Latest Article :
Home » , , , » ‘डायलॉग’ मंच का पहला ही डायलोग छा गया

‘डायलॉग’ मंच का पहला ही डायलोग छा गया

Written By 'अपनी माटी' मासिक ई-पत्रिका (www.ApniMaati.com) on शुक्रवार, फ़रवरी 03, 2012 | शुक्रवार, फ़रवरी 03, 2012


दिल्ली विश्‍ववि‍द्यालय के वामलोकतंत्र वादी  झुकाव रखने वाले शिक्षकों के ‘लेफ्ट डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट’ ने  विश्व पटल पर उभरती नयी सामाजिक – सांस्कृतिक चुनौतियों के मद्देनज़र  छात्रों और शिक्षकों  के बीच लोकतांत्रिक संवाद को नया आवेग देने के लिए ‘डायलॉग’ नाम से एक मंच का गठन किया है। ‘डायलॉग’ ‘ने अपनी पहली संगोष्ठी के लिए विषय चुना- ‘प्रगतिशील आंदोलन : कल और आज’। पिछले साल 1936 में हुए अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ के 75 साल पूरे हुए। यह साल फैज़, मजाज, शमशेर,  नागार्जुन, केदार नाथ अग्रवाल, गोपाल सिंह नेपाली, भुवनेश्वर जैसे सदी के महत्वपूर्ण लेखकों की जन्म शताब्दी का साल भी था। यह ‘गोदान’,  ‘कामायनी’,  ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसी कालजयी रचनाओं का भी पिचहत्तरवां  साल था। साथ ही अखिल भारतीय किसान सभा के पहले सम्मलेन का भी।  प्रगतिशील आंदोलन की विरासत और उस के भविष्य पर विचार करने का यह एक उचित अवसर है। खासतौर पर इसलिए कि वाम  बौद्धिकता के लिए जाने गए भारतीय अकादमिक परिसरों में भी इधर उसकी प्रासंगिकता पर सवाल उठाने वालों की संख्या खासी बढ़ गयी है।
दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय  के खचाखच भर सभागार में  हुयी इस गोष्ठी में विषय प्रवर्तन किया आशुतोष कुमार ने। 1932 में  कहानी संग्रह ‘अंगारे’ के प्रकाशन  से पैदा हुए सांस्कृतिक भूकंप ने सज्जाद जहीर और उनके साथियो को अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक  संघ के गठन का तात्कालिक बहाना मुहैया किया। संघ के  पहले सम्मलेन की अध्यक्षता प्रेमचंद ने की थी। इस सम्मलेन ने संस्कृति के क्षेत्र में आलोचना और अभिव्यक्ति की आज़ादी की मांग की। यह आज़ादी धार्मिक अंध-चेतना, पलायनवादी भक्ति-पंथ, मनुष्य-निंदक  मिथक-पूजा और लोलुप श्रृंगारिकता के  यथास्थितिवादी सांस्कृतिक वातावरण को चुनौती देने और बदलने के लिए जरूरी समझी गयी।  प्रगतिशील आंदोलन ने  सामाजिक प्रगति के लिए  ‘कश्मकशे हयात’ पर आधारित नए सौंदर्यबोध   के लिए संगठित सांस्कृतिक संघर्ष  पर जोर दिया। वर्चस्व और प्रतिरोध की दो विचारधाराओं  के बीच यह संघर्ष आज भी  न केवल जारी है , बल्कि भूमंडलीकरण और  तकनीक-क्रांति के वातावरण में वह और भी जटिल, बारीक व मायावी हो गया है। संचार और संवाद की असीमित  सुविधाओं के युग में अभिव्यक्ति की आज़ादी पहले से कहीं अधिक दुर्लभ हो गयी है।   ज्ञान और सूचना के विस्फोट के युग में  दिमागों और संवेदनाओं का अनुकूलन अधिक सुलभ हो गया है। इसलिए  जनता का  संगठित सांस्कृतिक  संघर्ष  आज पहले से भी अधिक  प्रासंगिक  है।
