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यह सलामी दोस्तों को है मगर/ मुट्ठियां तनती हैं दुश्मनों के लिए

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on रविवार, जनवरी 15, 2012 | रविवार, जनवरी 15, 2012

आरा,बिहार


13-14 जनवरी बिहार के आरा शहर में दो कार्यक्रमों में शामिल हुआ। पहले दिन शहीद कामरेड सूफियान के स्मृति दिवस के अवसर पर वामपंथी दल भाकपा-माले द्वारा आयोजित प्रतिवाद सभा में था और दूसरे दिन जनवादी लेखक संघ द्वारा आयोजित एक कविता गोष्ठी में। ये दोनों अलग-अलग किस्म के कार्यक्रम थे, परंतु दोनों  कार्यक्रमों में मुझे कवियों और संस्कृतिकर्मियों का जो राजनीतिक-सामाजिक सरोकार और उनकी जो फिक्र देखने को मिली, वह बहुत आश्वस्त करने वाला है। 

सूफियान ने किशोर उम्र में शहरी गरीबों और फुटपाथी दुकानदारों के संघर्षों से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की थी। देश की राजनीति को सांप्रदायिक एजेंडे पर धुव्रीकृत रखने वाली राजनीतिक ताकतों ने आरा शहर में जब भी दंगे का माहौल बनाया, सूफियान ने अपनी पार्टी के साथियों के साथ उसका सफल प्रतिवाद किया। तीन-तीन बार ऐसी साजिशें नाकाम हुईं। इन्हीं राजनीतिक पार्टियों के संरक्षण में पलने वाले अपराधियों ने जब शहर के आम अवाम का जीना मुश्किल कर दिया, तब उन्होंने लगातार उनके खिलाफ संघर्ष किया और उसी संघर्ष में शहीद भी हुए। बेशक उन्होंने मुस्लिम समुदाय के अपराधियों का भी मुखर प्रतिवाद किया और पूरे मुस्लिम समुदाय को अपराधी के तौर पर प्रचारित किए जाने की घृणित राजनीति का मुंहतोड़ जवाब दिया। उन्होंने नागरिकों का ध्यान अपराध के राजनैतिक संरक्षकों की ओर खींचा। जाहिर था कि विकास योजनाओं की लूट के अपराध-तंत्र का जो संचालन करते हैं, उनकी आंखों की भी वे किरकिरी थे। 

अपराधी-राजनेता गठजोड़ के पालतू कुछ मीडियाकर्मियों ने उनकी हत्या को आपसी रंजिश का परिणाम बताया था। चार साल गुजर चुके हैं, पर मैं का. सूफियान को नहीं भूल पाया। एक कारण यह भी था कि वे अपनी जिम्मेवारियों को निभाने के प्रति जितने प्रतिबद्ध थे, उतने ही सांस्कृतिक मोर्चे के साथियों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते थे। जब हमने भोजपुर के क्रांतिकारी कम्युनिस्ट आंदोलन के एक नायक का. जगदीश मास्टर पर महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘मास्साहब’ की नाट्य प्रस्तुति की थी, तब भी उन्होंने हमारी मदद की थी। उनकी देखरेख में ‘साझी शहादत साझी विरासत’ के नाम से रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला पर एक भव्य आयोजन हुआ था। आरा शहर का अबरपुल मुहल्ला उस रोज लाल झंडों से सजा हुआ था। वहां तब एक स्थानीय गायन की टीम भी उभरी थी, जिसने बिस्मिल और अशफाक की गजलों को गाया था।


का. सूफियान की शहादत के बाद निश्चित तौर पर कामकाज की गति इस इलाके में थोड़ी धीमी हुई है। जैसा कि प्रतिवाद सभा में जसम, बिहार के राज्य अध्यक्ष कवि आलोचक रामनिहाल गुंजन ने कहा कि अपराध अमर नहीं होता, अपराध के खिलाफ लड़ाई अमर होती है, तो इस लड़ाई को जारी रखने के संकल्प में कार्यकर्ताओं के साथ साहित्यकार-संस्कृतिकर्मियों की आवाज भी पूरी निर्भीकता के साथ व्यक्त हो रही थी। गुंजन जी ने महान क्रांतिकारी कवि ब्रेख्त के हवाले से कहा कि अंधेरे वक्त में भी अंधेरे के खिलाफ गीत गाए जाएंगे। उन्होंने शमशेर को भी उद्धृत किया, जिनका उसी रोज जन्मदिन था- यह सलामी दोस्तों को है मगर/  मुट्ठियां तनती हैं  दुश्मनों के लिए। 

