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पिछले तीन साल से कविता नहीं लिख रहे हैं!...उद्भ्रांत

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on गुरुवार, जनवरी 05, 2012 | गुरुवार, जनवरी 05, 2012

लखनऊ। 

वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत की कविताओं के बहाने समकालीन कविता की संभावना और उसके संकट पर दैनिक ‘जनसंदेश टाइम्स’ के कसमंडा हाउस स्थित कार्यालय में गंभीर विचार मंथन हुआ। उद्भ्रांत ने अपनी काव्य यात्रा और रचना प्रक्रिया पर वक्तव्य दिया और अपनी एक दर्जन से ज़्यादा पसंदीदा कविताओं का पाठ किया।

एक छांदस मन के गीत में बहने से लेकर कविता से मोह और फिर मोहभंग, लंबी कविता यात्रा के मध्य रचने की निरर्थकता से सामना और फिर बक़ौल नामवर ‘प्रतिभा के विस्फोट’ तक की कथा बताते हुए एक पल यह कहकर उन्होंने लोगों को अचंभित भी किया कि पिछले तीन साल से वे कविता नहीं लिख रहे हैं! विविध रंग, तेवर और शैली की जो कविताएं उन्होंने पढ़ीं, उनमें ‘बचे हुए लोगों से’, ‘अधेड़ होती औरत’, ‘बड़ी हो रहीं बेटियाँ’, ‘स्त्री की जगह’, ‘इस्तरी’, ‘डायन’, ‘हाँडी, ‘प्रेत’, ‘चालीस’, ‘तलाक़-तलाक़’, ‘कबाड़ी’, ‘चूहे, ‘स्वाहा’, ‘डॉलर’ प्रमुख रूप से शामिल थीं। ‘अभिनव पांडव’ महाकाव्य के कुछ अंश भी उन्होंने सुनाये। मुद्राराक्षस ने हिन्दी भाषा का काठिन्य और प्रामाणिक आलोचना की अनुपस्थिति को हिन्दी कविता के लिए बड़े संकट के रूप में रेखांकित किया।

‘जनसंदेश टाइम्स’ ने एक नयी रचनात्मक पहल करते हुए इस एकल काव्यपाठ का आयोजन किया। वरिष्ठ साहित्यकार मुद्राराक्षस की गरिमा भरी अध्यक्षता में शहर के अनेक साहित्यकार और प्रबुद्धजन गोष्ठी में मौजूद थे। आलोचक वीरेन्द्र  यादव, डॉ. गिरीश श्रीवास्तव, चंद्रेश्वर, प्रो. रमेश दीक्षित, शालिनी माथुर, अनूप श्रीवास्तव समेत। लोगों ने ध्यान से उद्भ्रांत की कविताएं सुनी। चर्चा सत्र में विचारोत्तेजक बातें हुईं।  कवि चंद्रेश्वर ने उद्भ्रांत को लंबी कविताओं का मुखर कवि कहा। उन्होंने राजेश जोशी के सूत्रों के अनुसार ‘वर्टिकल’ और ‘हारिजांटल ऐक्सिस’ के काव्यशास्त्र पर कसते हुए उद्भ्रांत को पुरानी धारा की कविता के खेमे में ला खड़ा किया तथा उन्हें ‘वर्टिकल ऐक्सिस’ का कवि घोषित करते हुए समकालीन रचना धारा से अलग देखने की कोशिश की।

शालिनी माथुर ने उद्भ्रांत से अपने अपरिचय का ज़िक्र करते हुए बताया कि किस तरह उन्हें छात्र जीवन में पढ़ी गई उद्भ्रांत की कविता की कुछ पंक्तियां याद हैं। उनका जोर था कि कविता का महत्त्व है, कवि का नहीं लेकिन पहली बार उन्होंने उद्भ्रांत को सुना है और कह सकती हैं कि उनकी रचनाओं में हर जगह विचार हैं, माइल्डनेस है, विनम्रता है। ‘अंधेरे के समुद्र’ के आश्वासन का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कि चालीस साल पहले भी यह बात सही थी, आज भी प्रासंगिक है। यही कविता का समय को लांघना है।

प्रो. रमेश दीक्षित ने उनके रचना फ़लक के विस्तार की प्रशंसा करते हुए एक कविता ‘अधेड़ होती औरत’ के संदर्भ में उनके दृष्टिकोण से असहमति जतायी और कहा कि उद्भ्रांत प्रगतिशील धारा के कवि हैं लेकिन इस कविता से लगता है कि उनके भीतर सामंती अवशेष हैं। उनकी ‘प्रेत’ कविता में खामखाँ मार्क्स को घसीटे जाने पर भी उनका ऐतराज था। सुरेंद्र विक्रम का अंदाज़ कुछ सवालिया था। वे जानना चाहते थे कि कवि ने बहुत सारे मिथक तोड़े हैं, उन्हें इसमें पीड़ा भी हुई होगी-कब, कैसी, कहाँ?

