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आज की कविता का परिदृश्य काफी विविधता से भरा है: संतोष सहर

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on सोमवार, जनवरी 09, 2012 | सोमवार, जनवरी 09, 2012


पटना में जसम की ओर से तीन पीढि़यों की कविताओं का पाठ 

5 जनवरी को जन संस्कृति मंच की ओर से पटना में  काव्यगोष्ठी आयोजित की गई। जसम राज्य कार्यालय में आयोजित इस कार्यक्रम में तीन पीढि़यों के ग्यारह कवियों ने अपनी कविताएं सुनाईं। एक ओर युवा पीढ़़ी के कुमार मुकुल और अरविंद श्रीवास्तव थे, तो वहीं दूसरी ओर नब्बे के दशक में कविता लेखन की शुरुआत करने वाले नवीन कुमार, सुधीर सुमन, राजेश कमल जैसे कवि थे। नई पीढ़ी के कवियों के प्रतिनिधि के रूप में कौशलेंद्र, प्रत्युष कुमार मिश्र, आसिया, आलिया, अंचित पांडेय, कृष्ण समिद्ध इस कवि गोष्ठी में मौजूद थे। खासकर नई पीढ़ी के कवियों ने हिंदी कविता में नई संभावनाओं का संकेत दिया।

इंटरनेट के प्रचलन में आने के बाद कविता का जिंदगी के साथ कैसा रिश्ता बना है, इसकी भी बानगी इस कविता पाठ में देखने को मिला। जो कवि अपनी कविताएं साथ नहीं ला पाए थे, इंटरनेट उनके काम आया। नई पीढ़ी के कवियों में यह प्रवृत्ति आम है। किसी ने कहा भी कि फेसबुक जैसे साइटों ने कविता को नया जीवन दिया है। युवा हो रही कवि पीढ़ी का भी इंटरनेट के साथ सहज रिश्ता है। अरविंद श्रीवास्तव को कविता सुनाने में जितनी दिलचस्पी थी, उससे कहीं ज्यादा ब्लाॅग संबंधी सूचनाओं को साझा करने में थी। जाहिर है आज के संचार माध्यमांे ने जिन सूचनाओं के भरमार के बीच हमें डाल दिया है, इससे हिंदी कवि और उनकी कविताएं भी प्रभावित हुई है। व्यापक दुनिया की सूचनाएं कविता में दाखिल हो रही हैं। हालांकि इन सूचनाओं को अपनी पैनी निगाह से परखते हुए निरंतर सचेत वर्ग दृष्टि के अनुसार कविता रचने वाला मुक्तिबोध सरीखा कोई कवि सूचना साम्राज्य के पिछले दो दशकों में शायद नहीं आया है। 

सूचना साम्राज्य ने हमें दर्शक और श्रोता की भूमिका में ला पटका है, एक दर्शक भाव की प्रतिक्रिया पिछले दो दशकों की कविताओं में ज्यादा नजर आती रही है। जाहिर है उसके जरिए जिस तरह के विमर्श और बहसें संचालित की जाती रही हैं, उसका भी असर हिंदी कविता पर रहा है, अब इसकी खासियतें भी हैं और इसकी अपनी सीमाएं भी हैं। अरविंद श्रीवास्तव की ‘राजधानी में एक उजबेक लड़की’, ‘आँखें’ (हुसैन को समर्पित), ‘मामूली आदमी का घोषणा-पत्र’, ‘एक  डरी और सहमी दुनिया में’, ‘अंत में’, ‘पीठ’, ‘कंधा’ आदि कविताओं में से ज्यादातर कविताएं इस दौर की प्रवृत्तियां का प्रतिनिधित्व करती लगीं। बौद्धिक मंथन और चिंतन का खुलकर अहसास दिलाने वाली कौशलेन्द्र की अपव्यय, एक प्रारंभ, बाघ, दलपति, राख का ढेर आदि में स्थिति थोड़ी भिन्न थी। उनकी कविताओं मंे इस सूचना साम्राज्य में मौजूद किसी विशिष्ट सूचना को अपने स्थानीय संदर्भों में एक प्रतीक की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश की गई थी।