डायमंड ओबेराय ने नाटक और सिनेमा में प्रगतिशील आंदोलन की भूमिका पर अपने  सुलिखित परचे से चर्चा की शुरुआत की, जिसमें उन्होंने खासतौर पर इप्टा और ऋत्विक घटक की उपलब्धियों को रेखांकित किया। बंगाल के अकाल की भयावह सचाई को इप्टा के नाटकों के बिना देशभर में प्रसारित न किया जा सकता था। घटक की फिल्मों ने उजड़ते हुए गाँव  कस्बों में मनुष्य के बढ़ते हुए अकेलेपन और अवसाद के प्रति नयी  संवेदना जगाई।
अली जावेद ने प्रगतिशील आंदोलन के भीतर उर्दू-हिन्‍दी विवाद के राजनीतिक सांस्कृतिक पहलुओं को उजागर किया। इस सवाल का आज तक अनसुलझा रहना आंदोलन की एक बड़ी विफलता और संस्कृति के जनवादीकरण की मुहिम की एक बुनियादी बाधा है।
अरविन्द गौड़ ने उन प्रगतिशील  आलोचकों को कठघरे में खड़ा किया,  जिन्हें मोहन राकेश  के बाद कोई नाटककार और हबीब तनवीर के बाद कोई निर्देशक दिखाई नहीं देता। अपने महान  पूर्वजों से सीख कर जो नयी पीढ़ी नये प्रयोग ले कर आ  रही है,  उसकी अनदेखी प्रगतिशील आंदोलन की प्रासंगिकता पर एक सवालिया निशान लगाता है।
वैभव सिंह ने प्रगतिशील आन्दोलन के भूगोल और इतिहास की तरमीम करते हुए बताया की 1936 के बहुत पहले से, भारतीय नवजागरण के दौर से ही इसकी जमीन तैयार होने लगी थी। यह किसी विदेशी प्रभाव से अचानक प्रकट होने वाला आन्दोलन न था। भारतेंदु से लेकर फुले तक, कुमारन आशान से लेकर सुब्र्ह्मनयम  भारती तक, प्रगति, परिवर्तन, आधुनिक चेतना, स्वतन्त्रता, समानता के नए सांस्कृतिक वातावरण के निर्माण की कोशिशों में संलग्न थे, जिन्होंने  आगे चल कर  एक रैडिकल अखिल भारतीय प्रगतिशील आन्दोलन का रूप लिया  और जिसने  अनेक तरह के मुक्ति संघर्षों को अपने साथ जोड़ा।
अध्यक्षीय  वक्तव्य में उमा चक्रवर्ती ने प्रगतिशील आंदोलन और स्त्री-मुक्ति के संघर्ष की अनिवार्य सहचरता  पर जोर दिया। मार्क्सवाद से प्रेरित क्रांतिकारी दृष्टि के चलते आरम्भ से ही स्त्री मुक्ति का प्रश्न सामाजिक परिवर्तन के अभियानों का केन्द्रीय प्रश्न रहा है। स्त्रीवादी आन्दोलन  ने अपनी  खास जरूरतों के चलते अपना एक स्वायत्त परिसर जरूर बनाया है,  लेकिन इस सच्‍चाई को नज़रअंदाज़ किये बगैर कि मुक्ति मनुष्य की साझा मुक्ति ही हो सकती है। वर्ग, जाति और लिंग पर आधारित उत्पीडन एक-दूसरे के साथ नाभिनालबद्ध हैं,  इसलिए उन्हें मिटाने की लड़ाई भी एकजुट हो कर ही की जा सकती है। इस लड़ाई में अनेक राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक एजेंसियों के साथ  भाषा के बदलाव के  संघर्ष की भी एक अत्यंत गंभीर भूमिका है,  जिस पर  हमारे देश में कम ध्यान दिया गया है। 
