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चित्तौड़ की प्रकृति और इतिहास:रमेश टेलर के कैमरे से

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on बुधवार, जनवरी 11, 2012 | बुधवार, जनवरी 11, 2012

कई मर्तबा लिफाफा ही पूरे ख़त के भाव उंडेल देता है.यही बात इन चित्रों से चित्तौड़ जैसे गौरवशाली इतिहास वाले शहर पर एकदम फिट बैठती है. ये सभी छायाचित्र साल दौ हज़ार ग्यारह में  एक मकसद से खींचे गए हों मगर ये केवल चित्र नहीं हो सकते हैं.इनमें से अधिकाँश राजस्थान पत्रिका में बहुत आकारों में छप चुके हैं.चित्तौड़ से प्रकाशित राजस्थान पत्रिका में ये छायाचित्र युवा छायाकार रमेश टेलर के कैमरे से निकले और छपे तो पाठक वर्ग ने बहुत सराहा है.कई साथियों के बीच बातचीत में हमें लगा कि ये चित्र केवल एक केप्सन के साथ छपकर भी समाज में एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते नज़र आते आए.


किले के इतिहास को बखानते ये चित्र कई बार यहाँ के सौंदर्य बिखेरते नज़र आते हैं. अक्सर यहाँ पर्यटन के विकास में इजाफा होता दखा  है. शहर में जहां होटल बढ़ते जा रहे हैं.पर्यटकों की संख्या बढ़ रही हैं.वहीं शहर का रोज़गार भी बढ़ा है. इअमें इन छायाचित्रों को बहुत हद तक क्रेडिट जाता है.छत्र राजनीति से ही सामाजिक कार्यकलापों में सक्रीय रमेश टेलर ने नफ़ा-नुकसान,दैनिक जननायक आदि अखबारों में पत्रकारिता करते हुए यहाँ तक का सफ़र किया है.वे पर्यटन के क्षेत्र में गाईड का कोर्स भी कर चुके हैं.सबसे ख़ास बात तो ये है भी है कि इनका पुस्तैनी मकान भी पुरानी बस्ती में ही स्थित है जो किले में आज भी स्थित हो उसे जीवंत बनाए रखती है.कई किले ऐसी आवाजाही के बगैर जंगल होते देखे हैं.कोई पहचाने या ना जाने ये चित्र हमारे मन में अपने ही किले के प्रति एक विशेष अनुराग पैदा करने को प्रेरित करते हैं.इस युवा छायाकार को 'अपनी माटी' परिवार की तरफ से बहुत शुभकामनाएं कि वे पत्रकारिता करते हुए अपनी ज़मीन का सार्थक बखान करते रहे.लोगो कहें कहे मन में ज़रूर दो बात प्रशंसा में उपजाते होंगे.

समाज और संस्कृति को दिशा देने में मीडिया का बहुत रोल होता है और यहाँ चित्तौड़ जैसे मझोले और शांतिप्रिय  शहर में भी लेखक और पत्रकार साथी अपने ढंग से उसमें जितना संभव है करते दिखे हैं.उसी परम्परा में ये छायाकारी का काम उभरा है.कई मायने में ये दुर्लभ चित्र हमें अपने इलाके बारे में नए एंगल से सोचने को मज़बूर करते हैं. हमारे कई साथी प्रकृतिप्रेमी हैं जो मौक़ा पाते है निकल पड़ते हैं.उन्हें इस तरह के प्राकृतिक चित्र देख दो सौ प्रतिशत प्रेरणा मिलती होगी.

चित्रों में नगर का अनुशासन और अंदाज़ झलकता है.यहाँ होने वाले नितने विकास को भी हम इन्ही फोटो  में देख रहे हैं.जीवन के बहुत से अंदाज़ इनमें समाहित है.जीवन में उत्साह और उमंघ भरते इन चित्रों के एक हिस्से में आप हमारे ही समाज में व्याप्त जीव-जगत से भी मुखातिब होंगे.यहाँ शहर में सूरज के ढलने का अपना विलग अंदाज़ है तो दिन में बादलों के आ घेरने पर भी अखंड खड़े विजय स्तम्भ का एक अनोखा नज़ारा उभरा है.किले के सबसे नए-नवेले महल फ़तेह सिंह महल में दूजी मंजिल पर बने चित्रकारी के नमूने को जग जाहिर करता चित्र भी किसी भी मायने में कम नहीं है.

चित्तौड़ दुर्ग पर बड़ी फ्लड लाईटों की स्थापना होने और लाईट एंड साउंड शो चलने जैसी दो बड़ी घटनाएं हमारी नज़र में इसकी शोभा बहुत दूर तक बढाने में ख़ास रही है. मगर रमेश टेलर ने इन्हें अपने ढंग से कैमरे में कैद कर छापा है.ये एक नज़रिए की बात है. कैमरे हर एक इंसान के पास हो सकते  है मगर कल्पना और तजुर्बा बिलकुल अलग चीजें है.एक पत्रिका में हबीब तनवीर के लिखे छपे आलेख में रंगमंच और फोटोग्राफी आदि जैसी कलाकारियों को लेकर उन्होंने कल्पनाशील व्यक्ति पर ज्यादा जोर दिया था बजाय इसके कि कोई पढ़ा लिखा ही केमरा चला सकता है.हलाकि रमेश टेलर बाकायदा स्नातकोत्तर है.

 अब आप चित्रों का आनंद लीजिएगा.-माणिक 




























योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
रमेश टेलर 
(चित्तौड़गढ़ में वर्तमान में राजस्थान पत्रिका से जुड़े संवाददाता है. मगर इन दिनों ख़ास तौर पर पाठक वर्ग में अपने छायाचित्रों की वज़ह से चर्चा में है.उनसे फेसबुक पर यहाँ क्लिक कर मिला जा सकता है )
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