 कुमार मुकुल हमेशा की तरह समाज-राजनीति और संस्कृति की आम प्रवृत्तियों से बहस करने वाली मुद्रा में थे। असंतोष, तंज और झुंझलाहट भरा रोष उनके द्वारा पढ़ी गई तीनों कविताओं- ‘औफिशियल समोसे पर पलने वाले चूहे’, ‘ओ जनद्रोहियांे’ और ‘बात करने की बीमारी’ में मौजूद थी। ऐसी कविताएं खुद रोष और असंतोष से भरे पाठक और श्रोता को भी राहत प्रदान करती हैं। नवीन कुमार की कविता ‘एक नवजात के प्रति’ और सुधीर सुमन की ‘हमें जो तय करना है’, ‘स्वप्न’, ‘उन्हें मत बताना’ व्यवस्था के अनुकूलन के विरुद्ध व्यक्ति की मुक्ति की जद्दोजहद की अभिव्यक्ति लगीं। इनकी कविताएं वैचारिक आग्रह वाली कविताएं थीं। वैचारिक आग्रह तो राजेश कमल की ‘मुंबई’, ‘अच्छे लोग’, ‘सत्येन्द्र दुबे की ओर से’, ‘ईश्वर के हाथ’ आदि कविताओं में भी था, पर उनमें विचार के बजाए स्थितियां ज्यादा मुखर थीं। छोटी दृष्टांत कथाओं जैसी इन कविताओं को काफी पसंद भी किया गया। प्रत्युष कुमार मिश्र की ‘ढेंकी’, ‘कौवे और मोबाइल’ और ‘दिल्ली में’ कविताएं अपने देशज अंदाज और विषयवस्तु के कारण काफी सराही गईं। कृष्ण समिद्ध ने अपनी याददाश्त के आधार पर कुछ छोटी कविताएं सुनाईं। 

आसिया की ‘उलझी सी तुम’, ‘रात’ और एक शीर्षकविहीन कविता तथा अंचित की ‘अजायबघर’, ‘तुम्हारे लिए’, ‘बस इतना करना समय’, ‘तुम्हारा शहर सपनों का शहर’, श्त्मउमउइमतपदह म्ददंश् आदि कविताओं में नई पीढ़ी की कविता के वैचारिक सरोकार का परिचय मिला, जिसमें आसपास के समाज और संबंधांे के प्रति उनका नजरिया तो था ही, कुछ शाश्वत सवालों और प्रवृत्तियों को जानने-समझने और उनमें अपनी भूमिका तलाशने की कोशिश भी थी। अपने तईं काफी संतुलित रचाव वाली कविताएं इन कवियों के बेहतर भविष्य का परिचय देती लगीं। 

काव्यगोष्ठी में पढ़ी गई कविताओं पर बोलते हुए आलोचक संतोष सहर ने कहा कि नई पीढ़ी के कवियों की कविताएं काफी उम्मीद बंधाने वाली हैं। पुरुष और स्त्री दृष्टि मंे जो भिन्नता होती है, वह भी इनकी कविताओं में जाहिर हुआ। संतोष सहर ने कहा कि कविताएं आज भी बड़े पैमाने पर लिखी जा रही हैं, कई पीढि़यां आज कविता लेखन में सक्रिय हैं। आज की कविता का परिदृश्य काफी विविधता से भरा है। जरूरत यह है कि संगठन इन्हें एक मंच पर ले आएं, ताकि कवि एक दूसरे से भी सीखें और पाठकों व श्रोताओं के सामने भी अपने समय की कविता अपनी संपूर्णता में आ सके। संतोष सहर ने कविता में भाषा, विषय और विचार के स्तर पर सहजता की जरूरत पर भी जो दिया। काव्य-गोष्ठी का संचालन राजेश कमल ने किया। इस मौके पर संतोष झा, अभ्युदय, समता, अभिनव, संजीव, निखिल आदि भी मौजूद थे।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

सुधीर सुमन
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 
s.suman1971@gmail.com


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