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जानकारी :मुंगेर के ऐतिहासिक किले के भीतर

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, जनवरी 20, 2012 | शुक्रवार, जनवरी 20, 2012

 मुंगेर के ऐतिहासिक किले के भीतर देखने सुनने और समझने के लिए किनी चीजें है इसका वर्णन करना संभव नहीं है। परन्तु किले के मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर सबसे उंची और भव्य इमारत दिखाई पड़े वह मुंगेर योगाश्रम है। मुंगेर योगाश्रम का निर्माण महायोगी ब्रह्मलीन परमहंस स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने स्वयं अपनी कल्पनाओं के अनुरुप कराया था। कर्णचौरा के नाम से अभिहीत था यह भू-खण्ड। कहा जाता है कि महादानी कर्ण प्रतिदिन सवा मन सोना इसी स्थान पर दान दिया करते थे। कालांतर में इस्ट इंडिया कम्पनी के गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स अपने पत्नी के आरोग्य लाभ के लिए इसी भू-खण्ड पर हवा महल का निर्माण करवाया था। बाद में मिदनापुर के जमींदार ने इस महल को खरीद लिया था। सौ साल पूर्व तक वह भवन आबाद रहा जिसमें शताधिक कमरे बने हुए थे जो बाद में रूग्ण हो गए।


स्वामी सत्यानन्द सरस्वती जब स्वनामधन्य केदारनाथ गोयनका के जलमंदिर के बगलवाले योगाश्रम में निवास करते थे, तब एक दिन वे किसी कारणवश मुंगेर जिले के भीतर गये तो उस कर्णचौरा पर दृष्टि पड़ी, जो पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुका था। स्वामी सत्यानंद जी को वह स्थान अत्यंत जाग्रत दिखाई पड़ा। उन्होंने उस भू-खण्ड को साधना स्थली के लिए प्रयुक्त मानकर खरीद लेने का निर्णय किया। इस भू-खण्ड को स्वामी जी ने बिहार योग विद्यालय का नाम दिया। मगर उस भू-खण्ड के खरीदने के साथ ही विरोध बवंडर उठ खड़ा हुआ क्योंकि सैकड़ों की संख्या में असामाजिक तत्वों ने खंडहरनुमा इमारत में आश्रम ले रखा था परन्तु स्वामी जी जो एक बार निर्णय लेते थे उसे बदलते नहीं थे। उन्होंने विरोध का सामना भी बड़ी संजीदगी और दृढ़ता के साथ करना षुरू किया।

सर्वप्रथम भू-खण्ड की चहारदीवारी की नींव दे डाली मगर विरोध की आंधी बढ़ती गयी और फाटक लगते ही पथराव षुरू हो गया। बातें कोर्ट कचहरी तक गयी पर सभी विरोधियों को मुंह की खानी पड़ी। स्वामी जी ने खंडहरनुमा इमारत को हटा कर सतमंजिले अट्टालिकानुमा इमारत को हटा कर सतमंजिले मठ के रूप में कराया। उसी परिसर में गंगा-दर्शन एवं उसके बगल में साधना भवन का निर्माण करवाया गया जहां अखण्ड ज्योति जलती रहती है। छात्रावास, इमारत खण्डों, सन्यासी भवनों आदि का निर्माण करवाया गया। अनेक भाषाओं के दर्जनों ग्रन्थ यहां उपलब्ध हैं। योग अनुसंधान के लिए पर्याप्त सामग्रियां हैं और इस आधार पर शोध अनुसंधान के कार्य लगातार चलते रहते हैं। पीएचडी, डीलिट् आदि के शोधार्थी निचले तल पर ही जमे रहते हैं, क्योंकि षोध अनुसंधान के लिए षांत-एकांत स्थान और वातावरण का होना निहायत जरूरी है। छठी मंजिल पर योगाश्रम के प्रधान, योग विश्वविद्यालय, ‘बिहार योग भारती’ के कुलाधिपति परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती का निवास स्थान है। सातवें मंजिल पर इस शिवानंद मठ के अधिवक्ता और युगपुरूष स्वामी सत्यानंद सरस्वती को स्थापित कर रखा गया है।

