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यह तश्ना की है ग़ज़ल,इसमें गाने.बजाने को कुछ नहीं

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, जनवरी 15, 2012 | रविवार, जनवरी 15, 2012


कविता-पाठ In लखनऊ

‘हमें दुश्मन मिटाना चाहते हैं
समन्दर को सुखाना चाहते हैं
जरा इनकी हिमाकत आप देखें
ये सूरज को बुझाना चाहते हैं’ 

ये काव्य पंक्तियाँ हैं उर्दू के वरिष्ठ शायर तश्ना आलमी की। तश्ना आलमी ने उत्तर  प्रदेश के चुनाव के राजनीतिक माहौल से निकाल कर अपने शेरो शायरी की दुनिया से लखनऊ के श्रोताओं को रू ब रू कराया। कार्यक्रम का आयोजन जन संस्कृति मंच द्वारा 14 जनवरी, शनिवार को लेनिन पुस्तक केन्द्र में हुआ जिसमें तश्ना ने अपनी कई गजलें व नज्म सुनाई। लोगों ने उनकी शायरी के विविध रंगों का आनन्द लिया। ठण्ड के मौसम में कविता के ताप को महसूस किया।

तश्ना की गजलों में जहाँ समंदर की विशालता है वहीं यह सूरज की तरह है जो सारी दुनिया को जीवन व प्रकाश देता है। तश्ना अपनी गजलों द्वारा आम आदमी के संघर्ष व हिम्मत को सामने लाते हैं और उन लोगों की खबर लेते हैं जो मनुष्य विरोधी हैं: 

‘खुदा जाने ये कैसे बागबाँ हैं
यहाँ ये जंगल लगाना चाहते हैं’

आम आदमी के दर्द को अपनी शायरी में तश्ना पिरोते हैं। शहर में रहते हुए आम आदमी के पास एक छत नहीं, खानाबदोश जैसी जिन्दगी है। एक मकान का सपना लिए जी रहे लोगों के दर्द को तश्ना यूँ बयाँ करते हैं: 

‘तुम्हारे शहर में खानाबदोश रहना क्या
मैं बेनिशान हूँ कोई निशान हो जाय
सड़क हो नाला हो कि फुटपाथ के तले
मैं चाहता हूँ अपना मकान हो जाय’। 

यही दर्द और आम आदमी का संघर्ष तश्ना की शायरी में विस्तार पाता है - 

‘जलते सिकम की आग बुझाने को कुछ नहीं
बच्चे बिलख रहे खिलाने को कुछ नहीं
फांके के साथ साथ अंधेरा है शाम का
चूल्हा तो क्या चिराग जलाने को कुछ नहीं
जुम्मन अरब चले गये रोजी की फिक्र में
हिन्दोस्तां में जैसे कमाने को कुछ नहीं
कव्वाल क्या करेंगे यह तश्ना की है गजल
इस शायरी में गाने बजाने को कुछ नहीं’

तश्ना की शायरी प्रेम, संघर्ष व श्रम से निर्मित होती है। इसीलिए इसमें श्रम का सौंदर्य है तो आपस में भरोसा है। तश्ना कहते हैं:

‘हम खुशबू की तरह फैले हैं दुनिया भर में
लोग खुशबू को गिरफ्तार करेंगे कैसे ?’

25 अप्रैल 1943 को देवरिया के सलेमपुर में जन्मे तश्ना आलमी ने अपनी साहित्य यात्रा के बारे में बताया कि समाज की विसंगतियों से जूझते हुए वे वामपंथ की ओर आये। शायरी में अपने अहसास व विचारों को व्यक्त करने लगे। गांव से उन्हें अब भी बड़ा लगाव है। वहाँ गरीबी जरूर है पर प्यार भी कम नहीं है। लखनऊ के बशीरतगंज में रहते हुए तश्ना ने बच्चों को उर्दू पढ़ाया। अब रिटायर हो चुके हैं। कुछ डाक्टरी भी कर लेते हैं। लोग उन्हें शायर, मास्टर साहब, डाक्टर साहब व कामरेड जैसे पुकारते हैं। यह सब उन्हें अच्छा भी लगता है। इसमें लोगों का स्नेह व अपनापन है। यही उनकी ताकत है। तश्ना ने बताया कि वे मुशायरे में भी जाते हैं लेकिन मुशायरे के स्वरूप में आये बदलाव से खफा हैं। तश्ना को धर्म की कट्टरता पसन्द नहीं। इनका गंगा जमुनी तहजीब और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर यकीन है।

तश्ना आलमी के इस कविता पाठ कार्यक्रम में भगवान स्वरूप कटियार, बी एन गौड़, अनिल श्रीवास्तव, कल्पना पाण्डेय, गंगा प्रसाद, महेश सत्यार्थी, अवधेश कुमार सिंह, सुधांशु बाजपेई, संजय, कौशल किशोर आदि भी मौजूद थे। श्रोताओं ने तश्ना आलमी से आज की उर्दू शायरी को लेकर कई सवाल किये। धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ कवि बी एन गौड़ ने दिया। 


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


कौशल किशोर,जन संस्कृति मंच,लखनऊ के संयोजक हैं.लखनऊ-कवि,लेखक  के होने साथ ही जाने माने संस्कर्तिकर्मी हैं.
एफ - 3144, राजाजीपुरम,
लखनऊ - 226017
मो - 08400208031, 09807519227
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