डॉ. गिरीश श्रीवास्तव ने चंद्रेश्वर की स्थापना का प्रतिवाद करते हुए कहा कि कवि का मुखर होना कोई बुरी बात नहीं है। उद्भ्रांत विद्रोही चेतना के कवि हैं। उनकी बेचैनी उन्हें मिथकों की ओर ले जाती है और वे उन्हें यथारूप ग्रहण नहीं करते, उन्हें आगे ले जाते हैं, आज के संदर्भों से जोड़कर उनकी पुनर्रचना करते हैं। उन्हें मैं आज का राहुल सांकृत्यायन कहता हूँ, उन्हें समझना पड़ेगा। वरिष्ठ पत्रकार अनूप श्रीवास्तव ने कहा कि उद्भ्रांत समय के साथ बदलते रहे हैं, इसीलिए सार्थक रचते रहे हैं। प्रताप दीक्षित ने प्रो. रमेश की सामंती दृष्टिकोण की टिप्पणी से असहमति जतायी।

मुद्राराक्षस  ने अपने अध्यक्षीय दो-टूक में कई महत्त्वपूर्ण बातें कहीं। उन्होंने ‘तलाक़-तलाक़’ कविता का संदर्भ लेते हुए मुस्लिम समाज के बदलते चेहरे का ज़िक्र किया और बताया कि गाँवों का पता नहीं, पर पिछले नौ साल से लखनऊ में इस तरह से कोई तलाक़ नहीं हुआ। उन्होंने उद्भ्रांत को सचेत किया और उन हिन्दी कवियों को भी जो संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग करते हैं। कठिन भाषा की ऐसी कविताएं आम लोगों तक नहीं पहुँच पातीं। मुक्तिबोध एक श्रेष्ठ कवि हैं लेकिन उन्हें कितने लोग जानते हैं। मजाज के बारे में पूछिये, ग़ालिब के बारे में पूछिये, तमाम लोग बता देंगे। यह हिन्दी का दुर्भाग्य है, भाषा ही इसे लोगों से काट रही है, दूर कर रही है। कविता की वर्टिकल, हारिजांटल अवधारणा का उपहास करते हुए उन्होंने पूछा, ये खड़ी या लेटी कविता क्या है? कविता के लिए सबसे बड़ा खतरा है, उसके आलोचक का न होना। अच्छी कविताएं लिखी जा रही हैं लेकिन उनका मूल्यांकन कहाँ हो रहा है? हिन्दी की आलोचना पंगु है, बल्कि लुंज-पुंज है। लोग भाषण करके काम चला रहे हैं ताकि बात बदलने या बात मुकरने में ज़्यादा कठिनाई न हो। प्रामाणिक आलोचना की अनुपस्थिति एक तरह का षड्यंत्र है। यहाँ-वहाँ की भाषणबाजियाँ साहित्यिक विवचेना में शामिल नहीं होंगी।
इस अवसर पर उपस्थित गणमान्य प्रबुद्धजनों में प्रतुल जोशी, उषा राय, उदय यादव, हेमंत कुमार, डॉ. अवधेश मिश्र, डॉ. रहीस सिंह, नित्यनाथ तिवारी, इंदु पांडेय, ओम प्रकाश नदीम, अनिल कुमार श्रीवास्तव, विनायक अविनाश मिश्र भी शामिल थे। पूरी कुशलता और कौशल के साथ संचालन की बागडोर संभाली कौशल किशोर ने।

उनकी एक पुस्तक की समीक्षा यहाँ पढी जा सकती है.

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
सुनील तोमर 
suniltomar95@gmail.com

कट्कोपी पेस्ट लिंक 
-जनसंदेश टाइम्स (लखनऊ), सोमवार, 12 दिसम्बर, 2011
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