यह था एक वरिष्ठ कवि आलोचक का सरोकार, जो हमारी पीढ़ी के लिए भी प्रेरणा का काम कर रहा था। कवि सुमन कुमार सिंह भी मंच पर पहुंचे और कहा कि वे सूफियान की हत्या के प्रतिवाद के साथ-साथ पूरे बिहार में बढ़ रही आपराधिक गतिविधियों के प्रति भी अपना प्रतिवाद दर्ज करते हैं। मैंने का. सूफियान पर लिखी गई अपनी कविता तो सुनाई ही, युवानीति के कलाकारों ने रंगकर्मी-गीतकार अरुण प्रसाद द्वारा हाल में रचित एक जनगीत, जो शहीद गीत भी है- ‘साथिया रात सपने में आके तूने मुझको बहुत है सताया’ सुनाया। यह गीत उन्होंने खासतौर पर जनगीतकार अदम गोंडवी की स्मृति में जसम द्वारा आयोजित पिछले एक कार्यक्रम के लिए लिखा था, जिसमें एक पंक्ति यह भी आई कि ‘तेरे हत्यारे कुछ तो सलाखों में हैं, और उससे भी ज्यादा निगाहों में हैं’।

कवि की निगाह आज कहां-कहां है, यह दिखा दूसरे दिन जलेस की गोष्ठी में। हाल में नवें दशक के एक चर्चित कवि ने जिस तरह एक अखबार में राहुल गांधी का शर्मनाक तरीके से महिमा मंडन किया था, उससे मैं बेहद आहत था, लेकिन इस कविता गोष्ठी में संतोष श्रेयांश ने मानो अपनी लंबी कविता के जरिए इस तरह की सत्तापरस्ती का जवाब दे दिया। काव्यात्मक लिहाज से थोड़ी कमजोर, पर जनसरोकार और कथ्य के लिहाज से मजबूत उनकी कविता युवा कवियों की राजनीतिक सचेतनता और प्रतिवाद का बेहतरीन उदाहरण लगी। सत्ताधारियों के पाखंड, धोखाधड़ी और उनकी चालबाजियों के खिलाफ ऐसा ही मुखर अंदाज सुमन कुमार सिंह के गीत और कविता में भी मिला। रोजगार के चक्कर में बिछड़ने वाले अपने दोस्त को याद करते हुए  किस तरह  कवि की पीड़ा उस  नौजवान के परिवार और समाज की पीड़ा तक फैलती जाती है और किस तरह लोगों को विस्थापित करने और परस्पर लड़ाने वाला राजनीतिक तंत्र उसके सवालों के दायरे में आता है, यह हमने सुनील श्रीवास्तव की कविता को सुनते हुए महसूस किया। कुर्बान आतिश की गजलें आज के दौर के अहम सवालों को उठा रही थीं और ए.के, आंसू की गजल तो आज के वक्त के तकाजें क्या क्या हैं, उसी की सूची गर्मजोशी के साथ पेश कर रही थीं। वरिष्ठ कवि जगदीश नलिन, श्रीराम तिवारी, जगतनंदन सहाय से लेकर राजाराम प्रियदर्शी, कुमार वीरेंद्र, अमृता प्रिया आदि तक समकालीन कविता का एक बड़ा रेंज सामने था। और आखिर में थी जनवादी कथाकार-गजलगो नीरज सिंह की जरूरी हिदायतें- 

तमाम कोशिशें कि रौशनी मयस्सर हो
तमाम बंदिशें न हो सकें सहर लिखना
नई है बात कि कांटे बहार पर काबिज
खड़े हैं फूल किनारों पर नत नजर लिखना
खड़े वो महल बसेरा है जिनमें बाजों का
गिरे हैं जलजले से बुलबुलों के घर लिखना
तमाम हाल शहर का बयां करो न करो
जरूर लिखना कि लिखना है बाअसर लिखना। 

कविताओं और गजलों में आज की व्यवस्था के प्रति असंतोष के स्वर और उससे टकराव की आकांक्षा को इस गोष्ठी में मौजूद प्रो. पशुपतिनाथ सिंह और सुधाकर उपाध्याय ने ठीक ही लक्षित किया और उन्होंने जीत की उम्मीद भी जाहिर की। 


योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-



सुधीर सुमन
सदस्य,
राष्ट्रीय  कार्यकारिणी,
जन संस्कृति मंच 
s.suman1971@gmail.com

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