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कट-कोपी-पेस्ट:रंगमंच के जीवित रहने के लिए सिरफिरे रंगकर्मी जिम्मेदार हैं

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, जनवरी 06, 2012 | शुक्रवार, जनवरी 06, 2012


 वर्ष 2010 की तुलना में इस बार दिल्ली की स्थापना के सौ वर्ष पूरे होने का तर्क था और दूसरी सहूलियत टैगोर की 150वीं जयंती ने उपलब्ध करा दी। हमारे राजनेताओं को कला-संस्कृति से कितना लगाव है, सांस्कृतिक क्षेत्रों की वास्तविक जरूरतों पर कितनी उनकी नजर जाती है यह बात छिपी हुई नहीं है। तथाकथित सांस्कृतिक विकास की अधिकांश योजनाएं आज तक राजनीतिक या व्यक्तिगत लोकप्रियता के उद्देश्य से ही बनाई जाती रही हैं और उसी रूप में उन्हें लागू भी किया जाता रहा है।

सत्ता की संस्कृति सिद्धांतहीनता, चरित्रहीनता और बुद्धिहीनता के मूल्य पैदा करती है और अच्छे-बुरे के विवेक को धुंधला कर देती है। यह स्थिति उस वक्त एक विडंबना बन जाती है जब सस्ती लोकप्रियता के लिए समुदाय की सांस्कृतिक विरासत को भ्रष्ट और अवमूल्यित करने के राजनीतिक अभियान में वैसे रंगकर्मी और नाट्यदल भी शामिल हो जाते हैं जिनके ऊपर सृजनात्मक श्रेष्ठता के प्रति संवेदनशीलता जगाने और एक सही तथा वास्तविक रंगमंच की स्थापना और विकास के लिए प्रयास करने की गंभीर जिम्मेदारी होती है। लोकप्रियता की कुटिल व्यवसाय-बुद्धि का शिकार होकर वे अपने नैतिक या कलात्मक विवेक को तिलांजलि दे देते हैं और अपने प्रदर्शनों में वास्तविकता के सरलीकृत, इकहरे और आंशिक रूप का, दर्शकों की भावनाओं और जीवन की समस्याओं का भावुकतापूर्ण या बहलाने वाला इस्तेमाल करने लगते हैं। आम आदमी की जिंदगी से, उसके सुख-दुख से उनका कोई रिश्ता नहीं रह जाता और वे सिर्फ मध्य या अभिजात वर्गों की समस्याओं, उलझनों या विकृतियों तक सीमित हो जाते हैं। दिल्ली के समकालीन रंगमंच की स्थिति कमोबेश ऐसी ही दिखाई पड़ती है।

संस्कृति और कला के क्षेत्र में सरकार की अतिशय सक्रियता के इस दौर में अब इस तथ्य को लगभग भुला देने की कोशिश चल रही है कि महानगरों या प्रदेशों की राजधानियों में कुछेक रंगमंडलों अथवा प्रशिक्षण केंद्रों के बाहर हिंदीभाषी क्षेत्र का लगभग सारा ही रंगमंच भयावह समस्याओं से घिरा हुआ है और अगर वह जीवित है तो उसके लिए ऐसे सिरफिरे रंगकर्मी जिम्मेदार हैं जो एक आंतरिक दबाव की वजह से तमाम असुविधाओं को झेलते हुए भी नाटक खेलते रहते हैं। न उनके लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था है, न आजीविका की, न प्रदर्शन के लिए साधन उपलब्ध हैं और न ही रंग-स्थल। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय जैसे एकमात्र संस्थान से प्रशिक्षण लेने के बाद भी उन्हें एक ‘फ्रीलांस‘ रंगकर्मी की अनिश्चयभरी और खानाबदोश जिंदगी बितानी पड़ती है। नाट्य विद्यालय में बमुश्किल दाखिला पाने के बाद भी योग्य और समर्थ शिक्षकों की कमी के चलते वे एक निराशा का शिकार होते हैं। दरअसल देखा जाए तो विद्यालय के प्रशिक्षण का आधार, स्वरूप और पाठ्यक्रम ही दोषपूर्ण है जो छात्रों में किसी प्रकार की संपूर्णता और सार्थकता के अहसास के बजाए असंतोष, हताशा और विध्वंसात्मक बेचैनी पैदा करता है। सरकारी अनुदान और व्यवस्था ने इस संस्थान को भी दफ्तरशाही, वर्ग-भेद और चालू काम करके वेतन हासिल करने की प्रवृत्ति वाला बना दिया है और यह हिंदी क्षेत्र में एक नियमित व्यावसायिक रंग-चेतना और रंग-दृष्टि पैदा करने की अपनी ऐतिहासिक जिम्मेदारी से भटक चुका है।

