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फेसबुक:मोहन श्रोत्रिय का आत्मकथ्य Or विमर्श की शुरुआत

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, जनवरी 20, 2012 | शुक्रवार, जनवरी 20, 2012


तय नहीं कर पा रहा कि इसे अति-उत्साही, अति-महत्वाकांक्षी, उबलते-उफनते युवा रचनाकारों की अपने फ़ेसबुक मित्रों से अपेक्षा कहूं या शर्त !बहुत लोग फ़ेसबुक मित्र-सूची में आ  जाते हैं, क्योंकि प्रकटतः उनके प्रोफ़ाइल में ऐसा कुछ नहीं होता कि उन्हें मित्र बनने से रोका जाए/ जाना चाहिए. मैं आम तौर पर दो कसौटियां रखता हूं- एक तो मित्र बनना चाहने वालों की मित्र-सूची, और दूसरी, उनके सामाजिक-राजनैतिक विचार. इन दोनों पर खरा उतरने के बाद, मैं अनुमति अंकित कर देता हूं. इतना चौकस रहने के बावजूद, पिछले पांच-छः महीनों के दौरान बड़े कड़वे अनुभव रहे हैं.

दो श्रेणियों के लोग हैं इनमें. एक तो वे जो जब उनका मन करे चैटिंग में उलझाना चाहेंगे. इन लोगों की फेसबुक पर उपस्थिति चैटिंग के माध्यम से ही दर्ज़ होती है. इन्हें और किसी रूप में फेसबुक पर देखा ही नहीं जा सकता. ऐसे मित्रों के पास कहने/पूछने/बताने को कुछ नहीं होता, वे सिर्फ़ उलझाये रखना चाहते हैं आपको -ऊटपटांग, बेसिर-पैर के सवाल, और न जाने क्या-क्या? "आप कौन हैं? आप क्या करते हैं? आप बात क्यों नहीं करते? आपको नींद नहीं आती क्या?" इन सवालों के बाद किसी का उत्साह बचा/बना रह सकता है क्या बात करने का? अरे भाई, बहुत सारी जानकारियां तो प्रोफ़ाइल में भी हैं ही, उन्हें देख लो,यदि इतनी ही दिलचस्पी है तो ! मित्र आशुतोष कुमार ने ऐसे लोगों के लिए एक स्टेटस बनाकर खुला संदेश भी दे दिया था. यह पता नहीं कि उसका कोई असर हुआ या नहीं यानि उन्हें इस सबसे मुक्ति मिली या नहीं.

दूसरी तरफ़, कुछ मित्र ऐसे भी बन जाते हैं, जो अपनी रचनाओं (?) पर उतनी ही अच्छी टिप्पणी चाहते हैं,जितनी आपने किसी अन्य रचना पर कर दी हो. नहीं तो? नहीं तो, वह कुछ भी कर गुज़र सकते हैं. एक पोस्ट में अपने कहे के लिए माफ़ी मांगेंगे, और उसकी अगली पोस्ट में ही धोंसपट्टी चलाने लगेंगे. तीसरी में धमकी दे देंगे. चौथी में शोर मचाने लगेंगे कि उन्हें मित्रता सूची से हटाये जाने की आशंका है. ऐसे उतावले मित्रों को 'ब्लाक' या 'अनफ़्रेंड' करने के अलावा क्या विकल्प हो सकता है?

फ़ेसबुक एक नया माध्यम है जो हरेक को अपनी बात औरों के सामने रखने का स्पेस देता है. इसका सदुपयोग हो रहा है, तो ज़ाहिर है, तरह-तरह की बकवास उछालने के लिए भी इसका इस्तेमाल हो रहा है : अश्लील चित्र और अशालीन भाषा का खुला खेल भी देखने को मिलता ही रहता है. जो जिसको अच्छा लगे ! पर यह कैसे चल सकता है कि जो आपका मन चाहे, वह ही आप किसी की भी दीवार पर चस्पां कर आएं? मैं किसी की दीवार पर कोई चीज़ चस्पां नहीं करता, तो यही अपेक्षा दूसरों से कर सकता हूं न? मुझे मित्रों की रचनाएं या उनकी लिंक्स पसंद आती हैं तो मैं शेयर करने के लिए अपनी दीवार पर ले आता हूं. साहित्य और अनेक अन्य विषयों में मेरी दिलचस्पी है, तो मैं ढूंढ-ढूंढ कर रचनाओं, नोट्स और लिंक्स पर टिप्पणियां करता हूं. 

यह मुझे या किसी को भी करना चाहिए. नए रचनाकारों को धैर्य रखना चाहिए, और यह भरोसा भी कि उनकी रचना ध्यानाकर्षित करेगी तो उस पर टिप्पणियां भी आयेंगी ही. वरना तो ऐसे उम्रदराज़ लोग भी सक्रिय हैं फेसबुक पर , जो कहीं एक टिप्पणी कर आएंगे, तो फ़ौरन उसे न केवल अपना नया स्टेटस बना लेंगे, बल्कि पांच लोगों की दीवार पर भी डाल आएंगे. अब यह दूसरी बात है कि उन पांचों दीवारों पर दो-तीन 'लाइक' के अलावा कभी कुछ नहीं दिखता. यह एक तरह का आत्म-प्रदर्शन है, जो "बड़ों" को तो क़तई शोभा नहीं देता. हर व्यक्ति स्वतंत्र है, पर इसके मायने यह तो नहीं कि सामने वाले की स्वतंत्रता आपकी स्वतंत्रता के अधीन है. फ़ेसबुक यदि सामाजिक मंच है, तो ज़ाहिर है इसका उद्देश्य पारस्परिक सद्भाव एवं समझदारी को बढ़ाना है, न कि तनाव बढ़ाना. सब यहां लिखें-पढ़ें, अच्छी चीज़ों की तारीफ़ करें, कच्ची रचनाओं में भी यदि कोई संभावना दिखाई पड़े तो सहानुभूतिपूर्वक टिप्पणी करें - मैं समझता हूं कि इन छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखने मात्र से एक नई फ़ेसबुक संस्कृति विकसित कर पाने में हम सब सफल हो सकते हैं. जो इसके अतिरिक्त फ़ेसबुक का कोई उपयोग समझते हों वे कृपया मित्र न बनें, और बन गए हैं किंतु इससे सहमत नहीं हैं, वे शांतिपूर्वक मुझे "अनफ़्रेंड" कर दें. 

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-


मोहन श्रोत्रिय
(जे.एन.यूं. में पढ़े,कोलेज शिक्षा से सेवानिवृति,प्रखर वक्ता और लेखक ,चर्चित त्रैमासिक 'क्‍यों' का संपादन - स्‍वयंप्रकाश के साथ किया,राजस्‍थान एवं अखिल भारतीय शिक्षक आंदोलन में अग्रणी भूमिका रही,लगभग 18 किताबों का अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद. लगभग 40 किताबों के अनुवाद का संपादन.जल एवं वन संरक्षण पर 6 पुस्तिकाएं हिंदी में/2 अंग्रेज़ी में. अनेक कविताओं, कुछ कहानियों तथा लेखों के अनुवाद पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित.)


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