ताज़ा उदाहरण ‘ऑनर किलिंग’  का  है। यह एक ऐसा शब्द है, जो  ह्त्या को एक संस्कृति-मूलक घटना के रूप में पेश करता है। इससे इसके लिए स्वीकार्यता और सहनशीलता बढ़ जाती है। हकीकतन  यह एक कस्टोडियल किलिंग है। परिवार की कस्टडी में बच्‍चे मारे जा रहे हैं, लडकियाँ मारी जा रही हैं। कस्टडी केवल पुलिस की ही नहीं होती, सबसे ज़्यादा परिवार की होती है। इसलिए इन्हें कस्टोडियल किलिंग कहना चाहिये, जिससे  कि इसकी भयावहता जाहिर हो सके। अभी तो यह हो रहा  है कि जिस हेबियस कार्पस को लोगों की हिफाजत के लिए बनाया गया था,  उसका सबसे अधिक इस्तेमाल दिल्ली में अपनी मर्जी से शादी करने वाली बच्चियों को घेर कर उनके परिवारों को सौंप देने के लिए किया जा रहा है, जहाँ उनके साथ कुछ भी हो सकता है।  आज देश में लिंगानुपात ब्रिटिश काल से भी ज़्यादा खराब है। इसलिए कमसे कम इस एक कसौटी पर हमारी ‘आज़ादी’ पर गंभीर सवालिया निशान लगे हुए हैं।
चर्चा का समाहार करते हुए गोपाल  प्रधान ने  कहा कि राजनीति और संस्कृति के बीच की एकतानता को रेखांकित करने,  राजनीतिक कविता और प्रतिरोध की संस्कृति को दृश्यपटल पर प्रमुखता से स्थापित करने और जनता के जीवनसंघर्ष को सांस्कृतिक विमर्श के सक्रिय केन्द्र के रूप में विकसित करने की प्रगतिशील आंदोलन की उपलब्धियों को न नकारा जा सकता है, न अनकिया किया जा सकता है। फैज़ से लेकर अदम गोंडवी तक यह परंपरा निरंतर आगे बढ़ रही है। यही वह परम्परा है, जिसने न केवल अंतर्वस्तु के स्तर पर, बल्कि कला की लिहाज  से भी सब से ऊँचे शिखर छुए हैं,  जबकि कला के लिए कला की बात करने वाले दोनों मोर्चों पर पीछे छूट गए हैं।गोष्ठी का संचालन उमा गुप्ता ने किया। बीच में  नंदिता राय ने फैज़ की एक गज़ल ‘आज बाज़ार में पा बजौला चलो’ को गाकर  भी सुनाया, जिसने गोष्ठी को एक शायराना और सांगीतिक गहराई दी।  

योगदानकर्ता / रचनाकार का परिचय :-
अनुराग 

SocialTwist Tell-a-Friend
Share this article :

0 comments:

Speak up your mind

Tell us what you're thinking... !

संस्थापक:माणिक

संस्थापक:माणिक
अपनी माटी ई-पत्रिका

सम्पादक:जितेन्द्र यादव

सम्पादक:जितेन्द्र यादव
अपनी माटी ई-पत्रिका

एक ज़रूरी ब्लॉग

एक ज़रूरी ब्लॉग
बसेड़ा की डायरी:माणिक

यहाँ आपका स्वागत है



ज्यादा पढ़ी गई रचना

यहाँ क्लिक करके हमारी डाक नि:शुल्क पाएं

Donate Apni Maati

रचनाएं यहाँ खोजिएगा

हमारे पाठक साथी

सम्पादक मंडल

साहित्य-संस्कृति की त्रैमासिक ई-पत्रिका
'अपनी माटी'
========
प्रधान सम्पादक
सम्पादक
सह सम्पादक
तकनिकी प्रबंधक
========
संपर्क
apnimaati.com@gmail.com
========

ऑनलाइन

Donate Us

 
Template Design by Creating Website Published by Mas Template