दिल्ली के रंगमंच की वर्ष भर की गतिविधियों का संपूर्ण लेखा-जोखा प्रस्तुत करना तो यहां संभव नहीं है, पर कुछ प्रमुख आयोजनों की चर्चा आवश्यक लगती है जिन्होंने अलग-अलग कारणों से लोगों का ध्यान आकृष्ट किया। इस क्रम में सर्वप्रथम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के 13वें भारत रंग महोत्सव का उल्लेख किया जा सकता है। 9 से 22 जनवरी तक चलने वाले एशिया स्तर के इस नाट्योत्सव में भारत के अलावा दुनिया के 22 अन्य देशों के 82 नाटकों की भागीदारी रही जिनमें ‘चरणदास चोर‘ (हबीब तनवीर), ‘बिखरे बिम्ब‘ (गिरीश कारनाड), ‘सूरज का सातवां घोड़ा‘ (धर्मवीर भारती), ‘विसर्जन‘ (रबिंद्रनाथ टैगोर) जैसे भारतीय क्लासिक नाटकों के साथ-साथ ‘द लेडी फ्राम द सी‘ (इब्सन), ‘लिटिल बिग ट्रेजडीज‘ (पुश्किन) जैसे प्रसिद्ध नाटकों के नाम उल्लेखनीय हैं। विदेशी खंड में ‘द बारबर आफ सेविल‘, ‘इन विवा‘, ‘सायलेंट वड्र्स‘ (फ्रांस), ‘सैंटा मारिया डी इक्विक: रिवेंज आफ रोमन‘ (अमेरिका) और ‘प्यूटा पेराल्टा‘ (चिली) आकर्षण के केंद्र रहे। हिंदीभाषी क्षेत्र के रंगमंच को उचित प्रतिनिधित्व न मिलने के कारण इस नाट्योत्सव की मंशा और नाटकों की चयन-प्रक्रिया को लेकर सवाल भी उठाए गए।

वर्ष की दूसरी प्रमुख रंगगतिविधि के रूप में अस्मिता द्वारा 5 जून से 10 जुलाई तक आयोजित ग्रीष्मकालीन नाट्योत्सव ने रंगमंच में सार्थकता की बहस को एक बार फिर से केंद्र में लाकर खड़ा किया। समकालीन दिल्ली रंगमंच में नियमितता, स्थिरता और स्तरीयता में लगातार आ रही गिरावट के बीच अस्मिता के नाटकों ने श्रेष्ठ रंगकर्म की संभावनाओं को धुंधला होने से बचाया है और अनुदान पर आश्रित,  संश्लिष्ट और विशिष्टवर्गीय रंगमंच के समानांतर आम आदमी की जिंदगी और नियति से प्रत्यक्षतः जुड़ने वाले विषयों को प्रस्तुत किया है। ‘एक मामूली आदमी‘, ‘कोर्टमार्शल‘, ‘आपरेशन थ्री स्टार‘, ‘अनसुनी‘, ‘मोटेराम का सत्याग्रह‘, ‘रामकली‘, ‘द लास्ट सैल्यूट‘, ‘अंबेडकर और गांधी‘, ‘फाइनल साल्यूशन‘ (सभी का निर्देशन अरविन्द गौड़) जैसे इस उत्सव में शामिल नाटक इसके सशक्त उदाहरण हैं।

सार्थक और उद्देश्यपूर्ण नाटकों की इस शृंखला में 28 नवंबर से 8 दिसंबर के बीच साहित्य कला परिषद और कला, संस्कृति एवं भाषा विभाग द्वारा आयोजित भारतेंदु नाट्य उत्सव की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। ‘त्यागपत्र‘ (राजिंदर नाथ), ‘ओ‘ (सोहेला कपूर), ‘सब ठाट पड़ा रह जाएगा‘ (रंजीत कपूर), ‘वापसी के बाद अयोध्या बाबू‘ (देवेंद्र राज अंकुर), ‘गर्भ‘ (तोरित मित्रा), ‘सुकरात‘ (बापी बोस), ‘एक इंस्पेक्टर से मुलाकात‘ (सतीश आनंद) और ‘तमाशा न हुआ‘ (भानु भारती) जैसे नाटकों में दर्शकों की बड़े पैमाने पर भागीदारी हुई और उन्होंने काफी हद तक दर्शकों को समकालीन सवालों से जोड़ा। हिंदी अकादमी द्वारा 6-9 नवंबर के बीच आयोजित नाट्योत्सव में ‘हिंदी काव्य परंपरा‘ (राजनारायण बिसारिया), ‘तमाशा न हुआ‘ (भानु भारती) और ‘सिंदूर की होली‘ (हेमंत मिश्र) की प्रस्तुति की गई। अकादमी द्वारा ही 15 नवंबर को राबिन दास के निर्देशन में मुक्तिबोध की कविताओं पर आधारित अशोक चक्रधर के नाट्यालेख ‘स्याह चंद्र का फ्यूज बल्ब‘ की प्रायोगिक प्रस्तुति की गई जो दर्शकों को प्रभावित कर पाने में नाकाम रही।

