कला में अक्सर राजस्थान के चित्रकारों के योगदान को अलक्षित ही किया जाता रहा है और यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि ज्योतिस्वरूप जिनका कुछ साल पहले जयपुर में गुमनाम निधन हुआ, कला की इसी ओछी राजनीति के शिकार थे वह सच्चे अर्थ में राजस्थान के पहले आधुनिक चित्रकार थे। अपने पिता नरसिंह कछावा , जो कभी राजस्थान के गृहमंत्री भी थे, की ताकत और दौलत के दम पर ये राजपूत बेटा आसानी से ज़िंदगी बसर कर सकता था, पर इंजीनियर बनने का सपना अधूरा छोड़ कर, सन ६० के दशक में जब बंगाल स्कूल और यथार्थवादी कला का बोलबाला था , जोधपुर जैसी छोटी जगह से कर ज्योतिस्वरूप (१९३९-२००९) ने अपने आधुनिक सोच और नवाचार के बल पर तत्काल अपनी कला की तरफ़ सुधी समीक्षकों और प्रेक्षकों का ध्यान खींच लिया था और यह आकस्मिक नहीं था कि उनके काम की असाधारण मौलिकता से यहाँ के ही नहीं, भारतीय कला जगत तक के समकालीन कई चित्रकार बेहद प्रभावित हुए थे, जिनमे कँवल कृष्ण जैसे अपेक्षाकृतवरिष्ठकलाकर्मी भी थे। 

दिल्ली में कुछ वक्त कँवल कृष्ण और देवयानी कृष्ण के निकट सान्निध्य में रह कर ज्योतिस्वरूप ने दो नए माध्यमों : सेरेमिक और बाटिक में महारत हासिल करते हुए कई सरकारी मंडपों और भवनों के लिए विशाल आकार के सेरेमिक म्यूरल्स का निर्माण किया। शायद सन साठ और सत्तर का दशक इस कलाकार का स्वर्णिम दौर था जब रंगों और रसायनों से निर्मित उनकी चित्र श्रंखला 'इनर जंगल' का प्रदर्शन भारत और फिलेडेल्फिया की कला दीर्घाओं में किया गया। वह बेहद उत्सुक और मेहनती रचनाकार थे- माध्यम को लेकर किए गए उनके अनेक प्रयोग आज भी कला जगत में याद किए जाते हैं। विज्ञान का विद्यार्थी होने की वजह से उन्हें रसायनों का गहरा ज्ञान था, पर शिक्षा में कोई औपचारिक डिग्री लिए बिना भी ज्योतिस्वरूप परामनोविज्ञान, समकालीन साहित्य, कला में हो रहे महत्वपूर्ण लेखन के अध्येता थे। वह केवल परामनोविज्ञान की ताज़ा किताबों के बारे में गहरी दिलचस्पी रखते थे बल्कि अपने पडौस की किताबों की एक बड़ी दूकान से मुफ्त किताबें लाकर पढ़ पाना उनका विशेषाधिकार था क्यों किबुक्स एंड बुक्सके मालिक सिंघवी भी मूलतः उसी जगह याने जोधपुर के थे जहाँ के थे ज्योतिस्वरूप।

अपने अन्तिम दिनों और वर्षों में वह घोर आर्थिक कठिनाई में रहे और केंद्रीय ललित कला अकेडमी की फेलोशिप के अलावा उनके पास नियमित आमदनी का कोई स्रोत नहीं था पर एक अलबेले, संघर्षरत, एकांतवासी और हर तरह से अकेले हो चुके ज्योतिस्वरूप अपने अन्तिम वक्त तक रचनाशील बने रहे। मुझे याद है उन पर 'कला प्रयोजन' में मैंने लंबा आलेख लिखा था और उनके कई चित्र भी हमने प्रकाशित किए थे, जहाँ जहाँ अवसर मिला हम मित्र उनकी कला की अप्रतिमता की चर्चा भी सादर करते थे, पर क्रमशः उनसे मिलने के अवसर कम होते चले गए। गोष्ठियों में जाना भी उन्होंने छोड़ दिया, पर मेरे दफ्तर वह कई बार जाया करते थे। एक खटारा साइकिल पर- क्यों कि वेस्पा स्कूटर, जिसे उन्होंने आधुनिक ढंग से खुद रंगा था- तो वह कभी का बेच चुके थे! ज्योतिस्वरूप अपने घर की पुरानी छत पर एक समीक्षक के बतौर मेरा, प्रकाश परिमल और अशोक आत्रेय का बेहद उत्सुकता से इंतज़ार करते थे, वह हम लोगों के प्रशंसक थे, हालांकि वह कम ही लोगों की तारीफ़ करते थे!. मैंने, स्व. रवि जैन और सुभाष मेहता ने अनगिनत दफा सर्दियों की ठंडी शामें उनकीप्रिय केसर-कस्तूरीके मखमली सुरूर में डूबे अपने मस्तमौला मेज़बान की रोमांचक बातें सुनते गुजारी हैं!

ज्योतिस्वरुप जैसे बड़े कलाकार अपनी मौलिकता और सृजनात्मकता के बावजूद कला-जगत की मुख्य धारा से बाहर कर दिए गए हैं, क्यों कि दिल्ली वाला मेरा दोस्त विनोद भारद्वाज और प्रयाग शुक्ल, जैसे लोग जो अपने आप को कला-समीक्षक कहते नहीं इतराते, जब भी आधुनिक कला का इतिहास लिखते हैं- हर बार ज्योतिस्वरूप को क्यों भूल जाते हें! मुझे पता नहीं शिखंडियों और दुर्योधनों से भरे इस कला-परिदृश्य का क्या अंजाम होगा क्यों कि हम अपने बड़े और महत्वपूर्ण कलाकर्मियों की उपेक्षा कर के हम अपनी कला की अवमानना ही तो कर रहे होते हैं।

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
हेमंत शेष
(राजस्थान में प्रशासनिक अधिकारी होने के साथ ही साहित्य जगत का एक बड़ा नाम है.लेखक,कवि और कला समीक्षक के नाते एक बड़ी पहचान.इनके कविता संग्रह  'जगह जैसी जगह' को बिहारी सम्मान भी मिल चुका है.अब तक लगभग तेरह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है.हाल के दस सालों में सात किताबें संपादित की है.साथ ही 'राजस्थान में आधुनिक कला' नामक एक किताब जल्द आने वाली है.)


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