भवन की दूसरी ओर तीसरी मंजिल पर विशाल सभागार भी निर्मित है। यहां दीक्षांत समारोह एवं अन्य बड़ी सत्संग सभाओं के आयोजन किये जाते हैं। भारत के राश्ट्रपति महामहिम डा.एपीजे अब्दुल कलाम के सम्मान में दूसरी मंजिल पर ही वृहत आयोजन किये गए थे। आश्रम के मुख्य भवन के पूरब की तरफ स्वामी जी की पूजा स्थली है।उत्तर दिशा में विदेषी छात्रावास है तो पष्चिम में अतिथिशाला, रसोईघर-भोजनालय भवन निर्मित है। पश्चिमी दिशा में मुख्य भवन और रसोई घर के बीच एक मंजिल भवन निर्मित है, जिसमें उपरी मंजिल पर अम्मा जी का निवास और छात्रावास है। भवन के निचले तल पर भी छात्रावास ही है। छात्रावास भवनों का निर्माण भी व्यवस्थित ढंग से किया गया है। इस छात्रावास में केवल विदेषी छात्र रहते हैं तो दूसरे खंड में विदशी साधक सन्यासियों के रहने का स्थान है। इसी तरह किसी छात्रावास में भारतीय छात्र-छात्राएं रहते हैं तो किसी खंड में भारतीय साधु सन्यासी रहते है। छात्रावासों की व्यवस्था ऐसी है कि छात्र-छात्राओं और साधु सन्यासियों के बीच कोई अंतर नहीं रहता। सन्यासी और छात्र भी स्नेहिल वातावरण में काम करते हैं और पूर्णतः अनुषासित होकर। अनुषासन इस आश्रम की खास विषेशता है। सैकड़ों की संख्या में कुछ न कुछ काम करते हैं, किंतु अखंड शांत वातावरण में। यहां का वातावरण भारतीय यौगिक संस्कृति के अनुरूप इतना गरिमापूर्ण बना दिखता है कि विदेषी छात्र और साधक भी एक नयी प्रेरणा लेकर उस वातावरण में रम जाते हैं।

आश्रम का दक्षिणी गेट मुख्य द्वार है, जहां भीतर प्रवेष करने के लिए स्वामियों की अनुमति की अनवार्य आवष्यकता होती है। इस आश्रम के चतुर्दिक नैसर्गिक प्राकृतिक प्रवेष हर किसी का मन मोह लेता है। मुख्य द्वार से सटे बंदूक कारखाना है, जहां खुफिया विभाग की देखरेख में बंदूकों का निर्माण होता है। उसी से सटे कर्णचौरा विद्युत ग्रीड है। पार्श्ववर्ती खाई और तालाब का सौंदर्य सैलानियों को मुग्ध कर देता है। योगाश्रम से पष्चिम किले का उŸारी द्वार है, जहां अंग्रेजों के साथ मीरकासिम का युद्ध हुआ था। इस द्वार से सटे जयप्रकाष उद्यान और इस्ट इंडिया के नाम पर कंपनी-गार्डेन, उससे सटे मुंगेर का सुंदर सर्किट हाउस। तात्पर्य यह कि मुंगेर का यह योगाश्रम चतुर्दिक प्राकृतिक सुषमा से आवृŸा सैलानियों के आर्कषण का एक केंद्र बन गया है। शिवानंद मठ के इस भवन की उपरी मंजिल पर से देखने पर मुंगेर शहर का प्राकृतिक सौंदर्य देख कर मुग्ध रह जाना पड़ता है। एक तरफ विंध्य पर्वत की श्रृंखला और दूसरी तरफ मां भागिरथी की अविरल कलकल-छलछल बहती धारा। स्वामी सत्यानंद जी ने इस पहाड़ी टीले, जिस पर योगाश्रम अवस्थित है, यहां से गंगा के सौंदर्य को देख कर ही ‘कुटीर’ का नाम गंगा दर्शन रखा था। स्पष्ट है कि इस योगाश्रम का जितना महत्वपूर्ण इतिहास है उतना ही उसका भूगोल भी। 

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


सज्जन कुमार गर्ग
द्वारा हरिश्चन्द्र गर्ग
सदर बाजार मारवाड़ी मोहल्ला
पोस्ट-जमालपुर
जिला-मुंगेर
मो0-09931554140
garg.sajjan@gmail.com
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