संगीत नाटक अकादमी के कला उत्सव (23-31 जुलाई) के अंतर्गत इस वर्ष ‘अज्ञातवास‘ (बांग्ला), ‘कुर्चि‘ (तेलुगु), ‘क्वालिटी स्ट्रीट‘ (हिंदी), ‘बहादुर कलारिन‘ (अवधी), ‘भारुद‘ (मराठी) और ‘त्यागपत्र‘ (हिंदी) का मंचन किया गया। इसी प्रकार राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के ग्रीष्मकालीन नाट्योत्सव में 19 मई से 16 जून के बीच ‘बाणभट्ट की आत्मकथा‘ (एम.के. रैना), ‘राम नाम सत्य है‘ (चेतन दत्तार), ‘लिटिल बिग ट्रेजडीज‘ (ओव्ज्याकुली खोद्जाकुली), ‘कामरेड कुंभकरण‘ (मोहित तातालकर), ‘ब्लड वेडिंग‘ (नीलम मान सिंह), ‘जात ही पूछो साधु की‘ (राजिंदर नाथ), और ‘बेगम का तकिया‘ (रंजीत कपूर) की प्रस्तुति की गई। इनमें ‘बाणभट्ट की आत्मकथा‘ और ‘लिटिल बिग ट्रेजडीज‘ ने दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। 2-7 मार्च के बीच आयोजित छठे महिंद्रा नाट्योत्सव में इस बार 10 नाटकों का मंचन हुआ और वर्ष के मध्य में आयोजित गुलजार नाट्योत्सव ‘मेरा कुछ सामान‘ भी गुलजार की उपस्थिति के कारण आकर्षण का केंद्र रहा।

उत्सवों की इस सूची में यदि जश्ने बचपन (रानावि टीआई कंपनी), शार्ट एंड स्वीट थिएटर फेस्टिवल, 10वें ओल्ड वल्र्ड थिएटर फेस्टिवल तथा साहित्य कला परिषद द्वारा दिल्ली सरकार के सहयोग से 15 से 23 अक्टूबर के बीच फिरोजशाह कोटला में भानु भारती के निर्देशन में मंचित नाटक ‘अंधायुग‘ को जोड़ लिया जाए तो सांस्कृतिक विस्फोट की एक अचंभित करने वाली तस्वीर उभरती है। इन उत्सवों के शोरगुल में वर्ष भर छिटपुट रूप से होने वाली प्रस्तुतियों की भले ही कम चर्चा हुई हो पर इससे उनका महत्व कम वहीं हो जाता। ऐसी कुछ प्रस्तुतियों में ‘मुक्तिपर्व‘ (मैलोरंग), ‘रूप अरूप‘ (शब्दाकार), ‘मैकबेथ‘ (रानावि), ‘जिस लाहौर नईं देख्या‘, ‘ताजमहल का टेंडर‘ (मित्र), ‘गालिब इन न्यू डेल्ही‘, ‘मौलाना आजाद‘, ‘संस आफ बाबर‘, ‘1857‘, ‘राजा नाहर सिंह‘ और ‘गालिब के खत‘ (सभी पैरट्स ट्रुप) आदि प्रमुख हैं।

पंजाब के योद्धा रंगकर्मी गुरुशरण सिंह और नाटककार बादल सरकार का जाना इस वर्ष रंगमंच के लिए अपूरणीय क्षति वाला रहा। आधुनिक भारतीय रंगमंच में युगांतर स्थापित करने वाले इन दोनों ही रंगकर्मियों ने रंगमंच को जनोन्मुख बनाने में ऐतिहासिक योगदान दिया है। रानावि से जुड़े मंच परिकल्पक, चित्रकार और जाने-माने रंगशिक्षक एच.वी. शर्मा के निधन से भी रंगजगत शोकसंतप्त हुआ। कुल मिलाकर यह वर्ष सरकार प्रायोजित उत्सवों का रहा और इस चकाचैंध में रंगमंच के तमाम बुनियादी सरोकार हाशियों पर चुटकुला बनते रहे। रंगकर्मियों ने असुविधाजनक सवालों से परहेज किया और धारा के साथ रहे। यह स्थिति भविष्य में एक बड़े संकट की ओर इशारा करती है।


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-

दैनिक भास्कर में प्रकाशित ये रचना पाठक हित में यहाँ कट-कोपी-पेस्ट की है.
राजेश चन्द्र
(कवि, रंगकर्मी, अनुवादक एवं पत्रकार)




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