संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों को आम आदमी के बीच जाना होगा - अपनी माटी 'ISSN 2322-0724 Apni Maati'

चित्तौड़गढ़,राजस्थान से प्रकाशित ई-पत्रिका

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संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों को आम आदमी के बीच जाना होगा


आरा: 8 जनवरी 2012

राकेश दिवाकर, जितेंद्र जी और
 सुधीर सुमन द्वारा बनाए गए पोस्टर 
‘संस्कृतिकर्मियों और बुद्धिजीवियों को आम आदमी के बीच जाना होगा, उनके संघर्षों को अभिव्यक्ति देनी होगी, यही अदम गोंडवी जैसे जनता के शायर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। जनता की सच्चाई की अभिव्यक्ति के लिए रचनाकारों को ज्यादा मेहनत करना होगा।’ जसम, भोजपुर द्वारा आयोजित ‘स्मृति अदम गोंडवी’ नामक कार्यक्रम के मुख्य वक्ता कवि आलोचक जितेंद्र कुमार ने यह कहा.इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए आलोचक रवींद्रनाथ राय ने कहा कि अदम की रचनाएं परिवर्तन का हथियार हैं। उनकी गजलें भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी और शोषण के खिलाफ लगातार खड़ी रहेंगी। भोजपुर में क्रांतिकारी जनांदोलन के साथ अदम की रचनाशीलता का गहरा रिश्ता था। उनकी गजलें यहां के आंदोलनकारियों के जुबान पर रही हैं। 


अध्यक्ष मंडल में शामिल वरिष्ठ आलोचक रामनिहाल गुंजन ने अदम गोंडवी से हुई मुलाकात की चर्चा करते हुए कहा कि समाज के प्रति दायित्व से जुड़ी और जनता के हित में लेखन-चिंतन की जो अदम गोंडवी की परंपरा रही है, उसे आगे बढ़ाना होगा, यही उन्हें याद करने की सार्थकता होगी। रामनिहाल गुंजन ने अपनी कविता ‘नया अमन राग’ का पाठ भी किया।संचालक सुधीर सुमन ने अदम गांेडवी पर लखनउ के संस्कृतिकर्मी श्याम अंकुरम द्वारा लिखे गए एक ‘संस्मरणात्मक स्मृति लेख’ का पाठ किया, जिसमें उनके घुमक्कड़ और विद्रोही स्वभाव तथा क्रांतिकारी वामपंथी राजनीति के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का विस्तार से जिक्र किया गया है।

अदम गांेडवी पर केंद्रित यह कार्यक्रम जनता के प्रति प्रतिबद्ध रचनाशीलता की नई आहट का भी संकेत दे गया। शुरुआत छोटी उम्र की बेहद प्रतिभाशाली गायिका रजनी शाक्या की सुमधुर आवाज में अदम गोंडवी की एक गजल ‘हिदू या मुस्लिम के एहसासात को मत छेड़िए/ अपनी कुर्सी के लिए जज्बात को मत छेड़िए’ से हुआ। उसके साथ उसके भाई ऋषिकेश ने भी अदम की गजल ‘जो डलहौजी न कर पाया वो हुक्काम कर देंगे/ कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे’ को गाकर सुनाया। युवानीति के राजू रंजन ने उनकी रचना ‘सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं/ दिल पर रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है’ और ‘भूख के अहसास को शेरो सुखन तक ले चलो को गाकर सुनाया।  

इस मौके पर अपने तय फैसले के अनुरूप अरुण प्रसाद, राकेश दिवाकर, सुमन कुमार सिंह, सुनील चौधरी, जनगीतकार विजेंद्र अनिल के पुत्र सुनील और अरविंद अनुराग ने नए जनगीतों और कविताओं का पाठ किया। अरुण शीतांश और मिथिलेश ने अदम गोंडवी की गजलों का पाठ किया। शंकर प्रसाद ने पाश की कविता ‘सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना’ की पंक्तियां सुनाईं। छोटी उम्र के निशा कुमारी से लेकर वरिष्ठ कवि जगतनंदन सहाय और जर्नादन मिश्र ने अपनी कविताओं तथा राजदेव करथ, केडी सिंह और केशव प्रसाद ठाकुर ने भोजपुरी की रचनाओं का पाठ किया। शायर ए.के. आंसू और एस.एम. आजाद ने अपनी गजलों के जरिए इस कार्यक्रम को जोश से भरा। संतोष श्रेयांश और सुनील श्रीवास्तव ने अपनी कविताओं के जरिए प्रगतिशील-जनवादी काव्य परंपरा के उर्जावान होने का संकेत दिया। 

इस कार्यक्रम में पूर्वी चंपारण में भिखारी ठाकुर की मंडली के कलाकार सीताराम पासवान के भीख मांगने की खबर पर रोष जाहिर करते हुए एक प्रस्ताव लिया गया, जिसमें कहा गया कि संस्कृति पर लाखों रुपये बहाने वालों के शासनकाल में जनता के संस्कृतिकर्मियों की यही वास्तविक स्थिति है, भोजपुर के संस्कृतिकर्मी इस मुद्दे को लेकर पूर्वी चंपारण के जिलाधिकारी, संस्कृतिमंत्री और मुख्यमंत्री को एक हस्ताक्षरित पत्र भेजेंगे। 


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
सुमन कुमार सिंह द्वारा जारी 
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